





गोपाल झा
हनुमानगढ़ हो, राजस्थान का कोई दूसरा इलाका हो या फिर देश की राजधानी दिल्ली। इन दिनों हर तरफ एक ही महकमे की सबसे ज्यादा चर्चा है, और वह है पुलिस। जब भी कहीं कोई जनांदोलन सिर उठाता है, तो प्रदर्शनकारियों के बीच से एक नारा अक्सर गूंजता सुनाई दे जाता है, ‘जब-जब मोदी डरता है, पुलिस को आगे करता है।’ यह सिर्फ एक सियासी नारा भर नहीं है, बल्कि यह उस जमीनी सच्चाई की तरफ इशारा करता है, जहाँ हुक्मरानों की ढाल बनकर पुलिस को जनता के सामने खड़ा कर दिया गया है।
अगर कायदे से सोचें, तो पुलिस का मूल काम क्या है? आम जनता की हिफाजत करना, समाज को अपराधियों के खौफ से बचाना और कानून का पहरेदार बनना। लेकिन पिछले कुछ समय से जो तस्वीर उभर रही है, वह बेहद चिंताजनक है। सवाल यह नहीं है कि पुलिस अपनी मर्जी से क्या कर रही है, बल्कि असली सवाल यह है कि सत्ता में बैठे लोग पुलिस से क्या करवा रहे हैं?
जरा उस खाकी वर्दी के पीछे छिपे इंसान की जिंदगी को देखिए। फील्ड में लगातार बारह-बारह घंटे की थका देने वाली ड्यूटी। बाल-बच्चों और परिवार से कोसों दूर। घर-परिवार में क्या बीत रही है, सुख-दुख के हालात क्या हैं, कुछ खबर नहीं रहती। लगातार बढ़ते मानसिक दबाव के चलते कई बार स्थिति विस्फोटक हो जाती है। जवान अंदर से टूट जाते हैं और यही वजह है कि महकमे में खुदकुशी की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। तमाम दावों और वादों के बाद भी हमारी सरकारें इन जवानों को हफ्ते में एक दिन की पक्की छुट्टी तक नहीं दे पाई हैं। होली-दिवाली या ईद जैसे त्योहार हों, तो कानून-व्यवस्था संभालने के नाम पर उनकी छुट्टियां पहले रद्द होती हैं।
शहर में कोई वीआईपी आ जाए तो पुलिस, सड़क पर कोई हादसा हो जाए तो पुलिस, और कहीं भी कोई अप्रिय घटना घटे तो सबसे पहले पुलिस को बुलाओ। दूसरी तरफ थानों में फर्जी मुकदमों का अंबार लगा रहता है, लेकिन झूठे केस दर्ज करवाने वालों पर कार्रवाई करने की फुर्सत पुलिस के पास नहीं है। वे भी ‘चलो बला टली’ सोचकर खामोश बैठ जाते हैं।
जब भी विपक्ष जनता के मुद्दों पर सड़क पर उतरता है, तो सरकार के इशारे पर पुलिस लाठियां भांजने पहुँच जाती है। ऐसे में जनता और विपक्ष दोनों के सीधे निशाने पर पुलिस ही आ जाती है। सरकार की तरफ से सख्ती का फरमान होता है, तो पुलिस को सख्त होना ही पड़ता है। जवान अपनी ड्यूटी निभाते हैं, लेकिन जनता की नजरों में ‘खलनायक’ बन जाते हैं।
हाल ही में राजस्थान के नगरीय निकाय चुनावों के दौरान तो पुलिस की भूमिका पर और भी गंभीर सवाल खड़े हुए। विपक्ष ने सीधे आरोप लगाए कि पुलिस सत्ताधारी दल के लिए पार्षदों की जोड़-तोड़ और बंदोबस्त में जुटी हुई है। यह केवल जुबानी आरोप नहीं रहे, बल्कि पूरे प्रदेश में इससे जुड़े वीडियो वायरल हुए, जिससे पुलिस के ईमानदार आला अफसर भी हैरान और परेशान हैं। नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली व पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा ने डीजीपी से मिलकर चेतावनी दी है कि अगर पंचायतीराज चुनाव में पुलिस ने नगरीय चुनाव वाली स्थिति दोहराई तो हालात खतरनाक होंगे।
आखिर यह सब क्या हो रहा है? हर सियासी दांव-पेच में पुलिस को ही आगे क्यों झोंक दिया जाता है? क्या पुलिस सत्ता हथियाने और कुर्सी बचाने का आसान जरिया बन चुकी है? अगर पुलिस इतनी अहम है, तो सरकारें उनकी बुनियादी तकलीफों से मुंह क्यों मोड़ लेती हैं? उनके मानवीय अहसासों, उनकी थकान और उनके परिवार के हक को क्यों नहीं समझा जाता?
सच्चाई यह है कि पुलिसकर्मी अनुशासन की सख्त जंजीरों में बंधे हैं। वे तो खुलकर बोल भी नहीं सकते हैं और न ही विरोध कर सकते हैं; हुक्म मानना उनकी मजबूरी है। लेकिन सरकारों को यह नहीं भूलना चाहिए कि पुलिस राज्य और संविधान की रक्षक है, किसी राजनीतिक दल की निजी जागीर नहीं। पुलिस का यह सियासी इस्तेमाल लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर रहा है। सत्ता का पहिया कभी एक जगह नहीं थमता; सरकारें बदलती हैं तो व्यवस्था का रुख भी बदल जाता है।
जब कानून के रखवाले का इकबाल ही खत्म हो जाएगा, तो पूरा ढांचा भरभराकर गिर पड़ेगा और समाज में अविश्वास व अराजकता फैल जाएगी। एक सभ्य समाज के लिए पुलिस बेहद जरूरी अंग है। उसकी लाचारी खत्म करना, उसकी जायज तकलीफों को दूर करना और उसे राजनीतिक दबाव से मुक्त रखना ही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं





