





मंजू गुप्ता
गणेश चतुर्थी हमारी सांस्कृतिक चेतना और आस्था का एक अत्यंत जीवंत पर्व है। विघ्नहर्ता भगवान गणेश को बुद्धि, विवेक, शुभता और मंगल का देवता माना जाता है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी पर जब बप्पा का आगमन होता है, तो हर घर, गली और पंडाल रोशनी व भक्ति से सराबोर हो उठता है। हम उन्हें बड़े लाड़-प्यार से स्थापित करते हैं, मोदक का भोग लगाते हैं, सुगंधित पुष्प अर्पित करते हैं और भावपूर्ण आरती गाते हैं। दस दिनों तक पूरा परिवेश एक दिव्य उल्लास में डूबा रहता है।
लेकिन जैसे ही उत्सव का अंतिम दिन आता है और गणपति विसर्जन की घड़ी निकट होती है, एक संवेदनशील मन के भीतर एक गहरा प्रश्न दस्तक देता है, जिस मंगलमूर्ति का हमने इतने मान-सम्मान और स्नेह से स्वागत किया, क्या उनकी विदाई भी उतनी ही गरिमा, संवेदनशीलता और विनम्रता के साथ नहीं होनी चाहिए? यह प्रश्न किसी परंपरा पर आघात नहीं, बल्कि आस्था को उसके शुद्धतम रूप में जीने का एक विनम्र प्रयास है।
सनातन परंपरा में विसर्जन का दर्शन बेहद गहरा और आध्यात्मिक है। मिट्टी से गढ़ी गई प्रतिमा कुछ दिनों के लिए हमारे बीच साकार रूप लेती है। हम उसमें प्राण-प्रतिष्ठा कर ईश्वर के विराट भाव का अनुभव करते हैं, और फिर उसी मिट्टी को पंचतत्व में विलीन कर देते हैं। इसका सीधा अर्थ यही है, रूप मिटता है, किंतु भाव अमर रहता है।
प्रतिमा विलीन होती है, पर आस्था सदैव हृदय में स्पंदित रहती है। भगवान गणेश हमें जीवन में संतुलन, बुद्धि और विवेक का मार्ग दिखाते हैं। अतः विसर्जन केवल प्रतिमा को जल में छोड़ देने की कोई यांत्रिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह एक आंतरिक प्रतिज्ञा है कि हम उनके सद्गुणों को विदा नहीं करेंगे, बल्कि अपने आचरण में सदा जीवित रखेंगे।
जब भक्ति और औपचारिकता के बीच मर्यादा धुंधली होती है। पीड़ा तब होती है जब विसर्जन के दिन पवित्रता की जगह आपाधापी ले लेती है। जिस स्वरूप को दस दिनों तक भगवान मानकर शीश नवाया गया, उसी प्रतिमा को विसर्जन घाटों पर धक्का-मुक्की, भारी शोरगुल और जल्दबाजी के बीच धकेलते हुए देखना मन को कचोटता है। कई स्थानों पर भीड़ के दबाव में प्रतिमाएं खंडित होती हैं या उन्हें असावधानी से पानी में फेंक दिया जाता है।
क्या ईश्वर को विदा करने का क्षण शांत, शालीन और आदरपूर्ण नहीं होना चाहिए? क्या हमारी श्रद्धा केवल उत्सव के आरंभ तक सीमित है? विदाई का क्षण तो कृतज्ञता का होना चाहिए, न कि अनियंत्रित उन्माद का।
प्रकृति पूजन के नाम पर नदियों का दम क्यों घुट रहा? एक और विरोधाभास हमें आत्मचिंतन के लिए विवश करता है। आगमन पर हम घर का कोना-कोना स्वच्छ करते हैं, गंगाजल छिड़कते हैं। लेकिन विसर्जन के समय अक्सर उन प्रतिमाओं को ऐसे तालाबों और नदियों में प्रवाहित कर दिया जाता है जो पहले से ही कचरे और प्रदूषण की मार झेल रही हैं। यदि ईश्वर प्रकृति के कण-कण में विद्यमान हैं, तो नदियां, जल और पर्यावरण भी तो साक्षात देवस्वरूप हैं।
केमिकल युक्त प्लास्टर ऑफ पेरिस और विषैले रंगों से बनी प्रतिमाएं जब पानी में घुलकर जलीय जीवन और जलस्रोतों को नष्ट करती हैं, तो क्या यह सचमुच पुण्य का कार्य है? स्वच्छ जल की रक्षा करना भी हमारी धार्मिक निष्ठा का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए।
परंपराओं को रोकना समाधान नहीं है, बल्कि उनके मूल मर्म को आधुनिक संदर्भ में अधिक संवेदनशील बनाना समय की मांग है। हमें उत्सव को प्रकृति और मर्यादा के अनुकूल ढालना होगा, पीओपी को त्यागकर केवल शुद्ध माटी और प्राकृतिक रंगों से बनी मूर्तियों को अपनाएं। नदियों को बचाने के लिए स्थानीय स्तर पर कृत्रिम कुंडों का निर्माण हो, या घर पर ही गमले व टब में विसर्जन कर उस मिट्टी में तुलसी का पौधा रोपें। उत्सव में उमंग अवश्य हो, पर अव्यवस्था और धक्का-मुक्की न हो।
आने वाली पीढ़ी को कैसी विरासत दे रहे हैं हम?
हमारे बच्चे प्रवचनों से नहीं, हमारे आचरण से सीखते हैं। वे देखते हैं कि हम भगवान को किस प्रेम से लाए और फिर घाट पर उनके साथ कैसा व्यवहार हुआ। यदि हम बच्चों को यह सिखाएं कि विसर्जन का अर्थ विदाई नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आभार है, तो यही उनके जीवन की सबसे मूल्यवान सीख बनेगी।
गणेश जी बुद्धि के अधिष्ठाता हैं। यदि हम बुद्धिमान होकर भी उत्सव में विवेक खो दें, तो हमारी पूजा अधूरी है। आइए, भक्ति को केवल कर्मकांड तक सीमित न रखें; उसमें संवेदनशीलता जोड़ें। जिस अपार श्रद्धा से बप्पा का स्वागत करते हैं, उसी शांत और मर्यादापूर्ण आदर के साथ उन्हें विदा भी करें।





