



डॉ. अर्चना गोदारा
आज का भारत एक बड़े ही विचित्र मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है। एक ओर विज्ञान, तकनीक, अंतरिक्ष और शिक्षा के क्षेत्र में देश नई ऊँचाइयाँ छूने का सपना देख रहा है, वहीं दूसरी ओर मोबाइल स्क्रीन पर चलती छोटी-छोटी ‘रीलों’ की दुनिया ने समाज की दिशा और सोच को गहराई से प्रभावित करना शुरू कर दिया है। अब स्थिति यह है कि छोटे-छोटे बच्चे तक कैमरे के सामने अभिनय कर रहे हैं, सड़क, स्कूल, खेत, बाज़ार और घर , हर जगह वीडियो बनाने की होड़ दिखाई देती है। पढ़ाई, कौशल और व्यक्तित्व निर्माण की उम्र में अनेक युवा क्षणिक प्रसिद्धि के पीछे भाग रहे हैं। यदि मैं हमारे समय की बात करूं तो 90 के दशक के बच्चों में शायद इतना बौद्धिक ज्ञान नहीं था जितना आज के बच्चों में प्रसिद्धि और पैसे के प्रति है।
विशेष चिंता का विषय तो यह है कि सोशल मीडिया पर लोकप्रिय होने की इस दौड़ में अनेक लोग मर्यादा और गरिमा की सीमाएँ भी लाँघते दिखाई दे रहे हैं। विशेषकर कुछ महिलाएँ और युवतियाँ ऐसी सामग्री प्रस्तुत कर रही हैं जिनका उद्देश्य केवल लोगों का ध्यान आकर्षित करना रह गया है। भड़काऊ हावभाव, निम्न स्तर की भाषा, अस्वाभाविक अभिनय और दिखावे की संस्कृति को ‘आधुनिकता’ या ‘आत्मविश्वास’ का नाम दिया जा रहा है। कुछ ही सेकंड की लोकप्रियता के लिए व्यक्ति अपने व्यक्तित्व, परिवार और सामाजिक सम्मान तक को दाँव पर लगा देता है। यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि सामूहिक मानसिकता में आ रहे बदलाव का संकेत है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो रील संस्कृति ने लोगों के भीतर ‘तुरंत सफलता’ पाने की प्रवृत्ति को अत्यधिक बढ़ा दिया है। पहले किसी व्यक्ति को सम्मान प्राप्त करने के लिए वर्षों की मेहनत, अध्ययन और अनुभव की आवश्यकता होती थी । लेकिन वो सफलता स्थाई होती थी,पर अब कुछ सेकंड का वीडियो लाखों व्यूज़ दिलाकर व्यक्ति को प्रसिद्ध बना देता है। इससे युवाओं के भीतर धैर्य कम हो रहा है। वे कठिन परिश्रम की अपेक्षा आसान लोकप्रियता को अधिक आकर्षक मानने लगे हैं। हर ‘लाइक’ और ‘फॉलोअर’ उनके आत्मविश्वास का आधार बनता जा रहा है। यदि वीडियो पर कम प्रतिक्रिया मिले तो निराशा, चिंता और हीनभावना बढ़ने लगती है। अनेक मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि सोशल मीडिया की अत्यधिक लत से अवसाद, अकेलापन और आत्ममूल्य में कमी जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं।
भारत में इंटरनेट और स्मार्टफोन के प्रसार ने इस प्रवृत्ति को और तेज कर दिया है। वर्ष 2025 तक भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या लगभग 90 करोड़ के आसपास पहुँचने का अनुमान व्यक्त किया गया। सस्ते डेटा और आसान मोबाइल तकनीक ने गाँवों तक इस संस्कृति को पहुँचा दिया है। अब पाँचवीं-छठी कक्षा का बच्चा भी कैमरे के एंगल, फिल्टर और ट्रेंडिंग गानों की जानकारी रखने लगा है, लेकिन उसे पुस्तक पढ़ने या किसी कौशल को सीखने में रुचि कम दिखाई देती है। यह बदलाव भविष्य के लिए चिंताजनक है, क्योंकि किसी भी राष्ट्र की प्रगति उसके ज्ञान, शोध, श्रम और अनुशासन पर निर्भर करती है, केवल मनोरंजन पर नहीं।
यह भी सत्य है कि सोशल मीडिया पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। अनेक लोग इसके माध्यम से शिक्षा, कला, व्यापार और जागरूकता का अच्छा कार्य भी कर रहे हैं। कई शिक्षक ऑनलाइन पढ़ा रहे हैं, कलाकार अपनी प्रतिभा दिखा रहे हैं और छोटे व्यवसायों को पहचान मिल रही है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब यह माध्यम रचनात्मकता के स्थान पर केवल सस्ती लोकप्रियता का साधन बन जाता है। जब समाज में मेहनती वैज्ञानिक, शिक्षक, लेखक या शोधकर्ता की तुलना में केवल वायरल वीडियो बनाने वाले लोगों को अधिक महत्त्व मिलने लगे, तब यह सांस्कृतिक असंतुलन का संकेत होता है।
रील संस्कृति का प्रभाव पारिवारिक संबंधों पर भी दिखाई देने लगा है। पहले परिवारों में संवाद, सामूहिकता और अनुभवों का आदान-प्रदान होता था, जबकि अब अनेक लोग हर पल को कैमरे में कैद करने में व्यस्त रहते हैं। वास्तविक जीवन की संवेदनाएँ धीरे-धीरे प्रदर्शन में बदलती जा रही हैं। कुछ माता-पिता स्वयं अपने छोटे बच्चों से वीडियो बनवाकर उन्हें इंटरनेट पर डालते हैं। बचपन, जो खेल, शिक्षा और संस्कारों का समय होना चाहिए, वह ‘कंटेंट’ बनता जा रहा है। यह स्थिति आगे चलकर बच्चों के मानसिक विकास और आत्मछवि पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।
देश का भविष्य केवल आर्थिक विकास से नहीं बनता, बल्कि उस पीढ़ी से बनता है जो विचारशील, संवेदनशील और मेहनती हो। यदि युवाओं की ऊर्जा केवल आभासी प्रसिद्धि में खर्च होने लगेगी, तो शोध, विज्ञान, साहित्य, कृषि, उद्योग और सामाजिक जिम्मेदारियों के क्षेत्र कमजोर पड़ सकते हैं। कोई भी राष्ट्र केवल मनोरंजन आधारित मानसिकता पर लंबे समय तक प्रगति नहीं कर सकता।
आज आवश्यकता इस बात की है कि युवा सोशल मीडिया का उपयोग साधन के रूप में करें, जीवन का लक्ष्य न बनाएँ। शिक्षा, कौशल, पुस्तकें, तकनीकी ज्ञान, खेल, कला और नैतिक मूल्यों को प्राथमिकता देना समय की माँग है। परिवारों और शिक्षण संस्थानों को भी बच्चों में संतुलित डिजिटल संस्कृति विकसित करनी होगी। प्रसिद्धि तभी सार्थक है जब वह प्रतिभा, ज्ञान और चरित्र पर आधारित हो।
क्षणिक तालियाँ और कुछ दिनों की वायरल लोकप्रियता व्यक्ति को स्थायी सम्मान नहीं दे सकतीं। सच्ची सफलता वही है जो व्यक्ति के व्यक्तित्व को ऊँचा उठाए, समाज को दिशा दे और राष्ट्र के विकास में योगदान करे। भारत की युवा शक्ति यदि अपनी ऊर्जा सही दिशा में लगाए, तो वही शक्ति देश को विश्व में नई पहचान दिला सकती है। लेकिन यदि वह केवल स्क्रीन की चमक में उलझ गई, तो आने वाला समय सामाजिक और मानसिक दोनों स्तरों पर गंभीर चुनौतियाँ लेकर आ सकता है।
-लेखिका राजकीय एनएमपीजी कॉलेज में सहायक आचार्य हैं







