



शंकर सोनी, एडवोकेट
पिछले महीने पुलिस, अधिवक्ताओं और न्यायपालिका के बीच सामने आए टकराव भारतीय न्याय व्यवस्था, पुलिस प्रशासन और विधिक समुदाय के लिए गंभीर चेतावनी हैं। ये घटनाएं केवल आपसी विवाद नहीं, बल्कि उन संस्थागत मर्यादाओं पर उठते सवाल हैं, जिनके आधार पर लोकतंत्र और कानून का शासन कायम रहता है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय में 27 अक्टूबर 2026 को न्यायमूर्ति अजय भनोट की अदालत में एक अधिवक्ता और पुलिस अधिकारी के बैठने की जगह को लेकर विवाद हुआ। आरोप है कि न्यायाधीश ने अधिवक्ता के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया। इसके बाद अधिवक्ताओं ने अदालत में प्रदर्शन किया। 29 अक्टूबर को न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की अदालत में भी नारेबाजी की खबर सामने आई।
दूसरी घटना दिल्ली के शाहदरा थाने की है। 23 अक्टूबर को अधिवक्ता ललित बंसल के साथ मारपीट और उनके सिर पर गंभीर चोट लगने की खबर सामने आई। अधिवक्ताओं के प्रदर्शन के बाद दो पुलिस अधिकारियों का स्थानांतरण किया गया। इसके विरोध में 2 नवंबर को दिल्ली पुलिस के लगभग 80 कर्मचारी अपने ही पुलिस मुख्यालय के बाहर एकत्र होकर प्रदर्शन करने लगे। दोनों घटनाएं अशुभ संकेत हैं। सवाल यह है कि आखिर हमारी संस्थाएं किस दिशा में जा रही हैं?
यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि न्यायालय की गरिमा और अधिवक्ता की गरिमा एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं। अधिवक्ता का व्यवसाय केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि एक सामाजिक उत्तरदायित्व है। उसका काला कोट न्याय, अधिकारों और विधि के शासन के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है।
न्यायालय वह स्थान है, जहां नागरिक अपनी अंतिम उम्मीद लेकर पहुंचता है। न्यायाधीश का पद अत्यंत सम्माननीय है, लेकिन इसके साथ उतना ही बड़ा उत्तरदायित्व भी जुड़ा है। न्यायाधीश को अधिवक्ताओं के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना चाहिए। अधिवक्ता न्यायालय के अधीनस्थ कर्मचारी नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था के महत्वपूर्ण सहयोगी हैं।
मुझे वकालत करते हुए 49 वर्ष हो गए हैं। अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि पहले न्यायालय और अधिवक्ताओं के बीच विवाद बहुत कम होते थे। दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन वर्षों में न्यायालय और अधिवक्ता समुदाय, दोनों की गरिमा में गिरावट महसूस हुई है।
अब बात पुलिस की। पुलिस को समझना होगा कि वर्दी उसे अधिकारों का निरंकुश उपयोग करने की छूट नहीं देती। कानून लागू करने की शक्ति इसलिए दी गई है, ताकि सामान्य नागरिक भयमुक्त होकर जीवन जी सके। वर्दी किसी पुलिस अधिकारी को नागरिकों से ऊपर नहीं बनाती।
मुझे याद है कि करीब 40 वर्ष पूर्व एक न्यायाधीश ने पुलिस पर टिप्पणी करते हुए उसे संगठित गिरोह बताया था। आज भी आम जनता के मन में पुलिस का भय कम नहीं हुआ है। थाने में शिकायत लेकर पहुंचने वाला व्यक्ति सामान्य नागरिक हो, अधिवक्ता हो या जनप्रतिनिधि, उसके साथ कानून के अनुरूप व्यवहार होना चाहिए।
यदि कोई अधिवक्ता अपने साथी के साथ हुई घटना की शिकायत लेकर थाने पहुंचता है तो पुलिस का दायित्व है कि उसकी शिकायत सुने और विधि सम्मत कार्रवाई करे। कानून हाथ में लेने का अधिकार किसी को नहीं है। पुलिस अधिकारियों के स्थानांतरण के विरोध में पुलिसकर्मियों का अपने ही मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन करना विभागीय अनुशासन और शिकायत निवारण व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
पुलिस, अधिवक्ता और न्यायपालिका एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं। वे एक ही न्याय व्यवस्था के तीन महत्वपूर्ण अंग हैं। उनकी प्रतिष्ठा एक-दूसरे को नीचा दिखाने से नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान और जिम्मेदारी निभाने से बढ़ेगी।
न्यायपालिका को भी अपनी गरिमा के साथ पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही के उच्चतम मानक बनाए रखने होंगे। लोकतंत्र में कोई भी संस्था आलोचना से ऊपर नहीं है, लेकिन आलोचना का तरीका संवैधानिक और विधिसम्मत होना चाहिए।
इन टकरावों से सबसे अधिक नुकसान मुकदमों के पक्षकारों का हो रहा है। वह व्यक्ति, जो वर्षों से अपने मुकदमे के निर्णय की प्रतीक्षा कर रहा है, उसके लिए न्यायालय का प्रत्येक कार्य दिवस महत्वपूर्ण है। अधिवक्ताओं की हड़ताल से कामकाज प्रभावित होता है और अदालत में हंगामे से सुनवाई बाधित होती है। इसका खामियाजा उस आम नागरिक को भुगतना पड़ता है, जिसका इन विवादों से कोई लेना-देना नहीं है।
जब कानून के रखवाले ही कानून की मर्यादा भूलने लगें, तब आम नागरिक न्याय की उम्मीद किससे करे?
जजों, अधिवक्ताओं और पुलिस को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि संस्थाओं की प्रतिष्ठा जनता के विश्वास से बनती है। यदि यही विश्वास कमजोर हो गया तो किसी भी पद, वर्दी या काले कोट की गरिमा सुरक्षित नहीं रह सकेगी। जजों, वकीलों और पुलिस को इस बात की चिंता रहनी चाहिए कि यदि दुखी जनता ने करवट लेने का विचार कर लिया, तो फिर किसी संस्था की प्रतिष्ठा और अधिकारों का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।





