





ग्राम सेतु डेस्क
बचपन से हम सब यही देखते और सुनते आ रहे हैं कि रामायण में रावण एक बहुत बड़ा विलेन था, जिसके दस सिर थे और भगवान राम ने उसका वध कर दिया। हर साल दशहरे पर हम कागज़ और पटाखों का रावण जलाकर ताली बजा लेते हैं। लेकिन अगर ग्रंथों की गहराई में जाएं, तो बात सिर्फ एक बाहरी राजा या राक्षस की नहीं है। रावण के वे दस सिर असल में कोई जादुई सिर नहीं थे, बल्कि वे हमारे ही मन में छिपी दस बड़ी बुराइयों के प्रतीक हैं। रावण असल में इंसान की उन दस घटिया आदतों और सोच का नाम है, जो इंसान को अंदर से खोखला कर देती हैं।
ये दस बुराइयां कौन-सी हैं?
काम (अंधी चाहत): केवल वासना ही नहीं, बल्कि हर तरह की हवस, चाहे वह दौलत कमाने की दीवानगी हो या हर जगह अपना नाम और रुतबा चमकाने का भूत। जब चाहत हद पार कर जाए, तो वह ‘काम’ बन जाती है।
क्रोध (गुस्सा): जब हमारी कोई चाह पूरी नहीं होती, तो दिमाग का पारा चढ़ जाता है। गुस्सा इंसान की सोचने-समझने की अक्ल पर ताला लगा देता है।
लोभ (लालच): जो मिला है उसमें संतोष न होना और बस और, और के चक्कर में पड़े रहना।
मोह (अंधा लगाव): चीज़ों, पैसों या लोगों से इतना चिपक जाना कि सही-गलत की पहचान ही न रहे।
मद (घमंड/अहंकार): खुद को सबसे तीस मार खां समझना और दूसरों को कीड़ा-मकोड़ा मानना।
मत्सर (जलन): किसी दूसरे की तरक्की, खुशी या कामयाबी देखकर छाती पर सांप लोटना।
घृणा (नफरत): बिना वजह लोगों से चिढ़ना और मन में नफरत का ज़हर पालना।
ईर्ष्या (सुलगते रहना): दूसरों से अपनी तुलना करके हर वक्त हीन भावना में जलते रहना।
द्वेष (बदले की आग): किसी के लिए हमेशा मन में रंजिश रखना और मौका मिलते ही टांग खींचने की ताक में रहना।
भय (डर): अपनी ही कमजोरियों, झूठ और खोने के डर के साए में घुट-घुट कर जीना।
इन बुराइयों से शरीर और सेहत का क्या बिगड़ता है?
जब इंसान के अंदर काम और वासना बढ़ती है, तो उससे गुस्सा फूटता है और फिर बाकी सारी बुराइयां एक के बाद एक लाइन लगा लेती हैं। इसका सीधा असर हमारे प्राण तत्व यानी वाइटल एनर्जी पर पड़ता है। जैसे ही मन इन दस विकारों से भर जाता है, शरीर की अंदरूनी ऊर्जा का लेवल एकदम नीचे गिर जाता है।
सीधी सी बात है, मक्खी वहीं बैठती है जहां गंदगी होती है। वायरस या बैक्टीरिया भी उसी इंसान को जल्दी पकड़ते हैं जिसका शरीर अंदर से इन मानसिक बीमारियों के कारण कमज़ोर हो चुका हो। अगर किसी गांव में बीमारी फैले, तो कुछ लोग तुरंत बीमार पड़ जाते हैं और कुछ बिल्कुल ठीक रहते हैं। फर्क दवा का नहीं, अंदरूनी ऊर्जा का होता है। आज जो बीमारियां हम हर घर में देख रहे हैंकृजैसे ब्लड प्रेशर, शुगर, हार्ट अटैक, डिप्रेशन या कैंसरकृइनकी एक बहुत बड़ी वजह हमारा मानसिक तनाव, गुस्सा और लालच ही है।
अपने अंदर के राम को जगाओ
वेदों की सीख यही है कि अगर इन दस चक्करों में फंसे रहे, तो ज़िंदगी भर सिर्फ भटकना और तकलीफ़ें झेलना ही नसीब होगा। आज भी जब-जब समाज में छल, फरेब, घोटाले या किसी कमज़ोर के साथ अन्याय होता है, तो समझ लीजिए कि रावण जिंदा है। अगर वाकई सुकून की ज़िंदगी जीनी है और बीमारियों से बचना है, तो इन कुछ बातों को रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उतारना होगा।
लगाम लगाएं: अपनी चाहतों की लिस्ट बहुत लंबी मत कीजिए। मेहनत करना अच्छी बात है, लेकिन दौलत और शोहरत के पीछे इतना मत भागिए कि खुद को और अपनों को ही भूल जाएं।
गुस्से पर ब्रेक: जब भी गुस्सा आए, तुरंत रिएक्ट करने के बजाय थोड़ा रुकिए। एक गहरी सांस लीजिए, क्योंकि गुस्से में लिया गया फैसला हमेशा गलत ही होता है।
जलन और तुलना बंद करें: दूसरा क्या कर रहा है, उसके पास कौन-सी गाड़ी है, इससे अपना दिमाग मत खराब कीजिए। जो आपके पास है, उसके लिए शुक्रगुज़ार होना सीखिए।
मन की सफाई रखें: जैसे रोज़ नहाकर शरीर साफ़ करते हैं, वैसे ही ध्यान, अच्छे विचार और दूसरों की मदद करके मन की गंदगी भी साफ करते रहिए।
कागज़ के रावण को आग लगाने से कुछ नहीं बदलेगा। जिस दिन आपने अपने अंदर के गुस्से, लालच और घमंड पर काबू पा लिया, समझो उसी दिन आपके भीतर का रावण मरा और असली विजय मिल गई।





