



ग्राम सेतु ब्यूरो.
राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर कांग्रेस के भीतर चल रही पुरानी खींचतान खुलकर चर्चा में आ गई है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के हालिया बयान ने पार्टी के अंदरूनी मतभेदों, 2020 के राजनीतिक संकट और नेतृत्व को लेकर चली पुरानी बहस को फिर से हवा दे दी है। गहलोत ने अपने बयान में 25 सितंबर की घटनाओं, मानेसर प्रकरण और उस दौरान पैदा हुए राजनीतिक हालातों का जिक्र करते हुए पार्टी नेतृत्व के प्रति ‘निष्ठा’ और ‘हाईकमान के निर्णयों का सम्मान’ करने की बात दोहराई। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस में किसी तरह का ‘रिवोल्ट’ हाईकमान के खिलाफ संभव नहीं है और पार्टी ने हर संकट में नेतृत्व का साथ दिया है।
गहलोत के बयान के केंद्र में 2020 का राजस्थान राजनीतिक संकट रहा, जब कांग्रेस सरकार के भीतर गहरी अंदरूनी खींचतान सामने आई थी। उस समय पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट और उनके समर्थक विधायकों के दिल्ली-हरियाणा क्षेत्र में रहने और राजनीतिक बैठकों के चलते सत्ता संतुलन डगमगाने की स्थिति बन गई थी। इसी दौर को ‘मानेसर प्रकरण’ के नाम से भी जाना जाता है।
गहलोत ने अपने बयान में दावा किया कि उस समय सरकार को बचाने में कांग्रेस विधायकों की एकजुटता और हाईकमान पर भरोसा सबसे बड़ी ताकत थी। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी के अधिकांश विधायक अंतिम समय में नेतृत्व के साथ खड़े रहे और सरकार सुरक्षित रही।
गहलोत के बयान में यह संकेत भी साफ दिखा कि पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर लंबे समय से असहमति बनी हुई है। उन्होंने कहा कि जब भी हाईकमान ने बदलाव का फैसला लिया, विधायक नए नेतृत्व के साथ जुड़ गए। यह टिप्पणी अप्रत्यक्ष रूप से पार्टी की संगठनात्मक संरचना और नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया पर सवाल उठाती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान केवल अतीत की घटनाओं का उल्लेख नहीं है, बल्कि वर्तमान में भी पार्टी के भीतर जारी असंतोष और गुटबाजी की ओर इशारा करता है।
अपने बयान में गहलोत ने मीडिया रिपोर्टिंग पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कई बार नेताओं की छवि को लेकर ‘अतिरंजित और गलत खबरें’ चलाई जाती हैं, जिससे राजनीतिक माहौल प्रभावित होता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सोशल मीडिया और कुछ वर्गों द्वारा तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है।
गहलोत ने इसे लोकतंत्र के लिए चुनौती बताते हुए कहा कि जिम्मेदार पत्रकारिता की जरूरत पहले से ज्यादा बढ़ गई है। पूर्व मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि पार्टी को आगे बढ़ने के लिए पुराने विवादों को भूलकर आगे बढ़ना चाहिए। उनके अनुसार, राजनीतिक मतभेदों को व्यक्तिगत दुश्मनी में बदलना कांग्रेस के लिए नुकसानदायक है। उन्होंने दोहराया कि कांग्रेस एक ऐतिहासिक पार्टी है, जिसने देश की आजादी से लेकर आधुनिक भारत के निर्माण में अहम भूमिका निभाई है।
गहलोत ने अपने बयान में सचिन पायलट के साथ अपने संबंधों को लेकर भी टिप्पणी की और कहा कि व्यक्तिगत स्तर पर किसी तरह की दुश्मनी नहीं है, लेकिन राजनीतिक घटनाक्रमों के कारण दूरी और मतभेद बने रहे। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि पार्टी के कई वरिष्ठ नेता जैसे गोविंद सिंह डोटासरा और अन्य नेताओं के साथ मिलकर संगठन को मजबूत करने की जरूरत है।
गहलोत के इस बयान ने एक बार फिर राजस्थान कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को सुर्खियों में ला दिया है। पार्टी के भीतर गुटबाजी, नेतृत्व विवाद और पुराने घटनाक्रमों की चर्चा फिर से तेज हो गई है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि ऐसे बयान संगठन के भीतर संवाद की आवश्यकता को तो दर्शाते हैं, लेकिन साथ ही यह भी बताते हैं कि मतभेद पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। अशोक गहलोत का यह बयान साफ संकेत देता है कि राजस्थान कांग्रेस में 2020 के बाद बनी राजनीतिक दरारें पूरी तरह भरी नहीं हैं। हालांकि नेता एकजुटता और आगे बढ़ने की बात कर रहे हैं, लेकिन पुराने घटनाक्रमों की छाया अभी भी पार्टी की राजनीति पर दिखाई देती है। कुल मिलाकर, यह बयान कांग्रेस के भीतर चल रही जटिल राजनीतिक समीकरणों की एक और झलक पेश करता है, जिसमें भरोसा, मतभेद और रणनीति, तीनों एक साथ चलते नजर आते हैं।





