





गोपाल झा
कांग्रेस क्यों हार रही है? यह सवाल जितना पुराना है, उतना ही प्रासंगिक भी। हर चुनाव के बाद कांग्रेस के भीतर आत्ममंथन का दौर चलता है। कमेटियां बनती हैं, रिपोर्टें आती हैं, अधिवेशन होते हैं, प्रस्ताव पारित होते हैं और फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है। जैसे बीमारी का पता तो चल गया हो, लेकिन इलाज शुरू करने की हिम्मत न जुटी हो।
सच पूछिए तो कांग्रेस कमजोर नहीं है। उसके पास आज भी देशव्यापी संगठन है, विचारधारा है, इतिहास है और लाखों कार्यकर्ता हैं। लेकिन वह खुद अपने हाथों अपनी ताकत को जाया कर रही है। कांग्रेस को सबसे ज्यादा नुकसान उसके विरोधी नहीं, उसके ‘अपने लोग’ पहुंचा रहे हैं। यह बात कड़वी जरूर है, मगर हकीकत भी यही है।
राजस्थान इसका ताजा नमूना है। यहां कांग्रेस भाजपा से कम और अपने भीतर की लड़ाइयों से ज्यादा जूझ रही है। राजनीति में मतभेद होना बुरी बात नहीं है। लोकतांत्रिक दलों में विचारों का टकराव स्वाभाविक है। लेकिन जब मतभेद ‘मनभेद’ में बदल जाएं और संगठन से बड़ा व्यक्ति हो जाए, तब संकट पैदा होता है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा छह साल का लंबा कार्यकाल पूरा कर चुके हैं। उन्हें भी मालूम है कि निकाय और पंचायतीराज चुनावों के बाद संगठनात्मक फेरबदल की संभावना है। ऐसे में उनकी राजनीति संगठन विस्तार से ज्यादा अपने अगले ‘ठिकाने’ की तलाश करती दिखाई देती है। ‘नेता प्रतिपक्ष’ पद पर नजर हो या दिल्ली में अपनी स्वीकार्यता बनाए रखने की कोशिश, उनकी गतिविधियां उसी दिशा में जाती नजर आती हैं। कभी वे गहलोत खेमे को संदेश देते हैं, कभी पायलट समर्थकों को। कभी राहुल गांधी मिली ‘शाबाशी’ का हवाला देते हैं। लेकिन संगठन केवल ‘शाबाशी’ से नहीं चलता, उसे भरोसे, संवाद और सामूहिक नेतृत्व की जरूरत होती है।
उधर अशोक गहलोत हैं। राजस्थान कांग्रेस में उनका कद आज भी सबसे बड़ा है। लेकिन मानेसर प्रकरण के बाद दिल्ली और गहलोत के रिश्तों में जो दरार आई, वह पूरी तरह भरती दिखाई नहीं देती। गांधी परिवार को शायद उम्मीद थी कि गहलोत हर परिस्थिति में आलाकमान की इच्छा के अनुरूप चलेंगे। लेकिन राजनीति में हर नेता की अपनी जमीन होती है और अपनी सीमाएं भी। गहलोत ने अपनी राजनीतिक समझ के अनुसार फैसले लिए। उसके बाद जो तल्ख़ी पैदा हुई, उसकी परछाईं आज भी दिखाई देती है।
दिलचस्प बात यह है कि सत्ता से बाहर होने के बाद भी गहलोत लगातार कांग्रेस और गांधी परिवार के बचाव में खड़े दिखाई देते हैं। भाजपा जब भी राहुल गांधी या कांग्रेस नेतृत्व पर हमला करती है, गहलोत जवाब देने वालों में सबसे आगे रहते हैं। मगर रिश्तों की बर्फ पूरी तरह पिघली हो, ऐसा अब भी नहीं लगता। राजनीति में कभी-कभी खामोशी भी बहुत कुछ कह जाती है।
सचिन पायलट का रास्ता अलग है। वे इस समय ‘इंतजार की राजनीति’ कर रहे हैं। न वे सरकार के खिलाफ बहुत मुखर हैं और न संगठन के भीतर कोई बड़ा आंदोलन खड़ा कर रहे हैं। वे जानते हैं कि 2028 उनके राजनीतिक जीवन का अहम पड़ाव हो सकता है। इसलिए वे जल्दबाजी में कोई ऐसी चाल नहीं चलना चाहते जो भविष्य की संभावनाओं को नुकसान पहुंचाए। यह उनकी रणनीति हो सकती है, लेकिन इससे संगठन को वह ऊर्जा भी नहीं मिल रही जिसकी उसे जरूरत है।
यहीं से राजस्थान कांग्रेस की तस्वीर और पेचीदा हो जाती है। पहले संघर्ष दो खेमों के बीच था। अब तीसरा ध्रुव भी उभर आया है। डोटासरा अपनी अलग राजनीतिक पहचान गढ़ने में लगे हैं। नतीजा यह है कि कांग्रेस अब द्वंद्व नहीं, त्रिकोणीय खींचतान का मैदान बन गई है। और जब पार्टी के भीतर तीन-तीन ‘दरबार’ सजने लगें तो कार्यकर्ता असमंजस में पड़ जाता है कि आखिर उसका ‘सरदार’ कौन है।
निकाय चुनावों में यह तस्वीर और साफ दिखाई देती है। टिकट वितरण संगठन निर्माण का अवसर होना चाहिए, लेकिन वह ताकत दिखाने का जरिया बन गया है। जिलों में गुटबाजी अपने चरम पर है। हनुमानगढ़ में भी यही मंज़र दिखाई देता है। पुराने और नए नेतृत्व के बीच दूरी है। व्यक्तिगत निष्ठाएं संगठनात्मक प्रतिबद्धता पर भारी पड़ रही हैं। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो हर दौर में मौजूद रहते हैं। उनकी राजनीति किसी विचार या संगठन से नहीं, अपने फ़ायदे से शुरू होती है और वहीं खत्म हो जाती है। ऐसे लोग हर नेता के आसपास मिल जाएंगे। वे सलाहकार कम और ‘ख़ुशामदीद’ ज़्यादा होते हैं। उनका मकसद पार्टी नहीं, अपना रसूख बचाना होता है।
दिक्कत यह है कि कांग्रेस का बड़ा हिस्सा चुनाव से पहले विरोधियों से नहीं, अपने ही लोगों से लड़ने में ऊर्जा खर्च कर देता है। जब तक चुनाव का बिगुल बजता है, तब तक थकान हौसले पर भारी पड़ने लगती है। फिर हार मिलती है और हार के बाद नई समीक्षा शुरू हो जाती है। वही सवाल, वही जवाब, वही रिपोर्टें।
राजनीति आखिरकार जनता के भरोसे का खेल है। जनता उस दल पर भरोसा क्यों करेगी जो खुद अपने ऊपर भरोसा नहीं कर पा रहा? कांग्रेस की असली चुनौती भाजपा नहीं है। उसकी असली चुनौती उसका अपना बिखराव, उसकी अपनी गुटबाजी और उसका अपना अहंकार है।
विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं। समय भी है और अवसर भी। लेकिन सुधार का पहला कदम यह स्वीकार करना होगा कि बीमारी बाहर नहीं, भीतर है। अगर कांग्रेस यह सच मान ले तो इलाज मुश्किल नहीं है। अगर नहीं मानेगी, तो फिर हार की वजह खोजने के लिए नई समितियां बनती रहेंगी और कांग्रेस अपने ही बनाए हुए दायरे में चक्कर काटती रहेगी।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं








