




डॉ. अर्चना गोदारा
नवरात्रि में जब नौ छोटी बच्चियों को चुनरी ओढ़ाकर उनके चरण छुए जाते हैं, तो मन में एक प्रश्न जरूर उठना चाहिए। जिन नन्हे पैरों में हम देवी के दर्शन करते हैं, उन्हीं पैरों से चलकर जब बेटी हमारे अपने घर आती है, तो कभी उसका स्वागत बेटे जैसी खुशी से क्यों नहीं होता? जिस कन्या में हम माँ दुर्गा का स्वरूप देखते हैं, उसी कन्या के जन्म पर कुछ घरों में उदासी क्यों छा जाती है? यह प्रश्न किसी की आस्था पर नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक सोच पर है या यूं कहूँ की दोगला व्यवहार है। देवी की आराधना हमारी संस्कृति की सुंदर परंपरा है। यह हमें शक्ति, करुणा और संरक्षण का संदेश देती है। लेकिन इस संदेश का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा, जब हम अपने जीवन में भी उसके मूल्यों को उतारें। नवरात्रि में कन्या पूजन करने वाली स्त्री जब बेटे की कामना में व्रत रखती है, मंदिरों में मन्नत माँगती है और अनेक अनुष्ठान करती है, तो उसकी आस्था पर सवाल उठाना उचित नहीं। सवाल उस सामाजिक धारणा से है जिसने उसके मन में यह विश्वास बैठा दिया है कि बेटे के बिना परिवार अधूरा है। आखिर यह कैसी विडंबना है कि हम देवी से संतान का आशीर्वाद माँगते हैं, लेकिन उस आशीर्वाद के रूप में बेटी को स्वीकार करने में कहीं न कहीं संकोच करते हैं?
हमारे छोटे शहरों और कस्बों में यह मानसिकता आज भी अनेक परिवारों के व्यवहार में दिखाई देती है। किसी घर में बेटी जन्म लेती है तो कहा जाता है कि कोई बात नहीं, अगली बार बेटा हो जाएगा। इसी बात को छोटे कस्बों, शहरों की बुजुर्ग महिलाएं कहती हैं कोई बात नहीं जहाँ आंधी है वहाँ,एक दिन बारिश भी आएगी । एक बेटी के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी संतान की उम्मीद भी कई बार इसी इच्छा से जुड़ जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में माँ के शरीर, उसकी सेहत और पहले से जन्मी बच्चियों के भविष्य पर कितना बोझ पड़ता है, इस पर कम ही विचार होता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में भी बेटे की चाह कई बार इतनी प्रबल होती है कि दो वक्त की रोटी, बच्चों की पढ़ाई और इलाज जैसी बुनियादी जरूरतों के बीच भी मन्नतों और अनुष्ठानों का सिलसिला चलता रहता है। आस्था रखना गलत नहीं है, लेकिन जब कोई सामाजिक धारणा परिवार को लगातार मानसिक, शारीरिक और आर्थिक दबाव में डालने लगे, तब उस पर विचार करना आवश्यक हो जाता है। यह भी समझना होगा कि बेटे या बेटी का जन्म माँ की इच्छा अथवा उसके नियंत्रण का परिणाम नहीं है। संतान का लिंग निर्धारित करने में माँ को दोष देना वैज्ञानिक रूप से भी गलत है। फिर भी विडंबना देखिए कि कई बार बेटे की चाह का सबसे अधिक दबाव उसी स्त्री पर डाला जाता है, जो स्वयं इस व्यवस्था की पीड़ा झेल रही होती है। परिवार और समाज के ताने उसे यह विश्वास दिलाने लगते हैं कि उसने बेटी को जन्म देकर कोई कमी छोड़ दी है। जबकि सच्चाई यह है कि कमी किसी बच्ची में नहीं, उस दृष्टि में है जो जन्म लेते ही बच्चों के मूल्य तय करने लगती है।
साहित्य और वास्तविक जीवन, दोनों हमें इस सोच से बाहर निकलने का अवसर देते हैं। मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘बेटों वाली विधवा’ में पारिवारिक संबंधों और बेटों से जुड़ी अपेक्षाओं के बीच छिपी विडंबनाएँ सामने आती हैं। प्रेमचंद का साहित्य बार-बार याद दिलाता है कि सामाजिक प्रतिष्ठा और पारिवारिक सुख की प्रचलित धारणाएँ हमेशा मानवीय संवेदना के अनुरूप नहीं होतीं। आज भी हम अपने आसपास ऐसे परिवार देख सकते हैं जहाँ बेटी माता-पिता की दवाइयों से लेकर उनकी रोजमर्रा की जरूरतों तक का ध्यान रखती है। कहीं वह नौकरी करके घर चलाती है, कहीं विवाह के बाद भी बीमार माता-पिता की जिम्मेदारी निभाती है, तो कहीं अकेली बेटी अपने परिवार की आर्थिक और भावनात्मक शक्ति बन जाती है। दूसरी ओर, ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जहाँ बेटे अपने जीवन में व्यस्त होकर माता-पिता से दूर हो जाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि बेटियाँ हमेशा बेटों से अधिक जिम्मेदार या बेटे कम संवेदनशील होते हैं। अर्थ केवल इतना है कि जिम्मेदारी का संबंध लिंग से नहीं, संस्कार, परिस्थिति और मानवीय संवेदना से है। कल्पना कीजिए उस पिता की, जिसने कभी बेटी की पढ़ाई पर खर्च को बोझ समझा था, लेकिन बुढ़ापे में वही बेटी उसके इलाज और देखभाल का सबसे बड़ा सहारा बनती है। या उस माँ की, जिसने बेटे की कामना में वर्षों व्रत रखे, लेकिन जीवन के कठिन समय में उसकी बेटी ने बिना किसी अपेक्षा के उसका हाथ थाम लिया। ऐसे अनुभव किसी एक लिंग की श्रेष्ठता सिद्ध नहीं करते, बल्कि यह समझाते हैं कि संतान का मूल्य उसके जन्म से नहीं, उसके व्यक्तित्व और संबंधों से पहचाना जाना चाहिए।
हमारी संस्कृति में देवी के अनेक रूप शक्ति, ज्ञान, समृद्धि और करुणा के प्रतीक हैं। इसलिए नवरात्रि में कन्या पूजन का संदेश केवल एक धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह हमें हर बच्ची के भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानने की प्रेरणा भी दे सकता है। जिस दिन हम कन्या के चरण छूने के साथ उसकी शिक्षा को भी उतना ही महत्व देंगे, उसके सपनों को परिवार की प्रतिष्ठा से छोटा नहीं समझेंगे और उसके जन्म को किसी दूसरी संतान की प्रतीक्षा से नहीं जोड़ेंगे, उस दिन हमारी परंपरा का मानवीय पक्ष और अधिक मजबूत होगा। माता-पिता यह निश्चित नहीं कर सकते कि जीवन के अंतिम पड़ाव पर कौन उनके साथ रहेगा, लेकिन वे यह अवश्य तय कर सकते हैं कि उनके घर जन्म लेने वाले प्रत्येक बच्चे को कितना प्रेम, अवसर और सम्मान मिलेगा। संतान हमारी इच्छा से संसार में आती है, इसलिए उसके प्रति जिम्मेदारी भी हमारी है। पहले से जन्मी बेटियों को कमतर मानकर अगली संतान में बेटे की तलाश करना उनके वर्तमान और भविष्य, दोनों के साथ अन्याय है। देवी के सामने जलाया गया दीपक केवल पूजा का हिस्सा नहीं, हमारे भीतर के अंधकार को पहचानने का अवसर भी बन सकता है। देवी की पूजा और बेटी का सम्मान एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही संवेदनशील संस्कृति के दो सुंदर पक्ष हैं। आस्था बनी रहे, पर उसके साथ ऐसी समझ भी विकसित हो जो हर संतान को समान मान दे। आखिर जिस घर में बेटी को अपने होने का उत्सव मिले, वहाँ देवी के स्वागत के लिए किसी विशेष दिन की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। साधारण अर्थों में कहूं तो पैदा होने वाली संतान हमारी जिम्मेदारी होती है क्यों कि वह हमारी इच्छा से आती है। वह कोई बाजार का उत्पादन नहीं होती कि उसमे हम पसंद नापसंद को लागू करें।





