



रूंख भायला
राजी राखै रामजी ! आज बात काम धंधै री, किणी नै बतळा’र देखल्यो भलंई, अेक ई बात, ‘मंदो चालै धाप’र।’ कमायां रैयी कोनी आजकल, खरचा बेजां बध्या है, आवता ई दिसै। बात तो सोळा आना साच है। अबार बजार आपणै हाथ में ई कोनी, चलावणिया कोई और है। हर धंधै में मोटा तांतड़ा आ बड़्या है आखी दुनिया रा, छोटै मोटै दुकानदार रो बटै ई के !! और तो और, सरकारू नौकरी आळा ई घणकरा रोवता दिसै, धाप बां रै ई कोनी। फेर ध्याड़ी मजूरियां री तो बात ई जावण देवो, काम री पक्काई कोनी, हां पेट दोनूं टैम भाड़ो मांगै ई मांगै।
पण सोचण री बात आ भी है, आदमी री भूख ई बेजां बधी है, लालच री कोई सींव कोनी, गफ्फा चाहीजै सबनै ! सुभीतै रै चक्कर में थ्यावस भूलग्या, इण ढाळै आ होड कांई ठाह कठै जाय’र ठमसी। नीं पछै अेक बगत बो भी हो, कै लगोलग पड़ता काळ, फेरूं ई घर में दस जणा जीमता, बैन स्वासणी नै ई हाथ कांचळी देवता अर कमावणिया ई बापूजी खाली अेक ! खेती हो भलंई रूजगार, आ कदी कोनी सुणी कै कोई काम अटक्या होवै। आज सोचूं तो ठाह लागै, कमाई तो बां रै ई पूण पावली ही, पण धिरजाई मोकळी ही बां कन्नै ! थ्यावस इत्ती कै बै आथण दिनुगै गावता-
सीताराम सीताराम सीताराम कहिए
जांहि बिधि राखे राम तांहि बिधि रहिए
महलों में राखे चाहे झोंपड़ी में बास दे
विधि का विधान जान हानि लाभ सहिए
आज री आभासी दुनिया में मिनख कन्नै सो कीं है, पण धिरजाई कोनी। बा किणी बजार में भी कोनी मिलै ! मिलै ई कियां, बेचणिया फगत सुपनां बेच रैया है, दिखावै रो बिणज कर रैया है। अे सुपनां मुलावणिया कोई दूजा थोड़ी है, आपां ई तो हां। बजार तो मांगै जिकै री पुरसगारी करै। थ्यावस कणी मांगी कोनी, तो बजार में बिकै ई कियां !
खैर, जावण देवो बात नै ! मंदै री मार पेटै अेक ठावी बात चेतै आगी, ल्यो बांचो दिखाण। दूर दिसावर में राजगढ़ रा अेक सेठजी हा। आछो बिणज ब्यौपार, क्यांरी कमी कोनी। उणां रै अेक महाराज हो, मतलब रसोई बणावणियो, आपणी भासा में रसोवड़ै रै धणी नै महाराज ई कहीजै। सेठां सारू जीमण बो ई बणाया करतो।
दिनां रो फेर…कै सेठां रा काम धंधा मोळा पड़ग्या, घाटा लागण लाग्या। अेक दिन सिंझ्या पौर में सेठजी चिंता में डूब्या बैठ्या हा। महाराज हेलो दियो-
‘सेठां, जीमण त्यार है, कैवो तो पुरसगारी करूं ?’
सेठजी रो ध्यान भंग होयो, महाराज सूं बोल्या-
‘सुणो महाराज ! जीमण तो लगावो पण काल सूं चेतो करणो है, आपणा काम धंधा अबार कीं मौळा है, कमाई रैयी कोनी, घाटा बध रैया है, इण सारू थे जीमण में अबै मळाई चूंटिया अर गचागच चूरमा बंद कर देवो, होवै जिसी लुखी मिसी आवण दिया करो।’
सेठजी री बात बो महाराज कियां टाळतो, आगलै दिन सूं सेठां नै सादो जीमण पुरसणो सरू कर दियो। सेठजी चुपचपाता जीम लेवता, बिणज मौळी पड़ै तो रोटी किन्नै सूझै ! भागजोग सूं दिन पंदरा कै बित्या हुसी, कै अेक दौ’पारै सेठजी किणी काम सूं घर आया। देख्यो, रसोई में महाराज बैठ्या जीम रैया है, थाळी में गचागच चूरमो है, दो-दो तीवण….।
घणी झाळ आई, पण रोटी जीमतां नै के टोकां। सेठां नै आयो देख महाराज गबागब जीम’र रसोई सूं बारै आया। उण नै देख’र सेठजी कीं रिसाणां सा बोल्या-
श्महाराज, थान्नै कैयो हो नीं, आपणा धंधा कीं मौळा है, काम चाल नीं रैया है, अेकर घी चूरमा बंद करणा हा नीं !’
महाराज सेठां रै मूंडै लागतो हो, सीधी सरकादी-
‘इयां है सेठां ! काम धंधा मौळा पड़्या है थारा, म्हारी तिनखा तो सागी है, म्हूं म्हारै जीमण में क्यूं कमी आवण देवूं !’
सेठजी रा कान खुस’र हाथ में आयग्या। कोई के करल्यै। बात तो बात सी कैयी है म्हाराज। बातां री कमी कठै ! अेक धणी दिनुगै अखबार बांचौ हो, घरआळी कन्नै ई बैठी ही। धणी बोल्यो, सुणै है के, खबर है- ‘देश के आर्थिक हालात खराब, हर भारतीय पर पचास हजार का कर्ज ’।
लुगाई बोली, ‘स्याणो जियां तियां कर’र आपणलै करजै रा अेक लाख रिपिड़ा दे बाळो अर कैय देवो, आगै सूं करजो म्हारै पूछश्र लिया, नीं जणां म्हारी कोई देणदार कोनी !’ अबै बात तो बात है। म्है दूजां रा भरणा क्यूं भरां !
आज री हथाई रो सार ओ है कै ‘मंदा है, काम मौळा है धंधा/पण थ्यावस राखी रब रा बंदा’। कानदान कल्पित आपरै अेक गीत में कैयो है-
हिम्मत राखजै, मत घबराजै, दुख घणेरा आवैला
अलख जगां खेतां में बेली, हीरा बिणज कमावैला
आवैला मैणत कर बाळद, लाख लाख रा हीरा रे….
धंधा ई चालसी, अर दिन ई फुरसी, बस धिरजाई बणाया राख्या। बाकी बातां आगली हथाई में। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेखक राजस्थानी और हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं









