



रजनी शर्मा
छत पर बैठी नन्ही गौरैया,
इक दिन मुझसे यूं बोली,
बदल गया है मानव अब तो,
बदल गई दुनिया सारी।
कभी जो हमसे खेला करते,
शाम सवेरे आंख- मिचोली,
भूल गए सब उस चिड़िया को,
जो थी सबकी हमजोली।
पंखों के संग मन भी घायल,
तारों का है जाल बिछा,
दाना -पानी को तरसूं मै,
कौन समझेगा मेरी व्यथा?
अब ना दाना- पानी मिलता,
संकट पल पल बढ़ता जाए,
बंद हुए सब खुले झरोखे,
जीना मुश्किल होता जाए।
चीं चीं से चहका करते थे,
मंदिर, आंगन, घर- द्वारे,
किसे पुकारूँ घायल मन से,
कहाँ गये सब रखवारे।
तिनका तिनका चुनकर अब मैं,
कहां घरोंदा बनाऊंगी,
अपनी नन्ही संतति को मैं,
कैसे दुनिया दिखाऊंगी।
ईश्वर के मंदिर में चुगने,
रोज सवेरे जाती हूं,
नतमस्तक होकर मैं उनको,
मन की व्यथा सुनाती हूं।
स्वार्थी मानव को हे ईश्वर ,
तुम अहसास करा देना,
पेड़ों, पक्षी,जल -जीवन का,
मूल्य उसे समझा देना।
गर ना होगी चिड़िया प्यारी,
उदास होगी हर फुलवारी,
सूनी हो जाएगी इक दिन,
तेरी ये दुनिया प्यारी।
फिर ना गूंजेगी प्रभात में,
मेरे स्वर की किलकारी,
रोएगी धरती माता तब,
खोकर संतान सरल प्यारी।







