



रजनी शर्मा
माँ की कोख में पलता,
एक नन्हा-सा उजाला हूँ मैं,
पर जन्म से पहले ही,
अंधेरों से घिर जाती हूँ।
कहते हो,
मैं घर की पहली धूप हूँ,
फिर क्यों मेरे आने पर
दरवाजे बंद हो जाते हैं?
बचपन में भेदभाव,
यौवन में असुरक्षा;
पीहर ने कहा, पराई,
ससुराल ने समझा, पराई;
मैं पूछती हूँ,
आखिर मेरा अपना घर कहाँ है?
मैं नदी हूँ,
मुझे किनारों में मत बाँधो,
मैं बीज हूँ,
मुझसे मेरी धूप मत छीनो।
मैं बोझ नहीं,
एक संभावना हूँ;
मुझे जन्म लेने दो,
पढ़ने दो, खिलने दो,
और बराबरी से जीने दो।
मैं बिटिया हूँ,
आपकी अपनी बिटिया…



