



रोहित अग्रवाल
आज के डिजिटल दौर में विरोध की शक्ल बदल चुकी है। कभी सड़कों पर उतरकर नारे लगाए जाते थे, फिर सोशल मीडिया पोस्ट आए और अब मीम्स, ट्रेंड्स और व्यंग्य के जरिए असंतोष व्यक्त किया जा रहा है। इसी बदलते प्रतिरोध का ताजा उदाहरण है, कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी)। नाम सुनकर हंसी आ सकती है, लेकिन इसके पीछे छिपी भावना हल्की नहीं है। यह एक ऐसे वर्ग की आवाज है, जो खुद को उपेक्षित, अनसुना और व्यवस्था से ठगा हुआ महसूस करता है।
सीजेपी कोई पारंपरिक राजनीतिक दल नहीं, न उसके पास झंडा है, न कार्यालय, न चुनाव चिन्ह। फिर भी सोशल मीडिया पर इसकी मौजूदगी ने स्थापित दलों को आईना दिखा दिया है। महज कुछ ही दिनों में इंस्टाग्राम पर इसके फॉलोअर्स की संख्या करोड़ के करीब पहुंच गई और यही बात इसे ‘मजाक’ की श्रेणी से बाहर निकाल देती है। जब व्यंग्य इतनी तेजी से जनभावना में बदल जाए, तो उसे नजरअंदाज करना सियासी भूल हो सकती है।
असल में ‘कॉकरोच’ शब्द का चुनाव ही पूरी कहानी कह देता है। समाज का वह तबका, जिसे अक्सर ‘अदृश्य’ मान लिया जाता है, जो मुश्किल हालात में भी जिंदा रहता है, पर कभी सुर्खियों में नहीं आता, आज उसी पहचान को हथियार बनाकर सामने है। बेरोजगारी, पेपर लीक, भर्तियों में देरी, अवसरों की कमी और लगातार टलते वादे, ये सब मिलकर युवाओं के धैर्य की परीक्षा ले चुके हैं। जब गंभीर बातों को गंभीरता से नहीं सुना जाता, तब व्यंग्य सबसे असरदार भाषा बन जाता है।
यह केवल भारत की कहानी नहीं। दुनिया भर में न्यू जेनरेशन मौजूदा व्यवस्था से खिन्न दिखती है। सत्ता बदलती है, पर सिस्टम जस का तस रहता है। भारत भी इससे अछूता नहीं। हर चुनाव के साथ उम्मीदें जगती हैं, और कुछ समय बाद वही शिकायतें लौट आती हैं। ऐसे माहौल में सीजेपी का उभार इस बात का संकेत है कि युवा अब सिर्फ वोट बैंक नहीं रहना चाहते, वे सुने जाना चाहते हैं।
यहां सवाल यह नहीं कि सीजेपी का भविष्य क्या होगा या इसे कौन चला रहा है। असली सवाल यह है कि इतनी तेजी से लोग इससे क्यों जुड़ रहे हैं। जब एक अनौपचारिक, बिना संगठन वाली पहल कुछ ही दिनों में भारतीय जनता पार्टी जैसे बड़े दलों को सोशल मीडिया पर पीछे छोड़ दे, तो संदेश साफ है, डिजिटल स्पेस में जनभावना करवट ले रही है। यह ट्रेंड सत्ता के लिए चेतावनी भी है और अवसर भी।
क्या यह नरेंद्र मोदी सरकार के लिए खतरे की घंटी है? सीधा जवाब, हां और नहीं, दोनों। ‘हां’ इसलिए कि यह असंतोष का साफ संकेत है; ‘नहीं’ इसलिए कि यह अभी संगठनात्मक राजनीति नहीं बना है। लेकिन इतिहास गवाह है, जब असंतोष को समय रहते नहीं सुना गया, तो वही व्यंग्य आंदोलन में बदलता है।
सीजेपी का उभार यह भी बताता है कि युवाओं की राजनीति अब भाषणों से नहीं, संवाद से चलेगी। पुराने तरीकों से नई पीढ़ी को साधना मुश्किल है। उन्हें रोजगार चाहिए, पारदर्शिता चाहिए, समयबद्ध फैसले चाहिए। अगर यह मिला, तो मीम्स खुद शांत हो जाएंगे। अगर नहीं मिला, तो मीम्स से बड़ा मंच तैयार होने में देर नहीं लगेगी।
बहरहाल, कॉकरोच जनता पार्टी को हल्के में लेना आसान है, पर समझदारी इसमें है कि इसके पीछे छिपी बेचैनी को समझा जाए। क्योंकि जब समाज का बड़ा वर्ग हंसते-हंसते अपनी पीड़ा कहने लगे, तो समझ लीजिए, मामला गंभीर है। और राजनीति में, गंभीर संकेतों को नजरअंदाज करना अक्सर भारी पड़ता है।
-लेखक टैक्स बार एसोसिएशन हनुमानगढ़ के अध्यक्ष व जाने-माने कर सलाहकार हैं








