



ग्राम सेतु ब्यूरो
राजस्थान में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) आरक्षण की मौजूदा पात्रता शर्तों में सुधार की मांग को लेकर व्यापक जन जागृति अभियान चलाया जा रहा है। ईडब्ल्यूएस जन जागृति मंच के बैनर तले यह अभियान गैर-राजनीतिक स्वरूप में आगे बढ़ रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में सवर्ण समाज के लोग सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं। अभियान का उद्देश्य केंद्र सरकार का ध्यान ईडब्ल्यूएस आरक्षण से जुड़ी व्यावहारिक विसंगतियों की ओर आकर्षित करना और वास्तविक जरूरतमंदों को इसका लाभ दिलाना है।
इसी कड़ी में हनुमानगढ़ जिला मुख्यालय पर भी जिला स्तरीय कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। यह कार्यक्रम 10 जून को सुबह 11 बजे जीएम रिसोर्ट में होगा। कार्यक्रम में ईडब्ल्यूएस जन जागृति मंच के संयोजक धर्मेंद्र सिंह राठौड़ मुख्य वक्ता के तौर पर शिरकत करेंगे। आयोजन को लेकर स्थानीय स्तर पर तैयारियां तेज कर दी गई हैं। इसमें बीजेपी, कांग्रेस व अन्य पार्टियों से जुड़े सवर्ण लोगों के शामिल होने की संभावना है। विधायक गणेशराज बंसल, अंतरराष्टीय वैश्य महासभा के जिलाध्यक्ष बालकृष्ण गोल्याण, यूथ विंग के जिलाध्यक्ष अमित माहेश्वरी, अरोडवंश सभा टाउन के अध्यक्ष राम लुभाया तिन्ना, ब्राह्मण समाज के अश्विनी पारीक, राजपूत समाज, अग्रवाल समाज आदि के प्रतिनिधि तैयारियों में जुटे हुए हैं।
पूर्व मंत्री धर्मेंद्र सिंह राठौड़ कहते हैं कि वर्ष 2019 में लागू किया गया 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस आरक्षण निश्चित रूप से ऐतिहासिक निर्णय था, जिसने सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर तबके को मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में उम्मीद जगाई। लेकिन मौजूदा पात्रता मानदंड इतने जटिल और अव्यावहारिक हैं कि बड़ी संख्या में वास्तविक जरूरतमंद इससे बाहर रह जा रहे हैं। राठौड़ के मुताबिक, सरकारी भर्तियों और प्रतियोगी परीक्षाओं में ईडब्ल्यूएस वर्ग की सीमित भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि व्यवस्था में कहीं न कहीं गंभीर खामियां हैं। यदि नीति वास्तव में प्रभावी होती, तो इसका असर चयन सूचियों और रोजगार के आंकड़ों में साफ नजर आता। धर्मेंद्र सिंह राठौड़ ने ईडब्ल्यूएस पात्रता में तय की गई भूमि संबंधी शर्तों पर खास आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि पांच एकड़ कृषि भूमि की सीमा आज की आर्थिक परिस्थितियों में बिल्कुल भी व्यवहारिक नहीं है। बढ़ती लागत, मौसम की मार और कम उत्पादन के चलते किसान वर्ग की आय बेहद सीमित हो गई है। इसके बावजूद केवल भूमि के आधार पर उन्हें अपात्र मान लेना सामाजिक न्याय की भावना के विपरीत है। उन्होंने कहा कि कई ऐसे किसान परिवार हैं जिनके पास कागजों में जमीन तो है, लेकिन उससे होने वाली आय परिवार के खर्च तक नहीं निकाल पाती। ऐसे परिवारों को ईडब्ल्यूएस के दायरे से बाहर रखना अन्याय है।
ईडब्ल्यूएस पात्रता में मकान से जुड़ी शर्तों को भी पूर्व मंत्री ने सामाजिक दृष्टि से चिंताजनक बताया। उन्होंने कहा कि संयुक्त परिवारों में रहने वाले कई युवाओं को केवल पात्रता हासिल करने के लिए अलग रहने को मजबूर होना पड़ रहा है। इससे न सिर्फ पारिवारिक ढांचा कमजोर हो रहा है, बल्कि सामाजिक मूल्यों पर भी नकारात्मक असर पड़ रहा है। उनका कहना था कि नीति ऐसी होनी चाहिए जो परिवारों को तोड़े नहीं, बल्कि उन्हें संबल दे। राठौड़ ने केंद्र और राज्य स्तर की नीतियों में असंगति का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि कई समुदाय राज्य स्तर पर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल हैं, लेकिन केंद्र में सामान्य श्रेणी में आने के कारण वे ईडब्ल्यूएस आरक्षण का पूरा लाभ नहीं ले पाते। इस असमानता के कारण समान स्थिति वाले लोग अलग-अलग नियमों में उलझकर रह जाते हैं। उन्होंने बताया कि राजस्थान में पूर्व में अपनाया गया लचीला मॉडल अधिक व्यावहारिक था और राष्ट्रीय स्तर पर भी उसी तरह की नीति लागू की जानी चाहिए।
मंच की प्रमुख मांगें
ईडब्ल्यूएस जन जागृति मंच की ओर से कार्यक्रम में केंद्र सरकार से मांग की जाएगी कि भूमि और आवास से जुड़ी शर्तों को समाप्त किया जाए। पात्रता मानदंडों को अधिक समावेशी और व्यावहारिक बनाया जाए। केंद्र और राज्य की नीतियों में एकरूपता लाई जाए, ताकि किसी वर्ग के साथ भेदभाव न हो।
जनप्रतिनिधियों का समर्थन
हनुमानगढ़ विधायक गणेशराज बंसल ने ईडब्ल्यूएस जन जागृति मंच की मांगों का समर्थन करते हुए कहा कि मौजूदा दौर में यह मांग पूरी तरह व्यावहारिक और समय की जरूरत है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार को इस पर सहानुभूतिपूर्वक विचार कर विसंगतियों को दूर करना चाहिए। विधायक बंसल ने बताया कि 10 जून को होने वाले कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी तय मानी जा रही है। कार्यक्रम में आने वाले लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था भी रखी गई है। अंतरराष्ट्रीय वैश्य महासभा के प्रदेश उपाध्यक्ष तरुण विजय ने भी इस अभियान को जरूरी बताते हुए सवर्ण समाज से अपील की कि वे अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए इस कार्यक्रम में अवश्य भाग लें। कुल मिलाकर, राजस्थान में चल रहा ईडब्ल्यूएस जन जागृति अभियान एक सामाजिक चेतना का रूप लेता जा रहा है। अब देखना होगा कि केंद्र सरकार इस आवाज को कितनी गंभीरता से सुनती है और ईडब्ल्यूएस आरक्षण को वास्तव में जरूरतमंदों तक पहुंचाने के लिए क्या ठोस कदम उठाती है।







