




डॉ. एमपी शर्मा
भारत लंबे समय तक कुपोषण की समस्या से जूझता रहा है, लेकिन अब देश एक नई चुनौती का सामना कर रहा है, अधिक पोषण। यानी शरीर को जरूरत से ज्यादा कैलोरी मिल रही है, लेकिन आवश्यक पोषक तत्व नहीं। इसका सबसे बड़ा कारण जंक फूड, मीठे पेय, शारीरिक निष्क्रियता और स्क्रीन पर बढ़ता समय है। यह समस्या अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि छोटे शहरों और गांवों में भी तेजी से फैल रही है।
आज का बच्चा मैदान में दौड़ने की बजाय मोबाइल पर गेम खेलना पसंद करता है। पैदल चलने या साइकिल चलाने की जगह वाहन का उपयोग बढ़ गया है। घर के ताजे और पौष्टिक भोजन की जगह पिज्जा, बर्गर, चिप्स, इंस्टेंट नूडल्स, कोल्ड ड्रिंक और चॉकलेट जैसी चीजें रोजमर्रा का हिस्सा बनती जा रही हैं। यही आदतें आगे चलकर मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और फैटी लिवर जैसी गंभीर बीमारियों की नींव रखती हैं।
जंक फूड वह भोजन है जिसमें कैलोरी, चीनी, नमक और अस्वस्थ वसा अधिक होती है, जबकि विटामिन, खनिज, प्रोटीन और फाइबर की मात्रा बेहद कम होती है। ऐसे खाद्य पदार्थ पेट तो भर देते हैं, लेकिन शरीर को पोषण नहीं देते। लगातार सेवन से वजन बढ़ता है और शरीर की चयापचय प्रणाली (मेटाबॉलिज्म) प्रभावित होने लगती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार बच्चों और किशोरों को प्रतिदिन कम से कम 60 मिनट सक्रिय शारीरिक गतिविधि करनी चाहिए। लेकिन आज अधिकांश बच्चे दिन का बड़ा हिस्सा मोबाइल, टीवी या कंप्यूटर के सामने बिताते हैं। इसका सीधा असर उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। मांसपेशियां कमजोर होती हैं, हड्डियों का विकास प्रभावित होता है, पढ़ाई में एकाग्रता घटती है और तनाव तथा अवसाद जैसी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं।
बचपन का मोटापा आज वैश्विक स्वास्थ्य संकट बन चुका है। जो बच्चा बचपन में मोटापे का शिकार होता है, उसके वयस्क होने पर भी मोटा रहने की संभावना अधिक होती है। मोटापे के कारण शरीर में इंसुलिन का प्रभाव कम होने लगता है, रक्तचाप बढ़ता है, कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड का स्तर बढ़ जाता है तथा शरीर में लगातार सूजन की स्थिति बनी रहती है। यही परिवर्तन आगे चलकर टाइप-2 मधुमेह, हृदय रोग और अन्य गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं।
किशोरियों में पॉलीसिस्टिक ओवरी डिजीज (पीसीओडी/पीसीओएस) के मामलों में भी तेजी से वृद्धि हो रही है। मोटापा, जंक फूड, व्यायाम की कमी और हार्माेनल असंतुलन इसके प्रमुख कारण हैं। अनियमित मासिक धर्म, मुंहासे, चेहरे पर अधिक बाल, वजन बढ़ना और भविष्य में गर्भधारण में कठिनाई इसके सामान्य लक्षण हैं। अच्छी बात यह है कि समय पर वजन नियंत्रित करने और नियमित व्यायाम शुरू करने से कई मामलों में दवाओं की आवश्यकता भी कम पड़ सकती है।
पहले टाइप-2 मधुमेह को उम्रदराज लोगों की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब यह किशोरों और युवाओं में भी तेजी से बढ़ रही है। मीठे पेय, जंक फूड, मोटापा और निष्क्रिय जीवनशैली इसके प्रमुख कारण हैं। यदि समय रहते जीवनशैली में सुधार नहीं किया गया तो भविष्य में आंखों, गुर्दों, नसों और हृदय से जुड़ी गंभीर जटिलताएं सामने आ सकती हैं।
फैटी लिवर भी अब बच्चों और युवाओं में तेजी से बढ़ती हुई एक ‘साइलेंट डिजीज’ बन चुका है। यदि इसका समय पर उपचार न किया जाए तो यह लिवर में सूजन, फाइब्रोसिस, सिरोसिस और यहां तक कि लिवर कैंसर का कारण भी बन सकता है।
अनियमित जीवनशैली का असर केवल शरीर तक सीमित नहीं रहता। मोटापे से ग्रस्त बच्चों में आत्मविश्वास की कमी, सामाजिक दूरी, चिंता, अवसाद और पढ़ाई में कमजोर प्रदर्शन जैसी मानसिक समस्याएं भी अधिक देखने को मिलती हैं। इसलिए स्वस्थ जीवनशैली केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी आवश्यक है।
इस पूरी चुनौती से निपटने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका परिवार और स्कूल की है। बच्चे वही सीखते हैं जो वे घर में देखते हैं। यदि माता-पिता स्वयं घर का भोजन खाएं, नियमित व्यायाम करें, स्क्रीन टाइम सीमित रखें और बच्चों के साथ खेलें, तो बच्चे भी वही आदतें अपनाते हैं। इसी प्रकार स्कूलों में खेल को अनिवार्य बनाया जाए, कैंटीन में जंक फूड पर रोक लगे, पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जाए और स्वास्थ्य शिक्षा को पढ़ाई का हिस्सा बनाया जाए।
स्वस्थ जीवन की शुरुआत किसी अस्पताल से नहीं, बल्कि घर की रसोई, स्कूल के खेल मैदान और परिवार की रोजमर्रा की आदतों से होती है। घर का ताजा भोजन, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, सीमित स्क्रीन टाइम और सक्रिय दिनचर्या ही आने वाली पीढ़ी को मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग, फैटी लिवर, पीसीओडी और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों से बचा सकती है।
याद रखें, बच्चों को सबसे बड़ी विरासत धन-दौलत नहीं, बल्कि स्वस्थ आदतें होती हैं। यदि आज उन्हें संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम और सक्रिय जीवनशैली की सीख दी गई, तो वे न केवल स्वस्थ नागरिक बनेंगे, बल्कि एक मजबूत और स्वस्थ भारत के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
-लेखक सुविख्यात सर्जन, आईएमए राजस्थान के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष व सामाजिक चिंतक हैं






