




ग्राम सेतु पॉलिटिकल डेस्क
बिहार में समस्तीपुर जिले के विभूतिपुर प्रखंड के गांव कापन से निकलकर छात्र राजनीति में अपनी मज़बूत पहचान बनाने वाले विवेक कुमार आज संघर्षशील छात्र नेतृत्व की मिसाल बन चुके हैं। 21 वर्षीय विवेक कुमार, पिछड़ा वर्ग (कोइरी/कुशवाहा) समुदाय से आते हैं और एक साधारण किसान परिवार में जन्म लेकर असाधारण हौसले के साथ छात्र हितों की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनके पिता विकास कुमार महतो पेशे से किसान हैं, यानी ज़मीन से जुड़ा घर, और ज़मीन पर टिककर संघर्ष करने की आदत। आज विवेक कुमार का जन्मदिन है। वे पूरे 21 साल के हो रहे हैं। उन्हें फोन पर बधाइयां मिल रही है।
दिखने में दुबले-पतले विवेक कुमार की प्रारंभिक शिक्षा कक्षा 1 से 8 तक गांव के ही माध्यमिक विद्यालय कापन में हुई। इसके बाद उन्होंने दसवीं की पढ़ाई लड्डू लाल उच्च विद्यालय, सिरसी से पूरी की। 11वीं और 12वीं की शिक्षा अनुमंडल रोसेरा स्थित उदयनाचार्य कॉलेज, रोसेरा से प्राप्त की। आगे चलकर उन्होंने अपने नज़दीकी क्षेत्र के डी.बी.के.एन कॉलेज, नरहन (विभूतिपुर) से प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति विषय में स्नातक की डिग्री हासिल की। पढ़ाई के इस पूरे सफर में संसाधन सीमित थे, लेकिन इरादे पूरे थे।
स्नातक अध्ययन के दौरान ही विवेक ने कॉलेज परिसर की हकीकत को नज़दीक से देखा, छात्रों की समस्याएं, अव्यवस्थाएं और अनसुनी शिकायतें। हजारों छात्र-छात्राएं जिन हालात से जूझ रहे थे, उसने विवेक को भीतर से बेचैन कर दिया। यहीं से उनके मन में छात्र राजनीति का रास्ता साफ हुआ। वे कहते हैं कि जैसे बाजार में गुच्छे में बिकने वाले अंगूरों की कीमत ज्यादा होती है, वैसे ही एकजुट होकर उठाई गई आवाज़ ही असरदार होती है। इसी ‘एकता में बल’ के सिद्धांत ने उनके संघर्ष को दिशा दी।
इसी विचार के साथ विवेक सामाजिक न्याय की विचारधारा वाले छात्र संगठन भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) से जुड़े और कैंपस स्तर पर छात्र राजनीति की शुरुआत की। उनका साफ मानना है कि राजनीति की पहली सीढ़ी कॉलेज से शुरू होती है। कॉलेज की समस्याओं के खिलाफ उन्होंने लगातार आवाज़ उठाई, भूख हड़ताल से लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन तक। इन आंदोलनों का परिणाम भी सामने आया और कई महत्वपूर्ण छात्रहितकारी मांगें पूरी हुईं।
जनवरी 2025 में जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समस्तीपुर पहुंचे, तब विवेक और उनके साथियों ने कुछ प्रमुख मांगों को लेकर उनसे मिलने का प्रयास किया। मुलाकात न हो पाने पर विरोध दर्ज कराया गया, जिस पर कानूनी कार्रवाई हुई। विवेक सहित कई छात्र नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, उन पर मुकदमा दर्ज हुआ। लेकिन वक्त ने यह साबित कर दिया कि संघर्ष बेकार नहीं गया, बिहार के प्रत्येक प्रखंड में डिग्री कॉलेज की मांग, जो आंदोलनों का अहम मुद्दा थी, हाल ही में पूरी हुई।
विवेक की निरंतर सक्रियता और संघर्ष को देखते हुए संगठन नेतृत्व ने उन्हें एनएसयूआई का जिला उपाध्यक्ष नियुक्त किया। इस जिम्मेदारी को वे पूरी ईमानदारी और प्रतिबद्धता से निभा रहे हैं। जुलाई 2025 में केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के समस्तीपुर आगमन के दौरान नए रेलखंडों सहित अन्य जनहितकारी मांगों को लेकर हुए विरोध में भी विवेक अग्रिम पंक्ति में रहे। एक बार फिर पुलिसिया दमन झेलना पड़ा, लेकिन बाद में मांगों का पूरा होना संघर्ष की जीत साबित हुआ।
इसके अलावा विवेक ने पेपर लीक, बेरोजगारी, पलायन रोको, नौकरी दो यात्रा, एसआईआर विरोध प्रदर्शन और मनरेगा बचाओ यात्रा जैसे आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाई। कई बार गिरफ्तारी और मुकदमों के बावजूद उनका हौसला डिगा नहीं। साफ है, डर उनका रास्ता नहीं, संघर्ष उनकी पहचान है।
आज विवेक कुमार की छवि एक ऐसे छात्र नेता की बन चुकी है जो सवाल पूछता है, जवाब मांगता है और जरूरत पड़े तो कीमत भी चुकाता है। पुरानी कहावत है, राजनीति भाषण से नहीं, बलिदान से बनती है। विवेक उसी परंपरा के सच्चे वारिस नज़र आते हैं।






