


कभी-कभी इतिहास बड़े शहरों की चकाचौंध में नहीं, बल्कि सीमावर्ती कस्बों की धूल भरी गलियों में अपने सबसे मजबूत अध्याय लिखता है। जहाँ साधन कम होते हैं, वहाँ संकल्प बड़ा होता है। हनुमानगढ़ की औद्योगिक यात्रा भी ऐसी ही एक कहानी है, संघर्ष, परिश्रम और आत्मविश्वास की। इसी यात्रा में एक नाम पत्थर की लकीर की तरह दर्ज है, शिवरतन खड़गावत। वे उन विरले व्यक्तित्वों में से थे, जिन्होंने जमीन से उठकर न केवल अपना संसार रचा, बल्कि पूरे क्षेत्र को उद्योग की नई पहचान दी। पाँच रुपये रोज़ की कमाई से करोड़ों के टर्नओवर तक का सफर तय करने वाले कर्मयोगी शिवरतन खड़गावत की कहानी लाखों-करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरक है।


गोपाल झा
हनुमानगढ़ जिला लंबे समय तक कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के लिए जाना जाता रहा। यहाँ उद्योग का मतलब आटा-चक्की, गिन्नी या खाद-बीज तक सीमित था। ऐसे माहौल में रसायन आधारित उद्योग स्थापित करना किसी दुस्साहस से कम नहीं था। इसी दुस्साहस को संकल्प में बदलने वाले व्यक्ति थे, शिवरतन खड़गावत, खड़गावत ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज के संस्थापक। सन् 1952 में एक साधारण परिवार में जन्मे शिवरतन खड़गावत के पिता स्वर्गीय जेठमल खड़गावत राज्य सेवा से सेवानिवृत्त कर्मचारी थे। परिवार का अधिकांश झुकाव सरकारी, प्रशासनिक और चिकित्सा सेवाओं की ओर था, लेकिन शिवरतन खड़गावत ने तय किया कि वे लीक पर नहीं चलेंगे। हाईस्कूल के बाद पढ़ाई छोड़कर उन्होंने उद्योग के कठिन रास्ते को चुना और यही निर्णय आगे चलकर हनुमानगढ़ के औद्योगिक इतिहास का टर्निंग पॉइंट बना।
उन्हें उद्योगपति बनने की प्रेरणा अपने दादा स्वर्गीय आशुराम जी खड़गावत से मिली, जो श्रीगंगानगर के प्रमुख ठेकेदारों में गिने जाते थे। शिवरतन खड़गावत उन्हें अपना गुरु मानते थे। वहीं, उनकी माताश्री स्व. कमला देवी खड़गावत उनके जीवन की असली धुरी थीं, संघर्ष के समय में संबल, और सफलता के समय में संयम की सीख।
1500 रुपये से शुरू हुई कहानी
सन् 1969, उम्र मात्र 17 वर्ष। जेब में बड़े सपने और हाथ में केवल 1500 रुपये। मित्रों के आर्थिक सहयोग से उन्होंने एक लांड्री शुरू की। पाँच वर्षों तक रोज़ दस घंटे स्वयं काम किया। आमदनी? सिर्फ पाँच रुपये रोज़। पहले साल का कुल कारोबार लगभग 2000 रुपये। लेकिन एक बात अडिग रही, क्वालिटी से कभी समझौता नहीं। यही वजह थी कि नोहर, भादरा जैसे 100 किलोमीटर दूर के इलाकों से भी लोग उनके यहाँ ड्राई-क्लीनिंग के लिए आते थे।
रसायन उद्योग में ऐतिहासिक कदम
सन् 1977 में उन्होंने हनुमानगढ़ की औद्योगिक दिशा ही बदल दी। राजस्थान वित्त निगम के सहयोग से मात्र 2.50 लाख रुपये के ऋण पर उन्होंने मैसर्स इंडिया ग्लू एंड फर्टिलाइजर मिल की स्थापना की। यह प्रदेश की पहली और एकमात्र बोन पाउडर निर्माण इकाई थी। कृषि प्रधान जिले में यह रसायन आधारित उद्योग किसी क्रांति से कम नहीं था। इसके बाद पीछे मुड़कर देखने का समय नहीं था। 1987 में एस.एस. केमिकल्स इंडस्ट्रीज की स्थापना हुई, जहाँ देश की रक्षा सेवाओं के लिए प्रोटीन बेस फोम कम्पाउंड का निर्माण शुरू हुआ। यह यूनिट सेना, वायुसेना और नौसेना को आपूर्ति करने वाली अग्रणी इकाई बनी।
उद्योगों की श्रृंखला और वैश्विक पहचान
इसके बाद एक-एक कर जय शिव रेजिन्स प्रा. लि., शिवम् एडहेसिव प्रा. लि. और एस.एस. ब्लोकेम प्रा. लि. जैसी इकाइयाँ स्थापित हुईं। डब्ल्यूटीओ के बाद की प्रतिस्पर्धा को भाँपते हुए उन्होंने उत्पादन लागत घटाई और निर्यातोन्मुख उत्पाद विकसित किए। उनके उत्पाद आज कागज, फर्नीचर, केबल, फूड पैकिंग, मेडिकल डिवाइसेज, रक्षा, रबर, पीवीसी, लेदर, दवाइयों और पेट्रोलियम आग नियंत्रण जैसे असंख्य क्षेत्रों में उपयोग होते हैं। बांग्लादेश से लेकर अमेरिका, रूस से लेकर इटली तक, खड़गावत ग्रुप के उत्पादों ने भारत की औद्योगिक गुणवत्ता का झंडा विदेशों में गाड़ा।
अनुशासन, तकनीक और मानवता
शिवरतन खड़गावत खड़गावत आधुनिक तकनीक के पक्षधर थे। लगभग एक करोड़ रुपये की नवीनतम मशीनरी स्थापित की गई। लेकिन मशीनों से ज्यादा अहम थे उनके कर्मचारी। वे उन्हें मजदूर नहीं, टीम का हिस्सा मानते थे। आवास, पीएफ, ईएसआई, मुफ्त चिकित्सा, बच्चों की पढ़ाई, सबकी जिम्मेदारी उन्होंने खुद उठाई। पुराने जमाने की सोच, लेकिन ठोस नतीजे, यही उनकी खासियत थी।
सम्मान और सादगी
उन्हें राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के हाथों राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधराराजे के हाथों राजस्थान एक्सपोर्ट अवार्ड, राजस्थान वित्त निगम के गोल्ड और प्लेटिनम कार्ड, और अनेक राज्य व जिला स्तरीय सम्मान प्राप्त हुए। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि इन सबके बावजूद उनमें रत्ती भर घमंड नहीं था। वे कहते थे,:समय बर्बाद करना सबसे बड़ा अपराध है।’ एसी ऑफिस में बैठने से बेहतर वे फैक्ट्री में खड़े रहना पसंद करते थे, कुर्सी नहीं, सिर्फ काम।
4 जून को शिवरतन खड़गावत का निधन हुआ। पिछले कुछ वर्षों में दो युवा पुत्रों मनीष और अमित के असामयिक निधन का दर्द उन्होंने भीतर ही भीतर सहा, कभी दिखाया नहीं। आज खड़गावत ग्रुप की बागडोर उनके छोटे पुत्र गौरव खड़गावत के हाथों में है, जो उसी परंपरा, गुणवत्ता, अनुशासन और कर्म को आगे बढ़ा रहे हैं।
सामाजिक कार्यों में अग्रणी
सफल उद्योगपति, समय का अभाव लेकिन शिवरतन खड़गावत के मन में समाजसेवा की भावना सदैव बलवती रही। उन्होंने नई खुंजा में गोशाला की स्थापना की। उनकी लगन, अथक मेहनत और विजन का परिणाम है कि आज गोशाला आत्मनिर्भर है। उन्होंने नई खुंजा स्थित कल्याण भूमि का लुक बदल दिया। खड़गावत फैमिली अब उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है। उनके पुत्र गौरव, पौत्र गौतम व अन्य परिजन उनके आदर्शों पर चलकर बेहतर करने की बात कहते हैं। उनके पुत्र गौरव खड़गावत कहते हैं, ‘पापा के अधूरे सपने को साकार करना हमारा धर्म है। गोशाला हो या कल्याणभूमि, हमारा परिवार अपनी तरफ से सौ प्रतिशत समय देकर उनके सपने को साकार करने का प्रयास करेगा।’











