



रजनी शर्मा.
मैं नवयुग की नारी हूं
अपने सपनों को हकीकत में बदलना चाहती हूं,
आसमान की ऊंचाइयों को छूना चाहती हूं,
बंधन नहीं…
बस अवसर का विस्तार करना चाहती हूं
मैं नवयुग की नारी हूं..अपना अधिकार चाहती हूं।
मोहताज नहीं दया दृष्टि की,
ना ही सहानुभूति की आस,
बस अपने श्रम का सच्चा मूल्य मिले,
इतना सा मेरा विश्वास।
समय मेरा भी उतना ही अनमोल है जितना किसी और का होता है।
मेहनत की हर बूंद से सींचा स्वप्न,
अब फलित होने को रोता है।
मैं नये युग की नारी हूं –
अपना विकास चाहती हूं,
अपनी पहचान,अपना आकाश
अपना इतिहास चाहती हूं।
मां हूं तो ममता की गहराई हूं,
बहन हूं तो विश्वास की परछाई हूं,
बेटी हूं तो उम्मीद की किरण,
पत्नी हो तो जीवन की संगिनी बन,
प्रेयसी हूं तो समर्पण की धार,
हर रिश्ते पर मैं वारी हूं अपार..
बार-बार..
पर केवलमात्र देह नहीं…
मैं चेतना हूं…
संवेदनाओं की प्रखर ज्योति हूं।
सम्मान मेरा जन्मसिद्ध अधिकार,
जिसकी सच्ची अधिकारी हूं।
मैं नवयुग की नारी हूं,
जो खुद अपनी तकदीर लिखे,
हक की राह पर बढ़ती जाए,
और स्वयं नया इतिहास रचे।
मैं हूं नवयुग की नारी,
अपना अधिकार चाहती हूं




