





शंकर सोनी
दिल्ली में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण के विरोध प्रदर्शन के दौरान उस वक्त नई बहस छिड़ गई, जब आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. नेहा बोरा की टी-शर्ट पर खोपड़ी के नीचे क्रॉस हड्डियों वाला ‘वन पीस’ का प्रतीक दिखाई दिया।
किसी भी सार्वजनिक आंदोलन में काले झंडे पर सफेद खोपड़ी और क्रॉस के आकार में बनी दो हड्डियों का निशान यानी ‘जॉली रोजर’ नजर आए, तो स्वाभाविक रूप से मन में समुद्री लुटेरों (पाइरेट्स) की छवि उभरती है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह प्रतीक 2023 में इंडोनेशिया के फिलिस्तीन समर्थक प्रदर्शनों, 2025 में फिलीपींस और इंडोनेशिया के आंदोलनों तथा सितंबर 2025 में नेपाल के युवा उभार के दौरान भी प्रदर्शनकारियों के हाथों में देखा गया था। इससे पूर्व अफ्रीका, अमेरिका और यूरेशिया के कई देशों में भी विरोध प्रदर्शनों के दौरान इस झंडे का इस्तेमाल सामने आ चुका है।
इस प्रतीक को ठीक से समझने के लिए इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दोनों पक्षों पर नजर डालना जरूरी है। 17वीं सदी के अंतिम वर्षों और 18वीं सदी की शुरुआत में समुद्री लुटेरे भय का माहौल बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के झंडों का इस्तेमाल करते थे। किसी पर कंकाल और तलवारें होती थीं, तो किसी पर रेतघड़ी। इसका मुख्य उद्देश्य दूसरे जहाजों को बिना संघर्ष किए आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करना था। इसलिए ऐतिहासिक रूप से यह निशान मृत्यु, खतरे और समुद्री लूट से जुड़ा रहा।
हालांकि, आज के वैश्विक युवा आंदोलनों में लहराए जाने वाले इस प्रतीक का सीधा संबंध एक बेहद लोकप्रिय काल्पनिक कहानी ‘वन पीस’ से है। इसके रचयिता प्रसिद्ध जापानी मंगाकार (कार्टूनिस्ट) एइचिरो ओडा हैं। ओडा ने 1997 में इसे ‘मंगा’ (जापानी कॉमिक्स) और 1999 से ‘एनीमे’ (एनिमेशन सीरीज) के रूप में दुनिया के सामने पेश किया।
‘वन पीस’ केवल रोमांच, समुद्री यात्राओं और मित्रता की कहानी नहीं है, बल्कि इसमें स्वतंत्रता, सामाजिक असमानता, सत्ता के दुरुपयोग और संस्थागत दमन जैसे गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं। कहानी की पृष्ठभूमि ‘गोल डी. रोजर’ नामक समुद्री लुटेरे से शुरू होती है, जिसे ‘पाइरेट किंग’ कहा जाता था। उसकी मौत के बाद उसके छिपे हुए रहस्यमयी खजाने को खोजने की होड़ मचती है, जिसे ‘वन पीस’ कहा गया।
कहानी का मुख्य किरदार मंकी डी. लफी है, जो ‘स्ट्रॉ हैट पाइरेट्स’ (पुआल की टोपी पहनने वाले समुद्री लुटेरे) दल का नेतृत्व करता है। वह दुनिया का सबसे आजाद इंसान बनकर समुद्री डाकुओं का राजा बनना चाहता है। कहानी में यह डाकू दल अक्सर भ्रष्ट और अत्याचारी शासकों से टकराता है और उत्पीड़ित जनता की मदद करता है। इस काल्पनिक दुनिया में एक सर्वशक्तिमान संगठन है, जिसे ‘वर्ल्ड गवर्नमेंट’ (विश्व सरकार) कहा जाता है। इसके तहत शक्तिशाली नौसेना, भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारी और ‘सेलेस्टियल ड्रैगन्स’ नामक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग शामिल है, जो आम जनता पर बेलगाम अत्याचार करता है। इस शोषणकारी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए मंकी डी. ड्रैगन के नेतृत्व में एक ‘रिवोल्यूशनरी आर्मी’ (क्रांतिकारी सेना) भी संघर्ष कर रही है।
लफी का उद्देश्य सीधे तौर पर राजनीतिक सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि निजी स्वतंत्रता और रोमांच है; जबकि क्रांतिकारी सेना सीधे व्यवस्था परिवर्तन के लिए लड़ती है।
अब सवाल यह उठता है कि दुनिया के कई देशों में सत्ता-विरोधी आंदोलनों में दिखने वाला यह काल्पनिक और विद्रोही प्रतीक जब भारत में पीएचडी कर चुकीं आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष की टी-शर्ट पर दिखता है, तो क्या इसका कोई विशेष राजनीतिक या प्रतीकात्मक अर्थ है?
किसी भी काल्पनिक कहानी को गहराई से समझने के बाद ही उसके किरदारों को युवा अपने विचारों में ढालते हैं। दिलचस्प बात यह है कि लगभग तीन दशकों से चल रही ‘वन पीस’ की कहानी का अंत अभी तक नहीं आया है।
लोकतंत्र में असहमति और जवाबदेही की मांग करना एक बुनियादी अधिकार है। संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना अपने आप में कोई राष्ट्रविरोधी कृत्य नहीं है। हमें यह समझने की जरूरत है कि युवा किसी नए वैश्विक प्रतीक को क्यों अपना रहे हैं और वे किन मुद्दों को स्वर देना चाहते हैं।
अब तक भारतीय छात्र आंदोलनों में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा, ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे और शहीद-ए-आजम भगत सिंह के चित्र ही मुख्य प्रेरणा रहे हैं। ऐसे में जंतर-मंतर पर जापानी एनीमे और समुद्री लुटेरों के प्रतीक ‘स्ट्रॉ हैट जॉली रोजर’ का उभरना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
जब गंभीर आरोपों से घिरे कुछ राजनीतिक दल या नेता इस युवा ऊर्जा को भुनाने पहुंचते हैं, या फिर विदेशी हितों और डीप स्टेट से जुड़े तत्व ऐसे विरोध प्रदर्शनों में सक्रियता दिखाने लगते हैं, तब चिंताएं और गहरी हो जाती हैं।
क्या यह केवल जेन-ज़ी का इंटरनेट और पॉप-कल्चर से प्रेरित एक स्वाभाविक, डिजिटल रोष है, या फिर व्यवस्था सुधार की आड़ में किसी वैश्विक नैरेटिव और व्यापक उथल-पुथल की सुगबुगाहट?
विश्लेषकों का मानना है कि यह जेन-ज़ी का एक सांस्कृतिक और डिजिटल विरोध का तरीका हो सकता है, लेकिन यह घटना इस बात की ओर भी स्पष्ट इशारा करती है कि वर्तमान लोकतांत्रिक विमर्श में युवाओं के साथ पारदर्शिता, जवाबदेही और सार्थक संवाद की कितनी गहरी कमी है। ये मेरे विचार हैं, आप भी इस पर चिंतन करें। जय हिंद!





