




रजनी शर्मा
जब कोई नवप्रवेशी बालक
अपने नन्हे-नन्हे कदमों से विद्यालय के द्वार में प्रवेश करता है,
तब उसे देखकर शिक्षक की आँखों में
एक सुनहरा स्वप्न आकार लेने लगता है।
उसी क्षण शिक्षक संकल्प करता है
उस नन्हे पौधे को सींचकर, सँवारकर
एक विशाल वटवृक्ष के समान
सुयोग्य और संस्कारित नागरिक बनाने का।
यहीं से आरम्भ होता है
उन दोनों का आत्मीय संबंध,
गुरु और शिष्य के बीच
विश्वास, स्नेह और समर्पण का अटूट बंधन।
शिक्षक बन जाता है नव-सृजन का शिल्पकार,
और उस कोरे कागज़ समान बालक को
अपने ज्ञान, अनुभव और संस्कारों के रंगों से
एक सुंदर आकार प्रदान करता है।
वह अपने ज्ञानरूपी साँचे में ढालकर
उसे धीरे-धीरे पल्लवित और पोषित करता है।
समय के साथ वह शिष्यरूपी नन्हा पौधा
विकास की राह पर आगे बढ़ता है
और अपने पूर्ण स्वरूप को प्राप्त करने लगता है।
एक दिन ऐसा भी आता है
जब वह बालक शिक्षक के स्वप्न और संकल्प का प्रतिफल बनकर
एक नई पहचान धारण कर लेता है।
और फिर, विद्यालय के उसी द्वार से
जब उसके प्रस्थान का समय आता है,
तब शिक्षक की आँखों में नमी के साथ-साथ
वही चमक पुनः उभर आती है,
जो कभी उसके प्रवेश के समय
एक सुनहरे स्वप्न के रूप में झलकी थी।
आज वह स्वप्न साकार होकर
समाज और राष्ट्र की सेवा के लिए तत्पर
एक सुयोग्य नागरिक के रूप में सामने खड़ा होता है।
यही है एक शिक्षक का सफ़र,
जो हर नवप्रवेशी बालक के साथ
निरंतर, अविराम, अनवरत चलता रहता है…
अनवरत… अनवरत…








