









डॉ. सविता सोनी
शादी के बाद लगभग हर दंपति अपने परिवार को आगे बढ़ाने और संतान सुख पाने का सपना देखता है। लेकिन कई बार नियमित वैवाहिक संबंधों के बावजूद गर्भधारण नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति को बांझपन या इंफर्टिलिटी कहा जाता है। पहले इस विषय पर खुलकर बात नहीं की जाती थी, लेकिन आज यह एक आम स्वास्थ्य समस्या के रूप में सामने आ रही है। राहत की बात यह है कि आधुनिक चिकित्सा में इसके कारणों का पता लगाने और इलाज के कई प्रभावी विकल्प उपलब्ध हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि 35 वर्ष से कम उम्र की महिला एक वर्ष तक बिना किसी गर्भनिरोधक उपाय के नियमित संबंध बनाने के बावजूद गर्भधारण नहीं कर पाती है, तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। वहीं 35 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को छह महीने के प्रयास के बाद ही जांच शुरू करवा लेनी चाहिए। 40 वर्ष की उम्र के बाद तो और भी जल्दी विशेषज्ञ की राय लेना बेहतर माना जाता है।
इंफर्टिलिटी के कारण केवल महिलाओं में ही नहीं, बल्कि पुरुषों में भी हो सकते हैं। कई मामलों में दोनों की स्वास्थ्य स्थितियां इसकी वजह बनती हैं। इसलिए केवल महिला को दोष देना पूरी तरह गलत और गैर-वैज्ञानिक सोच है।
महिलाओं में अंडाणु बनने की प्रक्रिया में गड़बड़ी, हार्माेन संबंधी समस्याएं, बढ़ती उम्र, गर्भाशय की नलियों में रुकावट, गर्भाशय की कुछ बीमारियां, बार-बार संक्रमण और अत्यधिक कम या ज्यादा वजन जैसी समस्याएं गर्भधारण में बाधा बन सकती हैं। वहीं पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या कम होना, उनकी गति कमजोर होना, संरचना में गड़बड़ी, हार्माेन असंतुलन, संक्रमण, तंबाकू और शराब का सेवन, मोटापा तथा कुछ गंभीर बीमारियों के उपचार भी कारण बन सकते हैं।
इसी वजह से विशेषज्ञ हमेशा पति-पत्नी दोनों की जांच साथ-साथ करवाने की सलाह देते हैं। महिलाओं में हार्माेन जांच, अल्ट्रासाउंड और गर्भाशय की नलियों की जांच की जाती है। पुरुषों में सबसे महत्वपूर्ण और शुरुआती जांच वीर्य परीक्षण होती है, जिससे शुक्राणुओं की संख्या, गति और गुणवत्ता का पता चलता है। यह एक सरल लेकिन बेहद जरूरी जांच है।
इलाज की बात करें तो सबसे पहले जीवनशैली में सुधार पर ध्यान दिया जाता है। संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और तनाव कम करना कई मामलों में सकारात्मक परिणाम देता है। धूम्रपान, तंबाकू और नशीले पदार्थों से दूरी बनाना भी जरूरी है। यदि महिला में अंडाणु बनने की समस्या हो तो डॉक्टर दवाओं की मदद से उसे ठीक करने का प्रयास करते हैं। कुछ मामलों में पुरुषों की हार्माेन संबंधी समस्याओं का भी इलाज किया जाता है।
जब दवाओं या सामान्य उपचार से सफलता नहीं मिलती, तब आधुनिक प्रजनन तकनीकों का सहारा लिया जाता है। इनमें कृत्रिम गर्भाधान, परखनली शिशु तकनीक और विशेष शुक्राणु इंजेक्शन तकनीक जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं। हालांकि यह समझना जरूरी है कि हर दंपति को परखनली शिशु तकनीक की जरूरत नहीं पड़ती। कई लोग केवल सही समय पर इलाज, जीवनशैली में बदलाव और दवाओं की मदद से ही माता-पिता बनने का सुख प्राप्त कर लेते हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि सफलता की संभावना महिला की उम्र, अंडाणुओं की गुणवत्ता, पुरुष की स्वास्थ्य स्थिति और अन्य कई कारकों पर निर्भर करती है। इसलिए इलाज का तरीका हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है।
इंफर्टिलिटी केवल शारीरिक समस्या नहीं है, बल्कि यह मानसिक और भावनात्मक तनाव भी पैदा कर सकती है। ऐसे समय में परिवार और समाज की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। ताने देने या दोषारोपण करने के बजाय दंपति का हौसला बढ़ाना चाहिए और उन्हें सही इलाज लेने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
आज चिकित्सा विज्ञान ने इस क्षेत्र में बड़ी प्रगति की है। इसलिए बांझपन का मतलब यह नहीं है कि संतान सुख कभी नहीं मिलेगा। समय पर विशेषज्ञ से सलाह, सही जांच और उचित उपचार से लाखों दंपतियों ने माता-पिता बनने का सपना पूरा किया है। इसलिए शर्म या संकोच छोड़कर समय रहते विशेषज्ञ की मदद लेना ही सबसे समझदारी भरा कदम है।
-लेखक स्त्री रोग विशेषज्ञ व सोनी हॉस्पीटल, टाउन-जंक्शन रोड हनुमानगढ़ की संचालक हैं






