



रूंख भायला
राजी राखै रामजी ! आज बात बिधना री, बिधना रै रंगां री। रंग दो चार होवै तो ई कीं बात, बिधना रै रंगां री तो गिणत ई कोनी, कदैई हांसी रा रंग, कदैई उदासी री काळूंस, कदैई मीठी मुळक तो कदैई आंसूड़ां री पोट, पल में लीलो, घड़ी भर में धूड़ो…। बिधना तो बिधना है भई !
रामायण में अेक प्रसंग आवै। राजा दसरथजी नै सौ बरस पूगग्या। उण बगत भरत अर सत्रुघ्न आपरै नानाणै आयोड़ा हा, बां रै बात जची कोनी। कठै तो भाई राम रै राजटीकै री बात ही अर कठै इस्यो माड़ो समचार। दोनूं भाई अयोध्या आया, समची नगरी बिलखै ही, इसी बातां कूड़ी थोड़ी होवै। भरत आपरै गुरू वशिष्ठ नै देख’र बूझ्योे-
‘गुरूदेव, आप तो तीनूं लोकां अर सास्तरां रा जाणीजाण हो, आपरै बतायोड़ै ज्ञान में, बात में किणी मुहुर्त में कदेई चूक नीं होवै पण भाई राम रै राजतिलक रै मुहुर्त में कांई कमी रैयगी ? बाप रो बिछोग अर भाई रै वनवास रा संजोग, आप किणी पोथी-पानड़ै में देख ई नीं सक्या ?’ गुरू वशिष्ठ गळगळा होग्या, भरत नै छाती सूं चेपतां बोल्या, सो कीं दीसै है बेटा, मुहुर्त ई गळत कोनी पण म्हूं ई बिधना सूं बंध्यो हूं। मुनि री मनगत बाबत जणाई तुळसीदास लिख्यो है-
सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखी कहें मुनिनाथ
लाभ हानी जीवन मरण, जस अपजस हरि हाथ
तत री बात आ है, ओ हरि कुण है ? आ भावी किसी है ? करमां रा अे लेखा लिखै कुण है अर क्यूं लिखै है ? आं सगळै सवालां रो अेक ई पड़ूत्तर है ‘बिधना’, जिकी विधि, करमगत, हरि, भावी, हूणी आद नांवां सूं जाणीजै, सैं सूं प्रबल है। अेक लोककथ है-‘हूणी तो होयां सरै, नर चिंती कद होय।’ । म्हूं सोचूं, इण सिरिस्टी नै चलावण आळी जिण ‘सुपर नेचूरल पॉवर’ री आपां बात करां, बा बिधना नीं तो और पछै कुण ? जिण रै सामीं सबनै निवणोे पड़ै।
साची बूझो, तो आपणो लोक करमगत पर टिक्योड़ो है। करम नै सैं सूं सिरै बताइज्यो है। जियाजूण में आपां आछा माड़ा जित्ता भी दिन देखां, बां रै मूळ में करमां रा लेखा ई बताइजै। करम आछा तो दिन आछा, करम माड़ा तो दिन माड़ा। करमां री गत ई तो भोगै है आदमी, भलंई लारलै जलमां रा होवै का इणी जियाजूण रा। अेक लोक भजन में कहीज्यो है, ‘जीव तू मत करणा फिकरी रे/ हरि का लिखिया ना टळै रै/भली बुरी सखरी रे….।’
राजस्थानी लोक में बिधना नै आपां बैमाता रै नांव सूं ई जाणां। घर में जद टाबर जलमै तो जलम रै छठै दिन बैमाता री पूजा होवै। उण नै ‘छठी’ कहीजै। मानता आ है कै जलम री छठी रात बैमाता चुपचपाती आय’र टाबर री करमगत लिख देवै। उण रै लिख्यै लेखां में कोई फरक नीं आवै। छठी रै दिन घर री बडेरी लुगायां टाबर नै पैली बिरियां नवा गाभा पैरावै, बैमाता री धोक दिरावै। आ धोक किणी मिंदर देवरै में नीं लागै, घरै ई लगाइजै। गांव ढाण्यां में तो अजेस ई लुगायां गा रै गोबर सूं भींत पर बैमाता कोर देवै, हां, सै’रदारी में बिधना माता री फोटू रा पानां ई लाधै।
बिधना रा रंग हर जुग में लाधै। अलेखूं बातां, अगणित किस्सा…..सोचां की अर होवै कीं। पल में देवणो अर पल में खोसणो बिधना रा ई तो खेल है। मिनख मिनख में आंतरो बिधना ई तो घालै। नीं पछै अेक टाबर तो सेठ रै घरै जलमै अर दूजो खंदेड़ा खोदती मा रै गरभ सूं। अेक रै छप्पन भोग है तो दूजै रै रोटी रा ठिकाणा ई कोनी। कदास जणाई लोक में गावैै, ‘भाई रे मत दीजो मावड़ली नै दोस, करमां री रेखा न्यारी-न्यारी…।’ तुळसीदास भी लिख्यो है, ‘सकल पदारथ है जग मांही/करमहीण नर पावत नांही।’
पण आ बिधना तो आप काण कायदां सूं बंध्योड़ी है, जणाई भूंड रा ठीकर उण रै माथै ई फूटै। पण फेरूं ई, राई राई रो लेखो करती आ बिधना कवियां रै हियै सूं गायणां रै कंठां उतर’र समझावै तो घणोई है, जे कोई अंगेजै तो-
‘विधि का विधान जान हानि-लाभ सहिए/सीताराम सीताराम सीता राम कहिए/जाहीं बिधि राखै राम तांही बिध रहिए’
लोक में बिधना रै रंगां नै भोत सै गीतां में गाइज्यो है। ‘बाजीगर एक खेल रचायो/बिधना लिखिया लेख/जनम मरण रा फेरा लागे/ थूं थारी काया में देख।’ का पछै- करमगति टारे नाहीं टरे/ ओ संतो भाई/बिधना ने जो लिख दिया, सोई भोग भरे।’, ‘बिधना थारा लेख निराळा/ कोई नीं जाणै मरम थारो/कुण राजा कुण रंक बणाया/ ओ सब खेल करम थारो।’
करमां रै लेखां पेटै अेक बात और…..बिधना रा लेख भलंई नीं बदळै, मानखो आपरै मनां गनां उण नै गाळ काड’र आफरो तो झाड़ ई सकै। ‘म्है किस्यै मोरियै रै भाठो मारेड़ो है !’, ‘करमां में कांकरा है तो कोई के करै !’ ‘मिल्यो डगळफोड़ भरतार, भाग में कांई रे लिख्यो…’ जिसी ओळयां इण री बानगी तो है।
ओळमा देवणियो कोई कलंदर होवै तो बातां रा रंग ई न्यारा। गांम में अेक जाट भायलै रै छोरै रो ब्याव हो। बीनणी परणीज’र घरै पूगी ही, बधारण री त्यारी चलै ही। चौकी पर बटाउवां भेळै म्हूं ई बैठ्यो हो। सामीं उभो अेक ढाडी घड़ी-घड़ी बधाई मांगै हो। बधाई तो दादो देसी, दादै कन्नै सूं लेवो। दादो ढाडी री लीलड़ी कद सुणै। देस्यां…देस्यां ठमज्या। पण ढाडी री रागळी नीं ठमी। कणी स्याणै कैयो, दादा, बधाई देवणी जिकी देय’र नकी करो, नीं पछै ओ कान खायां राखसी। दादै आपरै गूंझै सूं जमां ई गळेड़ो सो दस रिपिड़ां रा नोट काड’र ढाडी नै झलावणो चायो। ढाडी दादै रै मूंडै सामीं तकावतै बात फैंकी-
बिधना तू किन्हीं भली, थारा झुरड़ मरोडूं कान
मंगता किन्या जगत में, जाट दिया जजमान
कोई के करल्यै ! बिधना अर दादै दोनां नै बटीड़ सो ठोक दियो ढाडीड़ै। ढाडी दांई आपणै हाथां में बस इत्तो ई है, बिधना नै गाळ काड लेवां, बस…।
आज री हथाई रो सार ओ है, कै जियाजूण में आवतै आछै माड़ै रंगां नै बिधना रा लेख जाण स्वीकारणो, रोवा कूको कम सूं कम करणो। बस करम आछा राखणा, किणी रो माड़ो नीं करणो। आगोत्तर रो तो ठाह नीं, इण जमारै में तो अेक थ्यावस रैयसी आप रै…। बाकी बातां आगली हथाई में। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो…।
-लेखक राजस्थानी और हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं








