


रूंख भायला.
राजी राखै रामजी ! आज बात लुगायां री, लुगायां रो दिन है आज। हैं…..आ के कैयी……लुगायां रो दिन कुणसो नीं होवै, दिन उगै ई लुगायां रै पाण है…। नीं मानो, तो सुरजीदेव सूं बूझो, उण नै सैं सूं पैली लोटी कुण ढाळै…., सैं सूं बेसी लोटी कुण ढाळै ! अरे भोळा स्याणो, लुगाई नांव रै जीव नै तो रातूं ई ओसाण कोनी, दिन उगतां ई बा भळै सरू हो जावै-
- धरती माता थे बडा, थांसू बडो नीं कोय…
- तरवर तुळछां तरवर पान/पाणी घालै श्रीभगवान
- हैैं ओ…., आठ बजग्या, कद तंई पड़्या रैयसो !
- सुणो हो के ! चा साथै कांई लावूं ?
- हैं ओ… आज साग कांई बणावूं ?
- अेकर कैयोड़ो तो सुणै ई कोनी ओ आदमी, रात कैयो हो, केळा लाया, दिनुगै पुन्यु है, पण म्हानै कुण धारै ! हे सत भगवान, आखती हुगी म्हूं तो….
- कैवती-कैवती धापगी, पींड्यां में सणफां चालै, जाड़ में चीस….इयां नीं डाक्टर नै दिखा ई लावां !
- हैं ओ…., रामदेवजी रो मेळो तो दिखा लावो आज।
- मेळो नीं तो फिल्म ई सही, पाडौसण तो ‘गदर-2’ चार दिन पैलां ई देख आई !
- म्हारी अेक ई नीं सुणो थे !
- मरण नै मर जिस्यूं, पण थे ना र्धा या मन्नै !
अबै कोई कियां धारै….बिना करंट चालतो ओ रेडियो तो ठमै कोनी। अठै राजस्थानी रा चावा कवि कुमार अजय री पोथी ‘रिंकी टेलर’ री अेक कविता चेतै आवै-
‘चावूं थान्नै
अधावूं किणी दूजै नै
आ कियां हो सकै रिंकी !’
खैर…., गैली गूंगी बातां नै जावण दो। साची बात तो आ, कै आखै जगत में चौधर सदांई आदम्यां रै हाथ रैयी है, डेढ हुंस्यार मानै बै आपो आप नै ! इण चतराई रै बिच्चाळै ई बां लुगाई रै नांव सूं अेक दिन थरप्यो है, आ ई छोटी बात कोनी। लुगाई नै हर घड़ी आपनै सिद्ध करणो पड़ै जद कै आदमी स्वंयसिद्ध मानै आपनै। जर्मनी री लोकचावी क्रांतिकारी रोजा लक्जमबर्ग कैयो है- ‘जिण दिन लुगाई जात री मैणत अर खेचळ रो मोल होसी, दुनिया री सैं सूं मोटी चोरी पकड़ीजसी।’ लुगाई, जिण नै अदीतवार री ई छुट्टी नीं मिलै, उण रै काम रो मोल, काम री कूंत करणै रो काळजो ई कोनी इण मिनखा समाज में….। दिहाड़ी मजूरी करती, कमठाणै पर जावती लुगाई भलंई आदमी सूं बेसी खटती होवै, पण पइसा उण नै आदमी सूं कम मिलै, क्यूं ? इण रो पडूत्तर कोई नीं देवै।
सिमोन द बोवूवर री जग चावी पोथी है ‘दै सैकेंड सैक्स’। इण पोथी रो ‘स्त्री’ रै नांव सूं हिंदी में अनुसिरजण होयो है, सिमोन कैवै-‘लुगाई पैदा नीं होवै, बणा दी जावै।’ अब इण बात री पड़ताल आप दुनिया रै किस्यै ई कूणै कचूणै में कर लो, लुगाई रा हालात अेक सिरखा लाधसी। इचरज री बात कोनी, लुगाई नै तो वोट देवण रो अधिकार ई भोत मोड़ो मिल्यो है। कैवण नै आपां भोत आगै बधग्या हां, पण अजेस ई लुगाई नै बा सुतंतरता नीं दे सक्यां हां जिण रो बा जलमजायो अधिकार राखै। बाळपणै सूं ई आपां र्छो यां नै चेतावणो सरू कर देवां, इयां नी करणो…बियां नी करणो…..अठै नीं जावणो….बठै नीं जावणो…। रहमान मुसव्विर रो अेक शेर चेतै आवै-
उसे हम पर तो देते हैं मगर उड़ने नहीं देते
हमारी बेटी बुलबुल है मगर पिंजरे में रहती है
डॉ. नीरज दैया तिरिया जात री सबळाई नै बखाणता थकां अेक पोथी ‘लुगाई नै कुण गाई’ रो सम्पादन र्क यो है। इण पोथी में राजस्थानी री चावी महिला रचनाकारां री कवितावां है, बांचां तो ठाह लागै, बै आदमी सूं इक्कीस नीं तो उगणीस ई कोनी। दैया आपरै सम्पादकीय ‘जिण धूरी टिक्योड़ा है सुपना’ में लिखै-आदूकाल सूं भुंवती धरती माथै लुगाई खिमतावान है जिकी घर नै घर बणायो, अर बणावै। घर मिनख रै टिकाव सारू होवै, जे लुगाई नीं होवै तो सणै घर, सगळा सुपना, सगळी मिनखाजात बेरंग हो जावै।
चावा कवि कानदान कल्पित गायो है-काम पड़्यां हर नार झांसी री राणी है/मरजादा कुळ लाज री अमर निसाणी है…./हंसता हंसता सीस सूंपदै बात सटै…।
कहिजै लोक में सांच बसै, पण लुगाई री बात करां तो बठै दुभांत निगै आवै। कैवै कीं अर करै कीं ! आपां लुगाई नै दादी, नानी, मा, बैन, बीनणी अर धणियाणी रै न्यारै न्यारै रूपां में देखां, देबी रै रूप में पूजा करां उणरी, ओ संस्कार है आपणो। पण समाजू निजरां सूं देखां तो इण देबी नै जूं जित्ती ई नीं गिणां। बात तो बरोबरी री करां पण बरोबर कद मानां ! इतिहास रै भोत सा पान्ना में उण नै पग री जुत्ती तकात गिणीज्यो है, जलमणै सूं पैली मारीज्यो है, ब्याव पछै बाळीज्यो है अर जबरजिन्ना…..! काती रै कुतियै सो आदमी वासना रै कादै में पज्यां पछै माणस सूं कुमाणस बणज्यै, फेर लुगाई कोई होवो भलंई, उण सारू बा फगत अेक देही होवै। च्यारूं कूंटां में आपां रोज ई जबरजिन्ना री अलेखूं बातां सुणां, जठै आदमी लुगाई रो देबी रूप बिडरूप करतो जेज ई नीं लगावै। आ दुभांत आपणै समाज री है, लुगाई जात रै पेटै समाज री मनगत बदळै तो आ दुनिया घणी मनभावणी और सुंदर बण सकै।
कैवणो तो पड़सी, लुगाई सदांई आदमी सूं बेसी होवै। उण नै जे थोड़ो’क मौको मिलै तो बा आपरी खिमता सिद्ध करदै। लुगाई फगत घर ई नीं, देस चलावणै री खिमता राखै, आ बात मानणी ई पड़सी आपां नै ! मीरां, पद्मण, पन्ना, हाडी राणी री बात तो कैवणी ई कांईं, पण आज री लुगाई भी सागी खिमता राखै। लोकशिल्पकला री रूमादेबी होवै भलंई ‘सीधी मारवाड़ी’ री कौशल्या चौधरी, आं लुगायां आपरै दम पर आपरी न्यारी पिछाण बणाई है। आं रै थापी मारणी चाइजै समाज नै। ‘बेटी जाई रे जगनाथ ज्यांरा हेठै आया हाथ‘ जिसी कैबतां रो बगत नीं रैयो अबार, आज तो बेटी रो नांव लियां बापू री छाती तण-तण चौड़ी होवण रो बगत है। उणरा पग मजबूत करो, पीढ्यां मजबूत होसी आपणी !
आज री हथाई रो सार ओ है कै आपां घर में, परिवार में, समाज में अर देस दुनिया में लुगाई जात नै ठावो मान देवां अर दिरावां। बा ई आपरै मांयलै बिसवास नै कीं मजबूत करै, आ कामना राखां। बाकी बातां आगली हथाई में। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेखक राजस्थानी और हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं






