



डॉ. अर्चना गोदारा
कभी-कभी लगता है कि हम एक अजीब समय के नागरिक हैं। ऐसा समय, जहाँ मनुष्य ने चाँद तक पहुँचने का रास्ता खोज लिया है, लेकिन अपने भीतर पहुँचने का रास्ता वो खोता जा रहा है। यदि हम अपने बचपन को याद करें तो हमारे घर पहले से अधिक सुविधाओं से भरे हुए हैं, मगर मन पहले से अधिक खाली दिखाई देते हैं। संवाद के साधन बढ़े हैं, लेकिन बातचीत घट गई है। लोग एक-दूसरे को और सामाजिक जीवन को पहले से अधिक देख रहे हैं, पर शायद पहले से कम समझ रहे हैं।
कुछ दिन पहले दिल्ली में आग लगने की एक दर्दनाक घटना की खबर आई। कई लोगों ने अपनी जान गंवाई। टीवी चौनलों पर धुआँ था, चीखें थीं, आँकड़े थे और संवेदनाएँ भी थीं। सोशल मीडिया पर शोक व्यक्त किया गया, मोमबत्तियों वाले इमोजी लगाए गए, दुःख प्रकट किया गया। लेकिन अगले ही दिन वही स्क्रीन किसी और खबर, किसी और विवाद, किसी और मनोरंजन से भर गई। यह किसी एक घटना की बात नहीं है। धीरे-धीरे हम ऐसे समाज में बदलते जा रहे हैं जहाँ दुख भी कुछ घंटों का मेहमान रह गया है।
मनोविज्ञान में एक शब्द है-‘डिसेन्सिटाइजेशन’। अर्थात किसी चीज़ को बार-बार देखने के बाद उसके प्रति हमारी संवेदनात्मक प्रतिक्रिया का कम हो जाना। शायद यही हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है। हम दुर्घटनाएँ देखते हैं, युद्ध देखते हैं, आँसू देखते हैं, लेकिन उनका असर हमारी आत्मा तक कम ही पहुँच पाता है। सूचना की अधिकता ने संवेदना की गहराई को कहीं न कहीं प्रभावित किया है।
इसी बीच एक और खबर चर्चा में रही। एक महिला ने सोशल मीडिया पर अपने बहुमूल्य स्वर्ण आभूषणों का प्रदर्शन किया और बाद में चोरी की घटना सामने आई। यह घटना केवल अपराध की कहानी नहीं है। यह हमारे समय की मानसिक संरचना को भी उजागर करती है। आखिर हम अपने जीवन को इतने उत्साह से प्रदर्शित क्यों करना चाहते हैं? क्या हमें वास्तव में दूसरों को दिखाने की आवश्यकता है कि हमारे पास क्या है? या हम अपने भीतर किसी स्वीकृति, किसी प्रशंसा, किसी मान्यता की तलाश कर रहे होते हैं?
दरअसल मनुष्य केवल रोटी, कपड़ा और मकान से नहीं जीता। वह सम्मान, पहचान और स्वीकार्यता से भी जीता है। फर्क केवल इतना आया है कि पहले यह स्वीकार्यता परिवार, पड़ोस और समाज से मिलती थी, अब यह मोबाइल की स्क्रीन से मिलने लगी है। एक तस्वीर पर आए सैकड़ों लाइक हमें क्षणिक प्रसन्नता देते हैं, लेकिन वह प्रसन्नता उतनी ही जल्दी समाप्त भी हो जाती है। फिर मन को एक नई तस्वीर, एक नए प्रदर्शन, एक नई प्रशंसा की आवश्यकता पड़ती है। यह एक ऐसा चक्र है जिसका कोई अंत नहीं।
आज आप हवाई अड्डों पर जाइए। चमकती रोशनियाँ, आकर्षक परिधान, महँगे ब्रांड और एक विशेष प्रकार का आत्मविश्वास दिखाई देता है। वहीं किसी बस अड्डे पर जाइए। वहाँ जीवन का दूसरा दृश्य दिखाई देता है। दोनों स्थानों पर यात्रा करने वाले लोग अपने-अपने गंतव्य की ओर जा रहे हैं, लेकिन समाज ने इन दोनों यात्राओं के बीच प्रतिष्ठा का एक अदृश्य अंतर खड़ा कर दिया है। धीरे-धीरे हमने साधनों को व्यक्तित्व का प्रमाणपत्र बना दिया है। कौन-सी घड़ी पहनते हैं, किस फोन का उपयोग करते हैं, किस होटल में ठहरते हैं, किस वाहन से चलते हैं- इन सबने व्यक्ति के मूल्यांकन में ऐसी जगह बना ली है, जिसकी कल्पना शायद पिछली पीढ़ियाँ नहीं कर सकती थीं।
समस्या यह नहीं है कि लोग अच्छा जीवन जीना चाहते हैं। यह स्वाभाविक और उचित है। समस्या तब शुरू होती है जब जीवन का उद्देश्य अच्छा जीना नहीं, अच्छा दिखाई देना बन जाता है। जब वास्तविकता से अधिक छवि महत्वपूर्ण हो जाती है। जब व्यक्ति अपने सुख का निर्णय अपने अनुभवों से नहीं, बल्कि दूसरों की प्रतिक्रियाओं से करने लगता है।
समाजशास्त्री कहते हैं कि आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह मनुष्य को हमेशा असंतुष्ट बनाए रखती है। यदि आप अपने वर्तमान से संतुष्ट हो गए तो बाजार की गति धीमी पड़ जाएगी। इसलिए हर दिन हमें यह बताया जाता है कि हमारे पास जो है, वह पर्याप्त नहीं है। हमें और चाहिए-और बड़ा घर, और महँगा फोन, और आकर्षक जीवन, और अधिक सफलता। इस ‘और’ की यात्रा का कोई अंतिम पड़ाव नहीं होता।
शायद यही कारण है कि सुविधाओं के इस स्वर्णयुग में संतोष का अकाल दिखाई देता है। हमारे पास वातानुकूलित कमरे हैं, लेकिन बेचौन रातें भी हैं। हमारे पास हजारों ऑनलाइन संपर्क हैं, लेकिन मन की बात कहने वाला एक व्यक्ति ढूँढ़ना कठिन होता जा रहा है। हमारे पास मनोरंजन के अनगिनत साधन हैं, लेकिन भीतर का खालीपन बना रहता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन और विभिन्न मानसिक स्वास्थ्य अध्ययनों के निष्कर्ष लगातार इस ओर संकेत करते हैं कि तनाव, चिंता और अवसाद वैश्विक स्तर पर गंभीर सामाजिक चुनौतियों के रूप में उभर रहे हैं। यह केवल चिकित्सा का विषय नहीं है। यह संस्कृति का भी प्रश्न है। हम किस प्रकार का समाज बना रहे हैं? ऐसा समाज जहाँ सफलता की परिभाषा बैंक खाते से तय होती है या ऐसा समाज जहाँ मनुष्य की संवेदनशीलता, नैतिकता और मानवीय संबंध भी महत्व रखते हैं?
शायद हमें फिर से कुछ पुराने शब्दों को याद करने की आवश्यकता है-संतोष, सादगी, आत्मीयता और संवेदना। ये शब्द आधुनिक नहीं लगते, लेकिन मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने की क्षमता इन्हीं में है। तकनीक हमारे जीवन को आसान बना सकती है, लेकिन अर्थपूर्ण नहीं। बाजार हमें वस्तुएँ दे सकता है, लेकिन आत्मिक शांति नहीं। प्रसिद्धि हमें पहचान दे सकती है, लेकिन आत्मस्वीकृति नहीं।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि हम दुनिया को अपने जीवन का प्रदर्शन करें। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने जीवन को समझें। क्योंकि अंततः सबसे बड़ी उपलब्धि वह नहीं है जो दुनिया को दिखाई दे, बल्कि वह है जो रात के सन्नाटे में हमें अपने ही भीतर शांति का अनुभव करा सके। जिस दिन हम यह अंतर समझ लेंगे, शायद उस दिन सुविधाओं के इस युग में संतोष भी लौटने लगेगा और दिखावे के इस मौसम में संवेदनाएँ फिर से अंकुरित होने लगेंगी।








