





गोपाल झा
हजारों साल बीत गए। समय बदल गया। सभ्यताएं बदल गईं। राजा बदल गए। राज्य बदल गए। लेकिन कृष्ण नहीं बदले। वे आज भी हमारे बीच हैं। किसी मंदिर में। किसी भजन में। किसी बांसुरी की धुन में। किसी मां की आंखों में। किसी प्रेमी के इंतजार में। और शायद हमारे भीतर भी। कोई उन्हें भगवान माने। कोई महापुरुष। कोई दार्शनिक। कोई महान रणनीतिकार। मानना या न मानना निजी दृष्टिकोण है। लेकिन कृष्ण के व्यक्तित्व से बच पाना मुश्किल है।
कृष्ण जीवन हैं। पूरा जीवन। जन्म लेते ही माता-पिता से बिछुड़ जाना। क्या पीड़ा रही होगी उस बालक के हिस्से में? मथुरा पीछे छूट गई। मां देवकी पीछे छूट गईं। पिता वसुदेव पीछे छूट गए। और कृष्ण पहुंच गए गोकुल। नंद बाबा की गोद मिली। यशोदा मैया का वात्सल्य मिला। वहीं कृष्ण बड़े हुए। माखन चुराया। गोपियों को छेड़ा। गायें चराईं। बांसुरी बजाई। लीलाएं कीं। लेकिन इन लीलाओं में भी जीवन का दर्शन छिपा था। कृष्ण ने प्रेम को नया अर्थ दिया। ऐसा प्रेम, जिसमें अधिकार नहीं था। वासना नहीं थी। स्वार्थ नहीं था। बस समर्पण था।
राधा थीं। कृष्ण थे। लेकिन दोनों के बीच विवाह का बंधन नहीं था। फिर भी प्रेम अमर हो गया। क्यों? क्योंकि प्रेम शरीर से ऊपर उठ गया था। कृष्ण शायद यही समझा गए कि प्रेम पाने का नाम नहीं। प्रेम तो देने का नाम है।
फिर वही कृष्ण बड़े होते हैं। बांसुरी वाला बालक अब राजनीति के मैदान में उतरता है। कंस का अंत होता है। मथुरा बदलती है। द्वारका बसती है। और कृष्ण के सामने आता है महाभारत। यहां कृष्ण का एक और रूप दिखाई देता है। रणनीतिकार का। प्रबंधक का। कूटनीतिज्ञ का। वे जानते थे कि युद्ध केवल तलवार से नहीं जीता जाता। बुद्धि भी चाहिए। समय की पहचान चाहिए। मनुष्य की पहचान चाहिए। और सबसे बढ़कर चाहिए, सही पक्ष का चुनाव।
कृष्ण ने अर्जुन को केवल युद्ध करना नहीं सिखाया। उन्होंने उसे कर्तव्य समझाया। कुरुक्षेत्र में अर्जुन टूट गया था। हाथ कांप रहे थे। गांडीव नीचे था। अपने ही सामने थे।
गुरु थे। बंधु थे। मित्र थे। अर्जुन ने कहा, मैं नहीं लड़ूंगा। तब कृष्ण बोले। गीता शुरू हुई। वह संवाद केवल अर्जुन और कृष्ण के बीच नहीं था। वह संवाद हर उस मनुष्य के लिए था जो जीवन की किसी न किसी कुरुक्षेत्र में खड़ा है।
हम भी तो रोज लड़ते हैं। कभी परिस्थितियों से। कभी अपनों से। कभी अपने ही मन से। कभी जीत सामने होती है। फिर भी हम हार मान लेते हैं। कभी रास्ता साफ होता है। फिर भी हम चल नहीं पाते।
कृष्ण कहते हैं, कर्म करो। फल की चिंता मत करो। कितनी सरल बात। और कितना कठिन जीवन! श्रीमद्भगवद्गीता शायद इसलिए अमर है। उसमें जीवन है। संघर्ष है। कर्तव्य है। संशय है। ज्ञान है। भक्ति है। वैराग्य है।
प्रबंधन की भाषा में देखें तो कृष्ण जैसा प्रबंधन गुरु मिलना कठिन है। महाभारत का युद्ध उन्होंने स्वयं नहीं लड़ा। रथ चलाया। लेकिन युद्ध की दिशा तय की। सैनिकों से अधिक मनोबल को संभाला। अर्जुन को संभाला। समय को संभाला। परिस्थितियों को संभाला। और सबसे बड़ी बात, उन्होंने स्वयं को संभाला।
वे विष्णु के अवतार हैं। फिर भी रणछोड़ कहलाने में संकोच नहीं किया। यह कृष्ण की सबसे बड़ी सीखों में से एक है। हर लड़ाई लड़ना जरूरी नहीं। कभी पीछे हटना भी बुद्धिमानी है। हर मोर्चे पर अड़ जाना वीरता नहीं। कभी झुकना पड़ता है। कभी रास्ता बदलना पड़ता है। कभी रण छोड़ना पड़ता है। क्योंकि जीवन केवल जीतने का नाम नहीं। जीवन सही समय पर सही निर्णय लेने का नाम भी है। कृष्ण इसलिए अद्भुत हैं।
वे एक ही समय में बालक भी हैं। प्रेमी भी। मित्र भी। राजा भी। कूटनीतिज्ञ भी। सारथी भी। दार्शनिक भी। और योगेश्वर भी। शायद इसीलिए कृष्ण को समझना इतना आसान नहीं। उनकी लीलाएं केवल कथाएं नहीं हैं। वे संकेत हैं। उनके निर्णय केवल घटनाएं नहीं हैं। वे जीवन के सूत्र हैं। उनकी बांसुरी केवल संगीत नहीं है। वह भीतर बुलाती है। गीता केवल ग्रंथ नहीं है। वह भीतर के अंधेरे में दीपक है। कृष्ण को जानना हो तो केवल कथा मत पढ़िए।
कृष्ण को महसूस कीजिए। यशोदा की आंखों से देखिए। राधा के हृदय से प्रेम कीजिए। अर्जुन की तरह अपने संशय को स्वीकार कीजिए। और कृष्ण की तरह जीवन के हर मोड़ पर मुस्कुराइए। क्योंकि जीवन भी तो एक कुरुक्षेत्र है। हर दिन कोई न कोई युद्ध सामने खड़ा है। हर दिन कोई निर्णय लेना है। हर दिन कुछ छोड़ना है। हर दिन कुछ चुनना है। ऐसे में कृष्ण बाहर से नहीं आएंगे। गीता की क्लास लेने वे अब लौटने वाले नहीं। हमें ही गीता खोलनी होगी। हमें ही पढ़ना होगा। हमें ही समझना होगा। और शायद एक दिन, पढ़ते-पढ़ते, समझते-समझते, हमारे भीतर से कोई धीमी-सी आवाज आए, कृष्ण कहीं बाहर नहीं हैं। वे तो यहीं हैं। हमारे भीतर। बस उन्हें देखने के लिए आंख नहीं, दिव्य दृष्टि चाहिए। जय श्रीकृष्ण।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं






