





डॉ. अर्चना गोदारा
कभी-कभी कोई त्रासदी दूर देश में घटती है, लेकिन उसकी तस्वीरें हमारे अपने जीवन का आईना बन जाती हैं। नेपाल में आई हाल की बाढ़ और भूस्खलन की तस्वीरों ने यही एहसास कराया। देखते-देखते पानी और मलबे ने घर, सड़कें और वर्षों से जोड़ी गई चीजें अपने साथ बहा दीं। जिन घरों को बनाने में पूरी उम्र लग गई, उन्हें उजड़ने में कुछ पल ही लगे। उस मंजर में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं था कि घर में कितना सामान था, बल्कि यह था कि उस संकट की घड़ी में कौन किसके साथ खड़ा था।
यह सवाल हमारे अपने जीवन पर भी लागू होता है। हम लगातार अपने घर भर रहे हैं। नई चीजें खरीदते हैं, पुरानी संभालकर रखते हैं, भविष्य के लिए बचत करते हैं और बच्चों के लिए सुविधाएँ जुटाते हैं। यह सब जरूरी भी है। आखिर हर माता-पिता चाहते हैं कि उनके परिवार को किसी चीज की कमी न हो। लेकिन इसी दौड़ में एक दूसरी चीज धीरे-धीरे कम होती जा रही है, वह है साथ बैठने का समय, किसी की बात ध्यान से सुनने की फुर्सत और बिना किसी स्वार्थ के एक-दूसरे के काम आने की आदत। हमारे घरों में पहले भी बहुत कुछ नहीं था, लेकिन घरों में लोग ज्यादा थे। एक कमरे में कई लोग सो जाते थे। आँगन में चारपाइयाँ बिछती थीं और शाम होते ही पड़ोस की आवाजें घर का हिस्सा बन जाती थीं। किसी के घर शादी हो तो मोहल्ला अपना समझकर जुट जाता था। किसी के यहाँ दुख हो तो पूछने के लिए औपचारिक निमंत्रण की जरूरत नहीं पड़ती थी। आज घर बड़े हैं, कमरे अलग-अलग हैं और हर व्यक्ति की अपनी स्क्रीन है। साथ रहते हुए भी कई बार हम एक-दूसरे से दूर हैं।
समाजशास्त्र की दृष्टि से यह बदलाव केवल पारिवारिक संबंधों में आया परिवर्तन नहीं है। यह सामुदायिक जीवन के बदलते स्वरूप की कहानी भी है। आधुनिक जीवन ने व्यक्ति को स्वतंत्रता दी, निजी निर्णयों का अधिकार दिया और उसकी व्यक्तिगत पहचान को मजबूत किया। लेकिन जब व्यक्ति की निजता सामाजिक दूरी में बदलने लगे, तब सवाल उठना स्वाभाविक है। पड़ोसी अब केवल बगल के घर में रहने वाला व्यक्ति नहीं रह गया, बल्कि कई बार ऐसा व्यक्ति बन गया है जिसका नाम तक हम ठीक से नहीं जानते। मानवशास्त्र हमें याद दिलाता है कि मनुष्य ने सभ्यता की शुरुआत अकेले नहीं की थी। उसने समूह बनाकर जीवन जिया, श्रम बाँटा, संकट में एक-दूसरे की सहायता की और अनुभवों को परंपराओं के रूप में आगे बढ़ाया। हमारे गाँवों और कस्बों की पुरानी जीवन-पद्धति में ‘हम’ शब्द का महत्व बहुत बड़ा था। कुआँ सामूहिक था, चौपाल सामूहिक थी, त्योहार सामूहिक थे और संकट भी सामूहिक था। आज सुविधाएँ निजी हो गई हैं और शायद संकट भी हम अपने-अपने कमरों में अकेले झेलने लगे हैं।
मनोविज्ञान की दृष्टि से देखें तो मनुष्य को केवल सुविधा नहीं, भावनात्मक सुरक्षा भी चाहिए। उसे यह विश्वास चाहिए कि कोई उसकी बात सुनेगा, उसकी अनुपस्थिति महसूस करेगा और जरूरत पड़ने पर उसके दरवाजे तक आएगा। सोशल मीडिया पर सैकड़ों संपर्क होने के बावजूद यदि मन की बात कहने के लिए एक भी व्यक्ति न हो तो यह संख्या किसी काम की नहीं। रिश्तों की गिनती और रिश्तों की गहराई, दोनों अलग चीजें हैं। यही कारण है कि प्राकृतिक आपदाओं की तस्वीरें हमें भीतर तक छूती हैं। जब पानी घरों में घुसता है या पहाड़ टूटकर रास्तों पर आ गिरता है, तब अलमारी में रखा सामान अपनी कीमत खो देता है। उस समय किसी का हाथ पकड़ना, किसी को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाना, किसी बच्चे को गोद में उठा लेना या किसी अनजान परिवार के लिए अपने घर का दरवाजा खोल देना ही सबसे बड़ी संपत्ति बन जाता है। त्रासदी मनुष्य को उसकी बनाई हुई सीमाओं से बाहर निकालकर फिर मनुष्य बना देती है। लेकिन हमें यह समझने के लिए हमेशा किसी आपदा का इंतजार क्यों करना चाहिए?
हमारे आसपास रोज छोटी-छोटी त्रासदियाँ घटती हैं। कोई बुजुर्ग पूरे दिन अकेला बैठा है। किसी घर में पति-पत्नी के बीच महीनों से बातचीत ठीक नहीं। किसी बच्चे के पास माता-पिता का समय नहीं। किसी पड़ोसी के घर बीमारी है और हमें पता तक नहीं। किसी रिश्तेदार से वर्षों से छोटी-सी बात पर बोलचाल बंद है। ये घटनाएँ अखबार की सुर्खियाँ नहीं बनतीं, लेकिन इनके भीतर भी रिश्तों का धीरे-धीरे उजड़ना छिपा होता है। हमने सुरक्षा के लिए ताले बढ़ा लिए, लेकिन भरोसा कम कर दिया। सुविधा के लिए उपकरण बढ़ा लिए, लेकिन संवाद कम कर दिया। संपर्कों की सूची लंबी कर ली, लेकिन अपने लोगों के लिए समय छोटा कर दिया। शायद यही हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना है।
जीवन का कोई निश्चित भरोसा नहीं। फिर इतनी नाराजगी किस बात की? किस बात का अहंकार? किस बात की दूरी? जिस व्यक्ति से आज हम बात नहीं करना चाहते, संभव है कल उससे बात करने का अवसर ही न मिले। जिस पड़ोसी को हम वर्षों से केवल दरवाजे के उस पार देखते रहे, हो सकता है किसी दिन वही सबसे पहले मदद के लिए दौड़कर आए। और जिस रिश्ते को हम छोटी-सी बात पर खत्म समझ बैठे हैं, शायद उसमें अभी बहुत कुछ बचा हो। इसलिए घर में सामान रखने की जगह जरूर बनाइए, लेकिन रिश्तों के लिए भी जगह बचाकर रखिए। बच्चों को केवल चीजें न दीजिए, अपना समय भी दीजिए। बुजुर्गों को केवल दवा न दीजिए, बातचीत भी दीजिए। पड़ोसी को केवल नमस्ते न कहिए, कभी उसके हालचाल भी पूछिए। और अपनों से नाराज हों तो कोशिश कीजिए कि नाराजगी रिश्ते से बड़ी न हो जाए।
आखिरकार घर की समृद्धि उसकी दीवारों, फर्नीचर और सामान से नहीं मापी जाती। घर तब सचमुच घर बनता है, जब उसके भीतर लौटने पर किसी चेहरे पर खुशी दिखाई दे, किसी आवाज में अपनापन सुनाई दे और किसी मुश्किल घड़ी में दरवाजा खटखटाने पर भीतर से आवाज आए-“आ जाइए, हम हैं।” शायद हमें जीवन में चीजें कम नहीं, लेकिन रिश्ते ज्यादा बचाने की जरूरत है। क्योंकि घर उजड़ जाए तो फिर बनाया जा सकता है, सामान चला जाए तो फिर खरीदा जा सकता है, लेकिन मनुष्य से मनुष्य का संबंध टूट जाए तो उसकी भरपाई हमेशा संभव नहीं होती। इसलिए घर भरने से पहले यह देख लेना चाहिए कि कहीं रिश्तों के हिस्से की जगह तो खाली नहीं रह गई।






