





कपिल सहारण, ग्राम सेतु ब्यूरो
पंचायतीराज चुनाव में सरपंच की कुर्सी हासिल करने के लिए लाखों-करोड़ों रुपए खर्च करने की चर्चाएं आम हैं। कहीं मतदाताओं को लुभाने के लिए शराब बांटने की शिकायतें सामने आती हैं तो कहीं नकदी और दूसरे प्रलोभनों के सहारे चुनावी समीकरण साधे जाते हैं। कई बार चुनाव जीतने की होड़ में लोकतंत्र की मूल भावना ही पीछे छूट जाती है। ऐसे माहौल में संगरिया पंचायत समिति क्षेत्र की ग्राम पंचायत बोलांवाली ने एक ऐसी पहल की है, जो न केवल चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों के लिए उदाहरण है, बल्कि ग्रामीण लोकतंत्र की स्वस्थ परंपराओं को जीवित रखने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है।
पंचायतीराज चुनाव के चौथे और अंतिम चरण में संगरिया, टिब्बी, रावतसर और हनुमानगढ़ टाउन पंचायत समिति क्षेत्रों की ग्राम पंचायतों में चुनावी सरगर्मियां तेज हैं। सरपंच पद को लेकर गांवों में राजनीतिक और सामाजिक समीकरण बन-बिगड़ रहे हैं। इसी बीच बोलांवाली में संत सेवादास समिति ने चुनाव को लेकर एक ऐसी पहल की, जिसने चुनावी चर्चाओं को नया विषय दे दिया है। समिति के तत्वावधान में गांव की संत सेवादास वाटिका में एक सभा आयोजित की गई। इसमें सरपंच पद की प्रत्याशियों को एक मंच पर एकत्रित किया गया और चुनाव को स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के साथ लड़ने का संकल्प दिलाया गया।
सभा में पांच महिला सरपंच प्रत्याशियों ने गांव के ठाकुर जी के दरबार में सौगंध खाई कि वे चुनाव में शराब और रुपयों के वितरण जैसे प्रलोभनों का सहारा नहीं लेंगी। इनमें अलका धर्मपत्नी बिजेंद्र सहारण, सतवीर देवी धर्मपत्नी लखवीर शर्मा, गुरबंश कौर धर्मपत्नी जसकरण बराड़, शारदा देवी धर्मपत्नी भूप जाट थोरी और माया देवी धर्मपत्नी रणवीर नायक शामिल हैं। सभी ने स्पष्ट किया कि चुनाव में मतदाताओं को शराब पिलाकर या नकदी बांटकर प्रभावित करने की परंपरा को बढ़ावा नहीं दिया जाएगा। शराब और रुपयों के वितरण को पूरी तरह बंद रखने का संकल्प लिया गया।
इस पहल का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि प्रत्याशियों ने चुनाव को अनावश्यक खर्च और प्रलोभनों से दूर रखने का मानस बनाया है। सामान्यतया ग्रामीण चुनावों में प्रत्याशियों के बीच आर्थिक शक्ति का प्रदर्शन भी एक बड़ा कारक बन जाता है। चुनाव प्रचार के नाम पर भोज, शराब, नकदी और दूसरी सुविधाओं पर होने वाला खर्च कई बार चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करता है। इसका परिणाम यह होता है कि योग्य और ईमानदार व्यक्ति आर्थिक संसाधनों की कमी के कारण चुनाव लड़ने से पीछे हटने लगते हैं।
बोलांवाली की पहल इसी सोच को चुनौती देती है। यहां प्रत्याशियों ने संदेश दिया है कि सरपंच बनने के लिए मतदाताओं को खरीदने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। गांव की सरकार चलाने का अधिकार उसे मिलना चाहिए, जो गांव के विकास, समस्याओं के समाधान और जनहित के प्रति अपनी प्रतिबद्धता साबित कर सके। मतदाता भी प्रत्याशी के व्यक्तित्व, विचार, व्यवहार और कार्ययोजना के आधार पर निर्णय लें, न कि चुनाव के दौरान मिलने वाले अस्थायी प्रलोभनों से प्रभावित होकर।
इस आयोजन में ग्रामीणों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और सभी सरपंच प्रत्याशियों का हौसला बढ़ाया। ग्रामीणों ने नशामुक्त और बिना लालच के चुनाव लड़ने के निर्णय का स्वागत करते हुए इस प्रयास में सहयोग का भरोसा दिलाया। संत सेवादास समिति के अध्यक्ष हरविन्द्र सिंह और उपाध्यक्ष बंशीलाल शर्मा ने भी ग्रामीणों से अपील की कि चुनाव संपन्न होने तक वे इस संकल्प का पूरा सहयोग करें। सभा के संचालन की जिम्मेदारी अजय बिश्नोई ने निभाई।
दरअसल, लोकतंत्र की खूबसूरती केवल मतदान प्रतिशत या चुनाव परिणामों में नहीं, बल्कि चुनाव लड़ने और मताधिकार का इस्तेमाल करने की प्रक्रिया की शुचिता में भी निहित है। चुनाव में धनबल और प्रलोभनों का बढ़ता प्रभाव लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती है। जब कोई प्रत्याशी चुनाव जीतने के लिए अनावश्यक धन खर्च करता है तो स्वाभाविक रूप से उसके सामने चुनाव के बाद उस खर्च की भरपाई करने का दबाव भी पैदा हो सकता है। इसका खामियाजा अंततः गांव के विकास और आमजन को भुगतना पड़ता है।
ऐसे में बोलांवाली के प्रत्याशियों का संकल्प केवल शराब और रुपए नहीं बांटने तक सीमित नहीं माना जाना चाहिए। यह उस चुनावी संस्कृति के खिलाफ एक सकारात्मक संदेश है, जिसमें मतदाता की पसंद और नापसंद को प्रलोभनों के सहारे प्रभावित करने की कोशिश होती है। हालांकि, इस पहल की असली सफलता चुनाव परिणाम से आगे जाकर तब साबित होगी, जब सभी प्रत्याशी अपने संकल्प पर कायम रहेंगे और ग्रामीण भी बिना किसी दबाव या लालच के मतदान करेंगे।
बोलांवाली ने कम से कम एक सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या सरपंच बनने के लिए लाखों रुपए खर्च करना वास्तव में जरूरी है? क्या गांव की सेवा का रास्ता शराब, नकदी और दिखावे से होकर ही गुजरता है? यदि प्रत्याशी और मतदाता दोनों अपनी जिम्मेदारी समझ लें तो चुनाव विचारों, विजन और विकास के मुद्दों पर भी लड़ा जा सकता है।
लोकतंत्र में हार-जीत चुनाव का हिस्सा है, लेकिन चुनावी मर्यादा और सामाजिक सद्भाव की हार किसी भी गांव के लिए अच्छी बात नहीं। बोलांवाली की यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है कि यहां सरपंची की प्रतिस्पर्धा को धनबल से निकालकर विचारों की कसौटी पर कसने की कोशिश हुई है। अब देखना यह है कि यह संकल्प मतदान तक कितना कायम रहता है। यदि ऐसा होता है तो बोलांवाली का यह प्रयोग दूसरे गांवों के लिए भी अनुकरणीय मिसाल बन सकता है।






