



राजेश कुमार अग्रवाल.
फाल्गुन की हवा में इस बार भी रंग घुले थे, लेकिन गाँव की चौपाल पर बैठे बुज़ुर्गों की आँखों में एक हल्की-सी चिंता तैर रही थी। ढोलक की थाप, बच्चों की किलकारियाँ और गुलाल की खुशबू। सब कुछ वैसा ही था, जैसा बरसों से होता आया है। फिर भी, कुछ बदल रहा था। शायद रंगों की चकाचौंध में रिश्तों की सीमाएँ धुंधली होने लगी थीं।
श्यामलाल इस गाँव के पुराने शिक्षक थे। सेवानिवृत्ति के बाद भी लोग उन्हें ‘मास्टर जी’ ही कहते थे। होली उनके लिए सिर्फ़ त्योहार नहीं, परंपरा थी, ऐसी परंपरा जिसमें आनंद के साथ संयम भी शामिल था। वे कहते, ‘रंग वही अच्छे जो चेहरे पर मुस्कान छोड़ें, मन पर बोझ नहीं।’
इस बार होली से एक दिन पहले उनकी बहू राधा ने उनसे पूछा, ‘बाबूजी, आजकल लोग कहते हैं, होली में सब चलता है। क्या सच में?’
श्यामलाल मुस्कुराए, पर आँखें गंभीर थीं। बोले, ‘बेटी, होली में रंग चलते हैं, मर्यादा नहीं टूटती। जो टूटे, वह त्योहार नहीं, तमाशा होता है।’
गाँव के युवा उत्साह में थे। शहर से आए कुछ रिश्तेदार भी थे। तेज़ संगीत, मोबाइल कैमरे, और ‘बुरा न मानो’ की ढाल। सुबह होते ही रंग बरसने लगे। बच्चे, बूढ़े, महिलाएँ, सब होली में डूबे थे। श्यामलाल ने अपने आँगन में छोटी-सी पूजा की, फिर गुलाल की थाली लेकर बाहर आए। हर आने-जाने वाले को माथे पर हल्का-सा रंग लगाया, और आशीर्वाद दिया। उनके रंग में शोर नहीं, स्नेह था।
उसी समय, गली के मोड़ पर हँसी-ठिठोली कुछ ज़्यादा तेज़ हो गई। किसी ने किसी पर जबरन रंग डाल दिया। किसी ने हद पार कर दी। माहौल एक पल को अजीब-सा हो उठा। राधा ठिठक गई। उसकी आँखों में असहजता थी। श्यामलाल ने यह देख लिया।
वे आगे बढ़े। आवाज़ ऊँची नहीं की, बस साफ़ बोले, ‘बेटा, रंग डालो, पर इज्जत मत उतारो। होली का रंग धोया जा सकता है, रिश्तों पर पड़ा दाग़ नहीं।’ भीड़ ठहर गई। संगीत धीमा हो गया। कुछ युवाओं ने नज़रें झुका लीं। किसी ने माफी माँगी। किसी ने रंग की जगह गुलाल उठाया।
दोपहर तक गाँव फिर उसी लय में लौट आया, हँसी, गीत, पकवान। महिलाएँ एक-दूसरे के घर गईं, गुझिया बाँटी। बच्चों ने बुज़ुर्गों के पैर छुए। श्यामलाल के आँगन में सब जुटे। उन्होंने कहा, ‘होली मेल-जोल का पर्व है। इसमें रिश्तों की गाँठ कसती है, ढीली नहीं होती।’
शाम ढलते-ढलते राधा ने देखा, जो सुबह असहज था, अब सहज था। जिन आँखों में चंचलता थी, उनमें सम्मान भी था। उसे समझ आया कि त्योहार की खुशी तभी पूरी होती है, जब हर कोई सुरक्षित और सम्मानित महसूस करे।
रात को जब चाँद निकला, श्यामलाल ने अपनी डायरी में लिखा, ‘मर्यादा कोई रोक नहीं, वह तो वह रेखा है जो प्रेम को दिशा देती है। होली में रंग उड़ते हैं, पर रिश्ते जड़ें पकड़ते हैं। जो इसे समझ गया, उसकी होली सदा उजली रहती है।’
अगले दिन गाँव में चर्चा थी, इस बार की होली अलग थी। कम शोर, ज़्यादा अपनापन। कम उछाल, ज़्यादा विश्वास। और श्यामलाल मुस्कुरा रहे थे। उन्हें पता था, जब रंगों के साथ मर्यादा बहे, तभी त्योहार सचमुच त्योहार बनता है।






