





शंकर सोनी, अधिवक्ता
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों और विपक्षी संगठनों का विरोध-प्रदर्शन लगातार गरमाता जा रहा है। इस समूचे राजनीतिक घटनाक्रम में कौन सा दल किस रणनीति के तहत आंदोलनरत है, यह उनका अपना विषय हो सकता है। किंतु एक सजग नागरिक और विधि का अध्येता होने के नाते, मेरा सरोकार किसी राजनीतिक खींचतान से नहीं, बल्कि उस विधिक धरातल से है जिस पर हमारे लोकतंत्र की समूची चुनावी व्यवस्था टिकी है। चुनाव की निष्पक्षता केवल मतदान के दिन पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसकी प्राथमिक आधारशिला मतदाता सूची के पारदर्शी और विधिसम्मत निर्माण पर आधारित होती है। इस दृष्टि से देखें तो वर्तमान चुनावी प्रक्रिया में निर्वाचन आयोग द्वारा अपनाई गई कार्यप्रणाली और विधिक प्रावधानों के अनुपालन में कुछ गंभीर विसंगतियाँ दृष्टिगोचर होती हैं।
सबसे बुनियादी प्रश्न निर्वाचन आयोग द्वारा जारी अधिसूचनाओं की विधिक संरचना और उनकी स्पष्टता को लेकर उठता है। आयोग के मूल आदेश, जिसके तहत बिहार में यह प्रक्रिया प्रारंभ हुई, तथा बाद में 27 अक्टूबर 2025 के आदेश, जिसके माध्यम से इसका विस्तार पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों में किया गया, में संवैधानिक और वैधानिक शक्तियों का सामान्य उल्लेख तो मिलता है, किंतु आवश्यक विशिष्टता का अभाव है। आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 324, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 तथा निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 का हवाला देते हुए ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ का निर्देश दिया। इसके पक्ष में दो दशकों का लंबा अंतराल, तीव्र गति से होता नगरीकरण, भारी पलायन, दोहरी प्रविष्टियों की आशंका और मृत्यु की सूचना न मिलने जैसे व्यावहारिक कारण गिनाए गए। किंतु पूरे राज्य में एक साथ लागू किए गए इस वृहद अभियान में यह कहीं स्पष्ट नहीं किया गया कि यह कवायद धारा 21 की उप-धारा (2) के तहत की जा रही है या उप-धारा (3) के अंतर्गत।
यहीं से शब्दावली और विधि का सीधा टकराव शुरू होता है। आयोग की अधिसूचना में प्रयुक्त पद ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) का चुनावी संविधियों में कोई अस्तित्व ही नहीं है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 और निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के नियम 25 के विधिक पाठ का विश्लेषण करें तो वहाँ केवल ‘विशेष’ (स्पेशल) या ‘गहन’ (इंटेंसिव) शब्दों का अलग-अलग संदर्भों में प्रयोग हुआ है, न कि दोनों के किसी संकर रूप का। यह केवल शब्दों का फेर नहीं है, बल्कि प्रक्रियात्मक वैधता का विषय है। नियम 25 के तहत गहन अथवा संक्षिप्त पुनरीक्षण की तय प्रक्रिया तभी लागू होती है जब पुनरीक्षण धारा 21(2) के तहत संचालित हो रहा हो। धारा 21(2) के तहत होने वाले पुनरीक्षण में नियम 4 से 23 तक वर्णित विस्तृत प्रक्रियाकृदावे, आपत्तियाँ, सत्यापन और अपीलों की श्रृंखलाकृका पालन अनिवार्य होता है।
वर्तमान प्रक्रिया में प्ररूप संख्या 6 (नाम जोड़ने के फॉर्म) के स्थापित प्रारूप में बदलाव, नाम जोड़ने और हटाने की समयबद्ध प्रक्रिया का अभाव, तथा संबंधित अपीलों के विधिक निस्तारण से पूर्व ही चुनाव प्रक्रिया को आगे बढ़ा देना कई प्रक्रियात्मक कमियों को उजागर करता है। यदि नियमावली से इतर जाकर प्रक्रिया तय की जाती है, तो वह चुनाव की शुचिता को संशय में डालती है।
यद्यपि माननीय सर्वाेच्च न्यायालय ने बिहार आम चुनाव संबंधी एक पूर्व प्रकरण में आम चुनाव की परिस्थिति को धारा 21(3) के दायरे में विशेष चुनाव के रूप में व्याख्यायित किया था, तथापि विधिक दृष्टिकोण से इस पर पुनर्विचार की गुंजाइश बनी रहती है। धारा 21(2) सीधे तौर पर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के नियमित ‘आम चुनावों’ के पूर्व मतदाता सूची के पुनरीक्षण का स्वाभाविक विधान करती है। इसके विपरीत, धारा 21(3) एक अपवादात्मक और अवशिष्ट शक्ति है, जो ‘अभिभावी खंड’ (नॉन-ऑब्स्टांटे क्लॉज) के साथ आयोग को किसी विशेष परिस्थिति में ‘किसी निर्वाचन क्षेत्र या उसके किसी भाग’ के लिए विशेष पुनरीक्षण का अधिकार देती है। यह लक्षित शक्ति परिसीमन, पुनर्गठन या किसी असाधारण स्थानीय संकट के लिए बनाई गई थी, न कि पूरे राज्य के नियमित आम चुनावों की सामान्य प्रक्रिया को प्रतिस्थापित करने के लिए।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग को असाधारण स्वायत्तता और गरिमा प्राप्त है। किंतु संसद ने जब नामावली पुनरीक्षण के लिए दो पृथक वैधानिक मार्ग निर्धारित किए हैं, तो इस संवैधानिक संस्था से यह अपेक्षा सर्वथा उचित है कि वह स्पष्ट करे कि वह किस अधिकार क्षेत्र का प्रयोग कर रही है। यह स्पष्टता कोई मामूली तकनीकी औपचारिकता नहीं है; इसी पर यह निर्भर करता है कि आम नागरिक के मताधिकार का नियमन विधि की तय संहिताओं से होगा या किसी तदर्थ प्रशासनिक व्यवस्था से। लोकतान्त्रिक संस्थाओं का इकबाल उनकी विधिक स्पष्टता में ही सुरक्षित रहता है।





