







गोपाल झा
इंदिरा गांधी नहर परियोजना प्रथम चरण के किसानों ने एक बार फिर बता दिया है कि नहरी पानी के सवाल पर उन्हें नजरअंदाज करना सरकार के लिए आसान नहीं। अनूपगढ़ में आंदोलन, बातचीत से इनकार और चीफ इंजीनियर प्रदीप रुस्तगी को हटाने की मांग के बीच सरकार ने आखिरकार तबादले का फैसला किया। अब रुस्तगी जोधपुर जाएंगे और अरुण कुमार सिडाना के हनुमानगढ़ आने की बात सामने आई है। सवाल यह नहीं कि एक अधिकारी का तबादला क्यों हुआ। बड़ा सवाल यह है कि किसानों के दबाव के बाद ही क्यों हुआ? आइए, 9 सवालों में समझते हैं पूरी कहानी।
- नहरी पानी पर इतना बवाल क्यों?
क्योंकि हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर में नहर सिर्फ पानी की धारा नहीं है, किसान की फसल और परिवार की अर्थव्यवस्था की धुरी है। यहां नहर की ‘बारी’ बिगड़ी तो खेत का गणित बिगड़ता है। पानी समय पर नहीं मिला तो किसान के सामने खाद-बीज, मजदूरी और पूरी फसल का पैसा डूबने का खतरा खड़ा हो जाता है। मरुस्थल में नहर आई तो खेती बदली। इसलिए यहां पानी का सवाल बाकी जगहों की तरह केवल विभागीय मामला नहीं है। - अनूपगढ़ के किसान इस बार किस बात पर अड़े हैं?
किसान इंदिरा गांधी नहर परियोजना प्रथम चरण की सिंचाई समस्याओं और रबी फसल के लिए छह माह का एकमुश्त रेगुलेशन घोषित करने की मांग कर रहे हैं। किसानों का आरोप है कि खरीफ में समय पर पानी नहीं मिलने से फसलों को नुकसान हुआ। वे विशेष गिरदावरी और खराब फसल के मुआवजे की मांग भी उठा रहे हैं। यानी किसान कह रहे हैं, पहले खेत बचाओ, फिर फाइल चलाओ। - निशाने पर चीफ इंजीनियर ही क्यों आए?
किसान संगठनों ने आरोप लगाया कि चीफ इंजीनियर प्रदीप रुस्तगी का रवैया किसानों के प्रति सहयोगात्मक नहीं था और उनके फैसलों से अनूपगढ़ शाखा क्षेत्र के किसानों को नुकसान हुआ। माकपा नेता श्योपत मेघवाल ने तो साफ कहा कि जब तक रुस्तगी को हटाया नहीं जाता, सरकार से बातचीत नहीं होगी। यहां एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए, ये किसान नेताओं के आरोप हैं। इन आरोपों पर अधिकारी या विभाग का पक्ष अलग हो सकता है। लेकिन राजनीति में कभी-कभी आरोप से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका असर होता है। और असर साफ दिखाई दिया। - क्या मामला सिर्फ किसान बनाम अधिकारी था?
शुरुआत में ऐसा लग सकता है। लेकिन धीरे-धीरे मामला सरकार तक पहुंच गया। भारतीय किसान संघ का प्रतिनिधिमंडल भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ और सिंचाई मंत्री सुरेश सिंह रावत से मिला। किसानों की पानी की मांग, फसल नुकसान, विशेष गिरदावरी, मुआवजा और नहर में सिल्ट हटाने जैसे मुद्दे सरकार के सामने रखे गए। मतलब साफ था, मामला हनुमानगढ़ के सिंचाई विभाग के कमरे से निकलकर जयपुर की राजनीतिक मेज पर पहुंच चुका था। - सरकार ने बातचीत की कोशिश की, फिर भी बात क्यों नहीं बनी?
सरकार की ओर से प्रदेश उपाध्यक्ष सुरेंद्रपाल सिंह टीटी और एससी मोर्चा के प्रदेशाध्यक्ष व पूर्व केंद्रीय मंत्री निहालचंद मेघवाल किसानों से वार्ता के लिए पहुंचे। लेकिन किसान नेताओं ने अपनी पहली शर्त नहीं बदली, चीफ इंजीनियर हटाओ, फिर बात होगी। यह किसी आंदोलन की सामान्य मांग नहीं थी। किसान संगठन ने बातचीत का दरवाजा ही अधिकारी के हटने से जोड़ दिया। यहीं से सरकार के सामने असली चुनौती शुरू हुई। - घड़साना आंदोलन सरकार को क्यों याद आता है?
क्योंकि घड़साना ने इस इलाके की सरकारों को एक पुराना सबक दिया है, नहरी पानी का गुस्सा खेत से निकलकर सड़क और सड़क से सत्ता तक पहुंच सकता है। घड़साना के आंदोलनों ने साबित किया कि पानी की समस्या पर किसान लंबे समय तक संगठित रह सकते हैं। और जब पानी का सवाल फसल से जुड़ जाता है तो आंदोलन को केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानकर दबाना आसान नहीं होता। यही कारण है कि हनुमानगढ़-श्रीगंगानगर बेल्ट में नहरी पानी सरकार के लिए हमेशा संवेदनशील मुद्दा रहा है। - क्या रुस्तगी का तबादला किसान आंदोलन के दबाव में हुआ?
घटनाक्रम को एक साथ रखिए। किसानों का आंदोलन। चीफ इंजीनियर को हटाने की मांग। सरकार की वार्ता की कोशिश। बातचीत से पहले अधिकारी को हटाने की शर्त। पंचायतीराज चुनाव के बहिष्कार की चेतावनी। और इसके बाद चीफ इंजीनियर का तबादला। सवाल पूछना जायज है, क्या यह महज प्रशासनिक तबादला है या किसान असंतोष को तत्काल शांत करने का राजनीतिक फैसला? सरकारी आदेश में तबादले का आधिकारिक कारण जो भी हो, घटनाक्रम का समय अपने आप में बहुत कुछ कहता है। - सरकार किसानों से क्यों घबराती है?
क्योंकि यहां किसान सिर्फ मतदाता नहीं है, नहर व्यवस्था का सीधा हितधारक भी है और संगठित ताकत भी। पंचायतीराज चुनाव सिर पर हों और किसान संगठन चुनाव बहिष्कार की चेतावनी दें, तब सरकार के लिए खतरे की घंटी बजना स्वाभाविक है। और घड़साना की विरासत अलग से मौजूद है। सरकारों को पता है कि इस क्षेत्र में पानी की एक बारी कभी-कभी राजनीतिक तापमान कई डिग्री बढ़ा सकती है। इसलिए रुस्तगी का तबादला एक संदेश भी माना जा सकता है, सरकार फिलहाल टकराव नहीं, बातचीत चाहती है। - लेकिन क्या अधिकारी बदलने से किसानों की समस्या खत्म हो जाएगी?
यही सबसे बड़ा सवाल है। अगर समस्या सिर्फ अधिकारी की थी तो समाधान आसान है। लेकिन अगर समस्या नहर के रेगुलेशन, पानी की उपलब्धता, वितरण व्यवस्था, सिल्ट, फसल नुकसान और मुआवजे की है तो केवल चेहरा बदलने से कहानी नहीं बदलेगी। किसानों की मांगें अब मेज पर हैं। छह माह का रेगुलेशन। सिंचाई पानी की नियमित आपूर्ति। विशेष गिरदावरी। फसल नुकसान का मुआवजा। राजस्थान फीडर की सिल्ट हटाना। अब देखना यह है कि सरकार अधिकारी बदलती है या व्यवस्था।
दो टूक
प्रदीप रुस्तगी का तबादला हो गया। किसान संगठनों की एक बड़ी मांग पूरी हो गई। लेकिन असली परीक्षा अब शुरू हुई है। क्योंकि नहर के पानी पर किसान को शांत करने के लिए सिर्फ एक अधिकारी हटाना पर्याप्त नहीं होगा। घड़साना का इतिहास सरकारों को यह समझा चुका है कि नहरी पानी की लड़ाई को हल्के में लेना महंगा पड़ सकता है। अनूपगढ़ में इस बार किसानों ने वही पुराना हथियार इस्तेमाल किया, एकजुटता। सरकार ने भी वही पुराना रास्ता चुना, टकराव बढ़ने से पहले दबाव कम करना।
अब गेंद सरकार के पाले में है। किसान पूछ रहा है, रुस्तगी चले गए, अब पानी कब आएगा? और यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल है।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं






