




डॉ. जितेंद्र अग्रवाल, यूरोलॉजिस्ट, मो. 82387 33444
बढ़ती उम्र के साथ शरीर में कई स्वाभाविक परिवर्तन होते हैं। पुरुषों में ऐसा ही एक सामान्य परिवर्तन है गुदूद (प्रोस्टेट) ग्रंथि का बढ़ना, जिसे चिकित्सकीय भाषा में सौम्य गुदूद वृद्धि कहा जाता है। यह कोई कैंसर नहीं है, बल्कि उम्र बढ़ने के साथ होने वाली सामान्य समस्या है। दुर्भाग्य से अधिकांश लोग इसे बढ़ती उम्र का असर मानकर अनदेखा कर देते हैं, जबकि समय पर जांच और उपचार से इससे होने वाली गंभीर परेशानियों से आसानी से बचा जा सकता है।
गुदूद पुरुषों में मूत्राशय के ठीक नीचे स्थित अखरोट के आकार की ग्रंथि होती है। मूत्र बाहर निकालने वाली नली इसी के बीच से होकर गुजरती है। उम्र बढ़ने के साथ जब यह ग्रंथि आकार में बड़ी होने लगती है, तो मूत्र नली पर दबाव पड़ता है। परिणामस्वरूप पेशाब करने में कठिनाई, बार-बार पेशाब आना और मूत्राशय पूरी तरह खाली न होने जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं।
यह समस्या प्रायः 40 वर्ष की आयु के बाद शुरू हो सकती है, लेकिन 50 वर्ष के बाद इसका खतरा तेजी से बढ़ जाता है। लगभग 60 वर्ष की आयु तक आधे पुरुषों में इसके लक्षण दिखाई देने लगते हैं, जबकि 80 वर्ष की आयु तक अधिकांश पुरुषों में गुदूद का आकार सामान्य से बड़ा पाया जाता है।
इस बीमारी का सबसे प्रमुख संकेत पेशाब से जुड़ी परेशानियां हैं। बार-बार पेशाब आना, विशेषकर रात में कई बार उठना, पेशाब शुरू करने में देर लगना, धार का कमजोर या पतला होना, पेशाब करते समय जोर लगाना, रुक-रुक कर पेशाब आना तथा पेशाब के बाद भी मूत्राशय पूरी तरह खाली न होने का एहसास इसके सामान्य लक्षण हैं। कई बार अचानक तेज पेशाब लगना, पेशाब रोकने में कठिनाई, अंत में बूंद-बूंद टपकना, बार-बार संक्रमण होना या पेशाब में खून आना भी इस समस्या की ओर संकेत कर सकता है।
कुछ परिस्थितियां ऐसी होती हैं, जिन्हें गंभीर चेतावनी माना जाता है। यदि अचानक बिल्कुल पेशाब बंद हो जाए, पेट के निचले हिस्से में तेज दर्द और सूजन हो, पेशाब में अधिक खून आए या तेज बुखार के साथ पेशाब में रुकावट महसूस हो, तो इसे आपातकाल समझकर तुरंत चिकित्सालय जाना चाहिए। ऐसे मामलों में देर करना गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है।
इस बीमारी की पहचान रोगी की शिकायतों और चिकित्सकीय परीक्षण के आधार पर की जाती है। आवश्यकता पड़ने पर मूत्र की जांच, रक्त की जांच, गुर्दों की कार्यक्षमता की जांच, अल्ट्रासोनोग्राफी, पेशाब की धार की गति की जांच तथा अन्य विशेष परीक्षण किए जा सकते हैं। इन जांचों का उद्देश्य केवल गुदूद का आकार जानना ही नहीं, बल्कि यह भी देखना होता है कि कहीं मूत्राशय या गुर्दों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव तो नहीं पड़ रहा।
यदि बीमारी प्रारंभिक अवस्था में हो, तो जीवनशैली में छोटे-छोटे बदलाव ही काफी लाभ पहुंचा सकते हैं। शाम के समय अधिक पानी पीने से बचना, चाय और कॉफी का सीमित सेवन करना, समय पर पेशाब करना, कब्ज से बचना, नियमित व्यायाम करना तथा वजन नियंत्रित रखना लक्षणों को काफी हद तक कम कर सकता है। आवश्यकता होने पर चिकित्सक ऐसी दवाएं भी देते हैं, जो गुदूद की मांसपेशियों को शिथिल करती हैं या धीरे-धीरे उसका आकार कम करने में सहायता करती हैं। किसी भी दवा का सेवन केवल चिकित्सकीय सलाह पर ही करना चाहिए।
जब दवाओं से लाभ नहीं मिलता, बार-बार पेशाब रुकने लगे, संक्रमण होने लगे, मूत्राशय में पथरी बनने लगे या गुर्दों पर प्रभाव पड़ने लगे, तब शल्य चिकित्सा की आवश्यकता पड़ सकती है। वर्तमान समय में अधिकांश रोगियों का उपचार बिना बड़े चीरे के आधुनिक दूरबीन आधारित अथवा लेज़र तकनीकों से सफलतापूर्वक किया जा रहा है, जिससे रोगी जल्दी स्वस्थ होकर सामान्य जीवन में लौट सकता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में एक गंभीर समस्या यह भी देखी जाती है कि पेशाब बंद होने पर कई लोग प्रशिक्षित चिकित्सक के बजाय अनुभवहीन व्यक्ति से मूत्र नली डलवा लेते हैं। यह अत्यंत खतरनाक हो सकता है। गलत तरीके से नली डालने पर मूत्र नली में चोट, रक्तस्राव, संक्रमण, झूठा मार्ग बन जाना या भविष्य में मूत्र नली के संकुचन जैसी गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए यदि नली आसानी से नहीं लग रही हो तो बार-बार प्रयास करने के बजाय रोगी को तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक के पास भेजना चाहिए।
यह भी समझना आवश्यक है कि बढ़ी हुई गुदूद और गुदूद का कैंसर दो अलग-अलग बीमारियां हैं। गुदूद का बढ़ना अपने आप कैंसर में नहीं बदलता, लेकिन दोनों एक ही आयु वर्ग में हो सकते हैं। इसलिए आवश्यकता पड़ने पर चिकित्सक उचित जांच कराकर दोनों स्थितियों में अंतर स्पष्ट करते हैं।
इस बीमारी से बचाव के लिए 50 वर्ष की आयु के बाद नियमित स्वास्थ्य जांच कराना, पेशाब संबंधी किसी भी लक्षण को अनदेखा न करना, मधुमेह और उच्च रक्तचाप को नियंत्रित रखना, संतुलित भोजन करना, पर्याप्त पानी पीना, नियमित व्यायाम करना तथा धूम्रपान और अत्यधिक मदिरापान से दूर रहना अत्यंत आवश्यक है।
याद रखें, बढ़ती उम्र के साथ पेशाब में होने वाली परेशानी को सामान्य मानकर टालना समझदारी नहीं है। समय पर चिकित्सकीय परामर्श, सही जांच और उचित उपचार से अधिकांश पुरुष पूरी तरह सामान्य और स्वस्थ जीवन जी सकते हैं।







