





श्याम मिड्ढ़ा
साहित्य जगत, बाल मन की दुनिया और संगरिया की माटी को अपनी लेखनी से समृद्ध करने वाले सुप्रसिद्ध वरिष्ठ बाल साहित्यकार, व्यंग्यकार एवं शिक्षाविद् गोविंद शर्मा का 80 वर्ष की आयु में 26 अगस्त 2026 को निधन हो गया। उनके देहावसान से न केवल संगरिया, बल्कि देश के हिंदी बाल साहित्य क्षेत्र में एक अपूरणीय शून्यता उत्पन्न हो गई है।
4 जून 1946 को जन्मे गोविंद शर्मा उन विरले व्यक्तित्वों में से थे, जिन्होंने अपनी रचनाधर्मिता से स्वयं की विशिष्ट पहचान तो बनाई ही, साथ ही संगरिया का नाम भी पूरे देश के साहित्यिक मानचित्र पर स्थापित किया। स्वर्गीय बजरंगदास एवं जीवनी देवी के सुपुत्र गोविंद शर्मा का साहित्यिक जीवन विद्यार्थी काल से ही आरंभ हो गया था। उन्होंने बी.ए., प्रभाकर, साहित्य रत्न के साथ-साथ ‘विद्या-वाचस्पति’ (मानद्) की उपाधि प्राप्त की थी।
ऐतिहासिक शिक्षण संस्थान ग्रामोत्थान विद्यापीठ के संगठन सचिव के रूप में उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा समर्पित किया। संस्था के प्रशासनिक एवं सामाजिक सरोकारों में बेहद सक्रिय रहने के बावजूद वे एक रचनाकार के रूप में निरंतर सजग और सृजनरत रहे।
गोविंद शर्मा ने वर्ष 1971 से अनवरत बाल साहित्य, व्यंग्य एवं जीवनी साहित्य का लेखन आरंभ किया। उन्होंने लगभग 70 पुस्तकें लिखीं, जिनमें 60 से अधिक पुस्तकें केवल बाल पाठकों के लिए थीं।
वे मानते थे कि ‘बच्चों के लिए लिखना बहुत मुश्किल है। जब तक खुद बच्चे न बन जाओ, बच्चों के लिए लिख ही नहीं सकते। बाल मनोविज्ञान को वही समझता है, जो खुद को बच्चों की जगह रखकर देखे।’
बाल वाटिका मासिक पत्रिका के सम्पादक-डॉ. भैरूलाल गर्ग ने एक बार कहा था, ‘गोविंद शर्मा बाल कहानियों के कथानक को लंबे समय तक जीते हैं, तब कहीं उनका रचाव बनता है। इसी कारण उनकी कहानियों में यथार्थ, मूर्तरूप में जीवंतता के साथ आता है।’ नेशनल बुक ट्रस्ट से आई उनकी चित्रकथा ‘डोबू’ और ‘दोस्ती का रंग’ (25 कहानियों का संग्रह) बाल पाठकों को लुभाती हैं। उनकी रचनाओं में बाल संवाद, मनोरंजन और भारतीय संस्कारों की त्रिवेणी दिखाई देती है।
गोविंद शर्मा की लेखनी बहुआयामी थी। उन्होंने बाल कथा, बाल काव्य, बाल उपन्यास, व्यंग्य और महान विभूतियों की जीवनी पर प्रचुर साहित्य रचारू पर्यावरण एवं प्रकृति चेतना पर- पेड़ और बादल, मुकदमा हवा-पानी का, अपने अभयारण्य, वनराज और गजराज, पानी बोला जोर से, हमें हमारा घर दो। वहीं महापुरुष एवं जीवनी साहित्य पर केंद्रित तीन पुस्तकें बातें गांधीजी की, ऐसे थे हमारे बापू, महात्मा गांधी की महानता तथा स्वामी केशवानंद जी के व्यक्तित्व पर ‘ऐसे थे स्वामी केशवानंद एवं कहानी केशवानंद की’।
उनकी चर्चित बाल कथाएँ एवं चित्रकथाएँ पर आधारित चालाक चूहे और मूर्ख बिल्लियाँ (पुरस्कृत), सबका देश एक है (पुरस्कृत), कालू कौआ (पुरस्कृत), सवाल का बवाल, मुझे तारे चाहिए, समझदारी से दोस्ती, चीची ने किया कमाल, मेहनत का मंत्र, सबसे बड़ा तिरंगा, बबलू नाचा झूमकर, खैरू जीत गया। उनकी रचनाएँ विभिन्न शैक्षणिक पाठ्यपुस्तक पाठ्यक्रमों में शामिल की गई। राजस्थान शिक्षा विभाग की कक्षा 7 की हिंदी पुस्तक में भी उनकी कृतियों को स्थान मिला।
दूरदराज के ग्रामीण अंचल संगरिया में रहकर साहित्य की अलख जगाने वाले गोविंद शर्मा जी को अनेक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय एवं राज्यस्तरीय सम्मान प्राप्त हुएरू केंद्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार, भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार (भारत सरकार – 1999), राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार (1987, 2000 – शंभूदयाल सक्सेना पुरस्कार), शकुन्तला सिरोटिया पुरस्कार (1987), बाल गंगा संस्थान पुरस्कार, जयपुर (2003), विक्रमशिला विद्यापीठ (उज्जैन) द्वारा ‘विद्या-वाचस्पति’ की मानद उपाधि, पं. हरदास पाठक स्मृति पुरस्कार, ब्रजेश्वर स्वरूप स्मृति पुरस्कार एवं पंडित भूपनारायण दीक्षित बाल साहित्य पुरस्कार।
गोविंद शर्मा का व्यक्तित्व केवल बाल साहित्य तक सीमित नहीं था। वे जितने सहज भाव से कोमल बाल मन की थाह लेते थे, उतनी ही तत्परता से अपने व्यंग्य बाण छोड़ते थे। उनके व्यंग्य का निशाना किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि पूरी सामाजिक व्यवस्था और माहौल पर होता था, जो पाठक को गुदगुदाने के साथ सोचने पर विवश कर देता था।
साहित्यकार वेदव्यास ने एक आलेख में गोविंद शर्मा का जिक्र करते हुए लिखा था.. बच्चों में साहित्य की दुनिया को समझने और उनके सपनों में भविष्य को पढ़ने की सूझ-बूझ सामान्यतः हर रचनाकार में नहीं होती.. बहुत कम लेखक होते हैं जो बच्चों के मनोविज्ञान को बहुत धैर्य से रेखांकित करते हैं.. गोविंद शर्मा राजस्थान के उन गिने-चुने लेखकों में से एक हैं जो बाल जगत की गहराइयों को निरंतर पढ़ते और लिखते हैं।
गोविंद शर्मा का जाना सिर्फ एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि उस पीढ़ी का प्रस्थान है जिसने साहित्य को समाज सुधार, संस्कार और चेतना का माध्यम बनाया। उनके निधन पर साहित्यकार व सेवानिवृत्त अनाउंसर राजेश चड्ढा ने कहा -बाल साहित्य के समर्पित साधक गोविन्द शर्मा का निधन बाल-मन के एक सच्चे चितेरे का अवसान है। हनुमानगढ़ के संगरिया की मिट्टी से उठकर उन्होंने अपनी सहज, मूल्यपरक कहानियों और नाटकों से पीढ़ियों में मानवीय संस्कार बोए। उनका सादगीपूर्ण व्यक्तित्व और बाल-सुलभ आत्मीयता साहित्य जगत में सदैव स्मरणीय व प्रेरक रहेगी। महान साहित्य मनीषी को शत-शत नमन!






