



ग्राम सेतु ब्यूरो.
राजस्थान में लंबे समय से टलते आ रहे पंचायत और नगर निकाय चुनावों को लेकर आखिरकार स्थिति साफ हो गई है। राजस्थान हाईकोर्ट ने शुक्रवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि पंचायत और निकाय चुनाव हर हाल में 31 जुलाई 2026 तक कराए जाएं। अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि अब और देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
हाईकोर्ट ने चुनाव प्रक्रिया में बाधा बन रही ओबीसी आरक्षण की स्थिति को लेकर भी सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने ओबीसी आयोग को निर्देश दिए हैं कि वह 20 जून तक अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपे, ताकि चुनाव प्रक्रिया में कोई और तकनीकी अड़चन न रहे। कोर्ट ने माना कि ओबीसी आरक्षण महत्वपूर्ण मुद्दा है, लेकिन इसके नाम पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अनिश्चितकाल तक नहीं रोका जा सकता।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कोर्ट से दिसंबर 2026 तक का समय मांगा था। सरकार का तर्क था कि ओबीसी आयोग की रिपोर्ट अभी नहीं आई है, संसाधनों की उपलब्धता और प्रशासनिक परिस्थितियां भी अनुकूल नहीं हैं। इसके अलावा स्कूलों, स्टाफ, ईवीएम और अन्य व्यवस्थाओं का हवाला देकर चुनाव टालने की मांग की गई थी। हालांकि कोर्ट ने सरकार की इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और कहा कि संवैधानिक संस्थाओं के चुनाव समय पर कराना सरकार की जिम्मेदारी है, कोई वैकल्पिक सुविधा नहीं।
गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने इससे पहले 14 नवंबर 2025 को 439 याचिकाओं पर एक साथ फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को 15 अप्रैल 2026 तक पंचायत और निकाय चुनाव कराने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद सरकार ने तय समय-सीमा में चुनाव नहीं कराए और इसके बजाय चुनाव टालने के लिए हाईकोर्ट में प्रार्थना पत्र दायर कर दिया।
इस मामले में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एसपी शर्मा की खंडपीठ ने 11 मई को सभी पक्षों की सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे अब सुनाया गया है। फैसले में अदालत ने यह भी संकेत दिया कि बार-बार चुनाव टालना लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल ढांचे के खिलाफ है।
मामले में याचिकाकर्ता और पूर्व विधायक संयम लोढ़ा तथा गिर्राज सिंह देवंदा ने अदालत में तर्क दिया कि राज्य सरकार पिछले डेढ़ साल से जानबूझकर चुनाव टाल रही है। उनका कहना था कि निर्वाचित निकायों के अभाव में प्रशासनिक फैसले अफसरशाही के हाथों में चले गए हैं, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। उधर, सरकार ने यह दलील भी दी थी कि सितंबर से दिसंबर के बीच कई पंचायत समितियों और जिला परिषदों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। ऐसे में उनके कार्यकाल खत्म होने के बाद चुनाव कराना बेहतर होगा, जिससे ‘वन स्टेट-वन इलेक्शन’ की अवधारणा को बल मिलेगा। लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह नीति-स्तरीय विचार हो सकता है, अदालत के पूर्व आदेशों की अवहेलना का आधार नहीं।
राज्य चुनाव आयोग ने भी सरकार के समर्थन में हाईकोर्ट में प्रार्थना पत्र दायर किया था। आयोग ने कहा था कि ओबीसी आरक्षण का निर्धारण हुए बिना चुनाव कराना संभव नहीं है। हालांकि अदालत ने आयोग को भी निर्देश दिए कि वह सरकार और ओबीसी आयोग के साथ समन्वय कर तय समय-सीमा में चुनाव सुनिश्चित करे।







