



रूंख भायला
राजी राखै रामजी ! आज बात बाण री, कुबाण री…। बाण तो बाण होवै आछी हो भलंई माडी, पण पड़गी तो पड़गी। अे बाण-कुबाण, अे आदतां आदमी री कीर्ति नै आकासां चढा सकै, पताळां गिरा सकै, मूंडो काळो करा सकै। घणी बातां में मूंडो तुड़ा ई सकै।
हेत री हथाई में आज बात कुटेव री करां। उण नै आदत कैवां कै लखण, बाण कैवां का कुबाण, कोई भेद कोनी। कैवण नै भलंई कोई कैवतो रैवै, म्हैं थान्नै भोत प्यार करूं, थारै बिना जी नीं सकूं, पण म्हारी जाण में इण जगत में आदमी सैं सूं बेसी प्रीत आपरी बाण सूं करै, सो कीं छूटै पण बाण नीं छूटै। इण बात पेटै लोक में अेक भोत सांतरी कैबत है-
बारा कोसां बोली पलटै, बनफळ पलटै पाक्यां
बरस छत्तीसां जोबन पलटै, लखण नीं पलटै लाखां
सोचो दिखाण, जे बाण पड़गी दारू री, पुड़ियै री, तो बा किंकर छूटै ! पुड़ियैबाजां पिच-पिच करतां आखी धरती ल्याड़ न्हाखी आपरै थूक सूं ! आपां रोज देखां कै दारू पीवणिया नितुकै सोगन लेवै, बस आज आज…..आगै सूं नीं पीवूंला। पण धणियाणी लाण इण कूड़ रो कांई करै। ‘रोज फेरा, रोज रंडापो, तूळी लागै इस्यै सुहाग रै…..।
इसी अेक बात और चेतै आवै, अेक डैण आपरी आखी जियाजूण में कदेई देई देवता नीं धोक्या, मिंदर देवरा नीं गयो। छेकड़ जावतै मांची में पड़ग्यो, अबै उणरो हंसलो उडारी सारू ताफड़ा तोड़ै। अेक भायलो मिलण सारू आयो, हालत देख’र घणो गळगळो होयो, बोल्यो-
‘भाइड़ा, अेक बात कैवूं, अंत समै सामीं है, अबै तो रामजी नै याद करलै !’
पण बाण तो बाण है, खोळियो भलंई छूटै बा कद छूटै। डैण नाड हलावतो होळैसीक बोल्यो-
‘अबै के याद करणो है, घड़ी दो घड़ी में मिल ई लेस्यां तेरै राम सूं !’
बतावो कोई के करल्यै। के टाबर, के लुगाई, के डांगर, के पखेरू बाण-कुबाण तो सब रै लाधै। बा किसी अेक भांत री होवै ! कोई नै नख, तो कोई न कालर खावण री। कोई नै गाळ काडण री तो कोई नै भाठा भिड़ावण री, कोई गावड़ी आपरो ई दूध चूंघज्यै, तो कोई गंदगी में मूं मारती फिरै। सूरड़ी कादै में राजी, तो गधियो अकूरड़ी पर। किणी रै जीभ घणी ताती, तो किणी रा हाथ। कोई बात-बात पर दांत दिखावै तो कोई बिना बात ई रीसां में बटीजबो करै। कोई आखै दिन राम राम करै तो कोई मरया मरया करबो करै। कोई रोवण सूं मन हुळको करै तो कोई पाट-पाट हांस’र राजी होवै। बाण तो बाण है !
बाण कुबाण री कांई गिणती, कांई नापजोख। पण आ बाण आवै कठै सूं ! आदमी री संगत उण नै बणावै, बिगाड़ै। संगत चोखी तो तिर जावो, माड़ी होवता ई डूब्यां सरै ! संतां तो सीख घणी दी है-
संगत करो नीं निरमल संत री म्हारी हेली,
आवागमन मिट जाय रे
जलम सफल होई जाय रे…
पण कैबत है ‘कुटेव री कुत्ती कादै कानीं बेगी दोड़ै, सभाव है बींरो !
नाक में आंगळी लेवण री कुबाण पड़गी बीनणी रै…! सासू घणी बरजै पण बाण कियां छूटै। बीनणी रै नाक में गूंगला रो छेड़ो ई नीं, जद देखो गोळी बणाबो करै। रोटी पोवै तो नाक में आंगळी, तीज चौथ री कथा सुणै तो नाक में आंगळी….सासू घणो टोक्यो, तो बीनणी आखती होय’र बोली, खुरचणो घड़ाय देवो…खाज आवै तो करां नीं के !’ कोई बूझै, बीनणी बेटा, थारो नाक है कै झर झर कंथो…गूंगला अर सींड निवड़ै ई नीं !!
मोबाइल री बाण तो आपां सबनै पड़गी। फुर-फुर सागी रीलां, सागी मैसेज, फेसबुक सूं इंस्टा तंई सै पज्या बैठ्या है। रातूं चौन नीं पड़ै। आटै री उधारी छोड़ो, आज डाटो उधार मांगता फिरै लोग। सारली मांची पर सूती जोड़ायत कैवै, ‘हॉटस्पॉट चालू करो नीं दिखाणी।’ धणी सामै सूं रीसां बळतो कैवै-‘अल्लै ! थारो ई निवड़ग्यो के, म्हूं तो आप थारलै डाटै भरोसै हो !’’ कोई के करल्यै…..अबै कुबाण तो कुबाण है।
राजस्थानी रा प्रेमचंद गिणीजता अन्नाराम सुदामा री अेक पोथी है, ‘मनवा थारी आदत नै !’ इण पोथी में बाण-कुबाण पेटै 15 निबंध है, अेक सूं अेक टणकै रा। यूं लखावै जाणै सुदामा आं निबंधां रै मिस मिनखा जात रो पोस्टमार्टम करता होवै। बै सीख देवण में कम विसवास राखै। बस आपरै रचाव में तथ्य अर निरवाळी बात रा सांगोपांग चितराम मांडै।
मिनखा सरीर में जीभ री महिमा नै बखाणता थकां सुदामा लिखै जीभां री चकमक भिड़यां आग ई उपड़ै। ओछी बोली रा बटीड़ सुण आछा भलां रै कीड़यां सी चढ जावै। सोचो दिखाण, मंथरा डील रो नांव थोड़ी हो, बो तो अेक जीभ रो धरम हो जिकै हांसती मुळकती अयोध्या नै ई ऊंधी नांखदी।
सुदामा मुजब ’जादा नीं तो पांच सात मिंट ई सही, जीभ नै रोज अेकांयत में समझावां ‘स्याणी तूं न गाय-भैंस री जीभ, न भेड़ बकरी री। न तूं कागळै दांई कांव-कांव करणै न जलमी अर न कुतियै दांई हाऊ-हाऊ सारू। बोल’र कींनै ई ठार नीं सकै तो बाळ तो मत।’
धण भेळो करणै री कुबाण पर बां री कलम री बानगी देखो-
‘….धन खातर लीलाड़ पर बूक मांड राखी है लोगां। जियां-जियां पश्चिमी भौतिकवादी देसां रो सम्पर्क घनीभूत हुयो पइसां री भूख लोगां में बधती गई अर बध्यां ई जावै। मुक्त आहार-विहार, बदळतो-बधतो पहनाव, इच्छावां रो पसरतो जाळ दिन-दिन बधै। आं सगळां में पइसो बीन अर जरूरतां बराती।
बात नै आगै बधावां अर औळै-दौळै तकावां तो ठाह पड़ै लोभ-लालच री आदतां सूं मजबूर कई लोगड़ां धरम करम रै ओलै आपरी दुकानदारी रा कुड़का लगा राख्या है, कोई में माताजी आवै तो कोई में भैरूंजी। भोळै-ढाळै दीन दुखियां री लैण लाग्योड़ी रैवै बां रै दरबारां में, कठैई सारो आवै ई तो कठैई पटीड़ !
आज री हथाई रो सार ओ है, आपरी बाण-कुबाण री परख करो। जे बा कुटेव है तो उण सूं कियां ई लारो छुडावो। संगत चोखी करो, भलै मिनखां में उठो बैठो। जे आपरी किणी आदत सूं आ जगती कीं और सूणी बण सकै तो उण आदत री सीख दूजां नै ई दिरावो। बाकी बातां आगली हथाई में…। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो !
-लेखक राजस्थानी व हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं







