




यूथ कांग्रेस चुनाव को लेकर इन दिनों सियासी सरगर्मी चरम पर है। इस चुनावी समर में प्रदेशाध्यक्ष पद के लिए मैदान में उतरीं निशा खीचड़ सबसे कम उम्र की प्रत्याशी के रूप में खास चर्चा में हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक शिक्षा प्राप्त कर चुकीं निशा आगे स्नातकोत्तर अध्ययन की इच्छा रखती हैं। वे हनुमानगढ़ नगरपरिषद के पूर्व उपसभापति अनिल खीचड़ की पुत्री हैं और एक राजनीतिक रूप से सक्रिय परिवार से आती हैं। उनके दादा चेतराम खीचड़ कांग्रेस के समर्पित नेता रहे हैं और पूर्व विधायक चौधरी आत्माराम के करीबी माने जाते थे। निशा की माता सुशीला खीचड़ भी पार्षद रह चुकी हैं। 21 अप्रैल से शुरू हुई मतदान प्रक्रिया 20 मई तक चलेगी। चुनाव प्रचार में व्यस्त निशा खीचड़ ने भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर गोपाल झा से लंबी बातचीत में अपने राजनीतिक सफर, मुद्दों और समकालीन बहसों पर खुलकर विचार रखे। प्रस्तुत हैं बातचीत के संपादित अंश

यूथ कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ने का आपका फैसला क्यों?
-मैं कांग्रेस के ‘शक्ति अभियान’ से जुड़ी हूं और राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए लगातार काम कर रही हूं। यूथ कांग्रेस में अक्सर यह धारणा बन जाती है कि यहां वही आगे बढ़ सकता है जो धनाढ्य परिवार से हो। मैंने सोचा, इस मिथक को तोड़ना जरूरी है। मैं आम और किसान परिवार से आती हूं, उम्र में सबसे छोटी हूं, फिर भी मुझे भरपूर सहयोग मिल रहा है। फर्क इतना है कि मेरे सहयोगी सदस्यता की राशि खुद दे रहे हैं, जबकि कई अन्य कई प्रत्याशी अपनी ओर से भुगतान कर रहे हैं। यही असली ताकत है, कार्यकर्ताओं का विश्वास।
आपकी प्राथमिकताएं और मुद्दे क्या हैं, जिनके आधार पर आप चुनाव मैदान में हैं?
-मेरा मकसद बिल्कुल साफ है, महिलाओं की राजनीति में भागीदारी बढ़ाना। शक्ति अभियान के जरिए मैंने महिलाओं की समस्याओं को नजदीक से समझा है। मैं ओबीसी वर्ग से हूं, इसलिए इस वर्ग की पीड़ा भी जानती हूं। आज भी राजस्थान सहित देशभर में पितृसत्तात्मक सोच हावी है। इसे बदलना है तो महिलाओं को निर्णय की राजनीति में आना ही होगा, केवल मंच साझा करने से काम नहीं चलेगा।
राजनीति में आगे बढ़ने के लिए महिलाओं को समझौते करने पड़ते हैं, इस पर चल रही बहस को आप कैसे देखती हैं?
-यह बहस नहीं, हकीकत है। महिलाओं को आज भी दोयम दर्जे का माना जाता है। वे घर और बाहर हर जिम्मेदारी निभाएं, लेकिन जैसे ही बराबरी का हक मांगें या काबिलियत के दम पर आगे बढ़ें, उनके चरित्र पर सवाल खड़े कर दिए जाते हैं। यह पुरुष प्रधान समाज की जड़ता है। बदलाव आसान नहीं, पर जरूरी है और यह बदलाव राजनीति से ही आएगा।
महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर हाल में सियासी विवाद हुआ। आपका पक्ष क्या है?
-नारी वंदन अधिनियम 2023 में कांग्रेस सहित विपक्ष के सहयोग से पारित हो चुका था, लेकिन सरकार ने तीन साल तक उसे लागू नहीं किया। अब अचानक नोटिफिकेशन आया, साथ में परिसीमन और संशोधन की बातें भी। जो कानून लागू ही नहीं हुआ, उस पर संशोधन का क्या अर्थ है? विपक्ष ने जब सवाल उठाए, तो यह झूठ फैलाया गया कि कांग्रेस महिला आरक्षण के खिलाफ है। सच्चाई यह है कि कांग्रेस शुरू से महिला आरक्षण के समर्थन में रही है।
युवाओं की सबसे बड़ी समस्या पेपर लीक बन चुकी है। हाल में नीट परीक्षा भी निरस्त हुई। आप इसे कैसे आंकती हैं?
-सरकार कोई भी हो, पेपर लीक सिस्टम की विफलता है। यह केवल परीक्षा रद्द होने का मामला नहीं, बल्कि लाखों परिवारों के सपनों पर पानी फेरने जैसा है। जरूरतमंद मांएं अपने जेवर बेचकर बच्चों को डॉक्टर या अफसर बनाना चाहती हैं। जब परीक्षा रद्द होती है, तो मेहनत ही नहीं, उम्मीद भी टूटती है। इस पर सख्त और पारदर्शी कार्रवाई जरूरी है।
संविधान जाति-भेद खत्म करने की बात करता है, फिर कांग्रेस जातिगत जनगणना पर जोर क्यों दे रही है?
-क्योंकि बिना सही आंकड़ों के बराबरी संभव नहीं। हमारे नेता राहुल गांधी इस मुद्दे पर गंभीर हैं। आज भी सत्ता और संसाधनों में सबकी समान भागीदारी नहीं है। मौजूदा जनगणना में ओबीसी से जुड़ा एक भी सवाल नहीं पूछा जा रहा, यह अपने आप में बताता है कि सच से क्यों डर है। जातिगत जनगणना से ही वास्तविक स्थिति सामने आएगी।
प्रधानमंत्री की सोना-चांदी न खरीदने की अपील पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
-भारतीय समाज में जेवरात का सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व रहा है। सच तो यह है कि महंगाई इतनी बढ़ चुकी है कि आम और मध्यम वर्ग के लिए खरीदना संभव ही नहीं रहा। गलत आर्थिक नीतियों ने लोगों की कमर तोड़ दी है। अब जब लोग खरीद नहीं पा रहे, तो उपभोग न करने की सीख दी जा रही है। नरेंद्र मोदीजी को महंगाई पर काबू पाना चाहिए, उपदेश देने से पेट नहीं भरता।
क्या आपको नहीं लगता कि यूथ कांग्रेस के चुनाव से गुटबाजी बढ़ती है और एकजुटता प्रभावित होती है?
-निजी तौर पर मैं इस बात से सहमत हूं। कई बार धनबल हावी हो जाता है और समर्पित, निष्ठावान कार्यकर्ता पीछे रह जाते हैं। बेहतर होगा कि पार्टी वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध और जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी दे। संगठन मजबूत होगा तो राजनीति भी मजबूत होगी, पुराने उसूल आज भी उतने ही कारगर हैं।
आखिर में, युवाओं और महिलाओं के लिए आपका संदेश?
-राजनीति किसी एक वर्ग की जागीर नहीं है। अगर बदलाव चाहिए तो आगे आना होगा। डर और बदनामी की राजनीति से बाहर निकलकर हक की राजनीति करनी होगी। मेहनत, ईमानदारी और संगठन, यही तीन चीजें आज भी जीत दिलाती हैं। बाकी शोर तो हर चुनाव में होता ही है।





