



आदित्य झा
मनुष्य को ईश्वर की सबसे सुंदर और बुद्धिमान रचना माना गया है। उसमें सोचने, समझने और सही-गलत का भेद करने की अद्भुत क्षमता है। लेकिन कटु सत्य यह है कि यही बुद्धिमत्ता कई बार गलत दिशा में प्रयोग की जाती है। जब विवेक पर लालच हावी हो जाता है, तब मनुष्य अपने ही बनाए मूल्यों को तोड़ देता है। इस स्थिति में पैसा और सत्ता मानव जीवन के सबसे बड़े शत्रु बनकर सामने आते हैं।
इस संसार में एक ऐसी शक्ति है जिसे लोग लगभग सब कुछ मान बैठे हैं, पैसा। पैसा ज़रूरत है, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन जब ज़रूरत, लालच में बदल जाती है, तब समस्या शुरू होती है।
आज अधिकांश लोग यह मानने लगे हैं कि पैसे से सब कुछ खरीदा जा सकता है, सम्मान, खुशी, सफलता और यहाँ तक कि रिश्ते भी। जबकि सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। पैसा सुख-सुविधाएँ तो दे सकता है, लेकिन सुकून नहीं। वह मकान दिला सकता है, घर नहीं; इलाज करा सकता है, सेहत नहीं; और भीड़ दे सकता है, अपने नहीं।

पैसे की अंधी दौड़ में कुछ लोग गलत रास्तों को अपनाने से भी नहीं हिचकिचाते। भ्रष्टाचार, तस्करी, अवैध व्यापार और हिंसा जैसे कृत्य इसी लालच की उपज हैं। एक व्यक्ति का लालच पूरे समाज को खोखला कर देता है। जब ईमानदारी कमजोर होती है, तब कानून भी केवल किताबों तक सिमटकर रह जाता है।
लालच का दूसरा और कहीं अधिक भयानक रूप युद्ध है। युद्ध केवल हथियारों से नहीं लड़ा जाता, वह लालच और सत्ता की भूख से जन्म लेता है। जब कुछ देशों के नेता दूसरे देशों की ज़मीन, संसाधन या प्रभुत्व पर कब्ज़ा करना चाहते हैं, तब युद्ध का रास्ता चुना जाता है। युद्ध में न जीतने वाला सच में जीतता है, न हारने वाला सच में हारता है, हारती है केवल मानवता। लाखों निर्दाेष लोग मारे जाते हैं, शहर उजड़ जाते हैं और आने वाली पीढ़ियाँ डर और नफरत की विरासत पाती हैं।
हालाँकि तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। हर मनुष्य लालची या हिंसक नहीं होता। समाज में आज भी ऐसे लोग हैं जो ईमानदारी, दया और शांति के मूल्यों को जीवित रखने की कोशिश कर रहे हैं। वे लोगों को अवैध कमाई के दुष्परिणाम समझाते हैं, युद्ध के खिलाफ आवाज़ उठाते हैं और यह याद दिलाते हैं कि इंसान होने का मतलब केवल जीना नहीं, सही तरीके से जीना है।
अंत में यही कहा जा सकता है कि मनुष्य का भविष्य उसके ही हाथों में है। यदि वह लालच को नियंत्रित कर ले, तो दुनिया स्वर्ग बन सकती है। और यदि नहीं, तो प्रगति के नाम पर विनाश तय है। हमें स्वयं से शुरुआत करनी होगी, अपने विचार, अपने कर्म और अपने उद्देश्य को सही दिशा देकर। क्योंकि बदलाव की उम्मीद हमेशा ‘दूसरों’ से नहीं, ‘खुद’ से की जानी चाहिए।
–लेखक की उम्र 13 वर्ष है, उदयपुर में रहते हैं, यह आलेख मूल रूप से अंग्रेजी में है, जिसमें सात वर्षीया रूही झा का भी योगदान है। ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध पर बाल लेखक के विचार बड़ों को भी सोचने के लिए विवश करता है









