




शंकर सोेनी
भारत के सर्वाेच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के भीतर क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह भी कहा कि निजी क्षेत्र, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) और सरकारी सेवाओं में कार्यरत कर्मचारियों के बीच समानता का सिद्धांत अपनाया जाना चाहिए। न्यायालय की टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है, यदि रोजगार की प्रकृति और पद-स्तर को नजरअंदाज कर केवल वेतन के आधार पर किसी उम्मीदवार को आरक्षण से वंचित किया जाता है, तो यह समान परिस्थितियों में रहने वाले ओबीसी व्यक्तियों के बीच मनमाना भेदभाव पैदा करता है। यह निर्णय एक ऐसे पहलू की ओर संकेत करता है, जिस पर आज तक न तो गंभीर चर्चा हुई है और न ही कोई व्यापक समीक्षा। आरक्षण का वास्तविक लाभ आखिर किन परिवारों तक और किस रूप में पहुँचा है? अब समय आ गया है कि आरक्षण नीति पर गंभीर, तथ्यपरक और वैज्ञानिक दृष्टि से विचार किया जाए।
भारतीय संविधान में आरक्षण प्रणाली का उद्देश्य सदियों से जाति और धर्म के आधार पर शोषित, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को विशेष अवसर देकर उन्हें मुख्यधारा में लाना था। इसी उद्देश्य से संविधान में आरक्षण की अवधि प्रारंभ में 10 वर्ष निर्धारित की गई थी।
लेकिन 1960 से 2020 तक संसद ने बार-बार संविधान संशोधन कर इस अवधि को बढ़ाया। हर विस्तार के साथ एक मूलभूत प्रश्न पीछे छूटता गया। क्या कभी यह राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर समीक्षा हुई कि आरक्षण का लाभ वास्तव में किन परिवारों तक पहुँचा और कौन आज भी वंचित है? आज तक यह जानने के लिए कोई समग्र, सार्वजनिक और राष्ट्रीय डेटाबेस उपलब्ध नहीं है कि देश में कितने एससी/एसटी/ओबीसी परिवार हैं। कितने परिवारों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व का लाभ मिला। कितनों को सरकारी नौकरी प्राप्त हुई। कितनों को उच्च शिक्षा में प्रवेश मिला। कितने परिवार पीढ़ियों से लगातार लाभ उठा रहे हैं, और सबसे अहम कितने परिवार ऐसे हैं जिन्हें आज तक एक बार भी आरक्षण का लाभ नहीं मिला।
यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी भी सामाजिक नीति की सफलता का मूल्यांकन केवल उसकी अवधि बढ़ाने से नहीं, बल्कि उसके वास्तविक लाभ-वितरण से किया जाता है। यदि लाभ कुछ गिने-चुने परिवारों तक ही सीमित रह गया है, तो यह नीति की सफलता नहीं, बल्कि उसकी विफलता का संकेत है।
समय-समय पर विभिन्न आयोगों और न्यायालयों ने भी यह संकेत दिया है कि आरक्षण का लाभ सभी तक समान रूप से नहीं पहुँच रहा। तो फिर सवाल उठता है, लोकतंत्र में समीक्षा से डर क्यों? किसी नीति की समीक्षा उसका विरोध नहीं होती।
समीक्षा का उद्देश्य होता है, कमियों की पहचान। वंचितों तक लाभ पहुँचाना और नीति को अधिक न्यायपूर्ण बनाना। यदि यह अध्ययन किया जाए कि किन परिवारों ने एक से अधिक पीढ़ियों तक लाभ प्राप्त किया और कौन आज भी पहली पीढ़ी के अवसर की प्रतीक्षा में है, तो आरक्षण व्यवस्था को अधिक लक्ष्य-आधारित, प्रभावी और न्यायसंगत बनाया जा सकता है।
दुर्भाग्य से आरक्षण पर बहस अक्सर दो अतियों में फँस जाती है, एक पक्ष इसे पूरी तरह समाप्त करने की बात करता है, दूसरा किसी भी समीक्षा को सामाजिक न्याय के विरुद्ध मान लेता है। जबकि वास्तविक आवश्यकता है, समीक्षा के माध्यम से सामाजिक न्याय को और गहरा बनाने की। यदि सबसे वंचित परिवार आज भी पीछे हैं, तो उन्हें प्राथमिकता मिलनी चाहिए। और यदि कुछ परिवारों या समुदायों तक लाभ अत्यधिक केंद्रित हो गया है, तो उस पर भी ईमानदारी से विचार होना चाहिए। क्योंकि सामाजिक न्याय न तो नारे से मजबूत होता है, न ही डर से, वह मजबूत होता है सच, समीक्षा और साहस से।
-लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता व नागरिक सुरक्षा मंच के संस्थापक हैं






