



आर्किटेक्ट ओम बिश्नोई.
माँ रात को हथाई के बाद अक्सर कहती है, ‘बेटा, हाथ देयी ऊबो होंणों है।’ यह वाक्य सिर्फ थकान उतारने की हिदायत नहीं, जीवन का गूढ़ दर्शन है। इसमें खड़े होने की जिद है, अंतिम समय तक टिके रहने का संकल्प है। यह वही आंदोलन है जो मनुष्य के भीतर जन्म से लेकर आखिरी सांस तक चलता रहता है, कभी दिखता है, कभी भीतर ही भीतर धड़कता है। बच्चा जब जन्म लेता है, तो घुटनों के बल चलना उसकी पहली जीत होती है। पर उसी क्षण उसके भीतर खड़े होने का आंदोलन शुरू हो जाता है। वह चारपाई, बिस्तर या किसी अपने की उँगली पकड़कर उठने का अभ्यास करता है। फिर डग भरता है, डग नहीं, भरोसा भरता है। गिरता है, मुस्कुराता है, फिर उठता है। यह जीवन का पहला पाठ है, गिरना स्थायी नहीं, खड़ा होना अभ्यास से आता है। यही अनुभव उसके अवचेतन में बस जाता है और आगे चलकर शिक्षा, रोजगार, खेती-किसानी या व्यवसाय, हर मोर्चे पर वही भीतर का आंदोलन उसे आगे बढ़ाता है।

यही व्यक्तिगत अनुभव जब सामाजिक धरातल पर उतरता है, तो इतिहास बनता है। समाजों और समूहों के आंदोलनों ने ही मनुष्य को गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार दिलाए हैं। आदिम काल से मनुष्य मानसिक रूप से आंदोलित रहा, फिर उसने उस बेचैनी को धरातल पर उतारा। इसी बेचैनी ने विचारक दिए, विद्वान दिए, और ऐसा साहित्य रचा जिसने शोषण और बुराइयों के खिलाफ आवाज़ उठाई। मंचों से गूँजती यही आवाज़ दबे-कुचले वर्गों, किसानों और कामगारों को आंदोलित रखती है, सम्मान के साथ जीने की चाह में।
मेरे इलाके, टिब्बी क्षेत्र में एथेनॉल फैक्ट्री के खिलाफ चल रहा आंदोलन भी इसी श्रृंखला की एक कड़ी है। बाजारवाद और अंतहीन मुनाफे की लालसा ने शहर-दर-शहर प्रदूषण का अंबार लगा दिया है। आकाश धुएँ से अटा है, सड़कों के किनारे सड़ा पानी कराह रहा है। नदियाँ और नहरें अब जीवन नहीं, बीमारियाँ ढो रही हैं। फैक्ट्रियों से निकलता धुआँ आँखों को चुभता है, और प्रदूषण से निपटने के साधन अक्सर दफ्तरों में शोपीस बने रहते हैं। जाँच-पड़ताल महज़ औपचारिकता बनकर रह जाती है।

विज्ञान रोज़ समाधान देता है, वैज्ञानिक रास्ते बताते हैं, पर भोगवाद, मुनाफे की भूख और भ्रष्टाचार ने समाज को जकड़ लिया है। गांधीवादी तरीकों से आंदोलन महीनों चलते हैं, हमने लंबा, शांतिपूर्ण किसान आंदोलन देखा है। अफ़सोस यह कि किसानों, मजदूरों और आम जनों के आंदोलनों से सिस्टम में अक्सर वह हलचल नहीं होती जिसकी जरूरत है। समाधान टलते रहते हैं, या आधे-अधूरे होकर लौट आते हैं।
किसान बिरादरी से आने के नाते किसानों से मुलाकातें होती रहती हैं, कभी विवाह में, कभी शोक सभाओं में, कभी आंदोलन के बीच। खाद-बीज समय पर न मिलना, और मिले तो नकली निकलनाकृयह दर्द रोज़ दिखता है। मंडियों में फसल का सरकारी भाव पर न बिक पाना, और भ्रष्ट अधिकारियों के आगे बेबसी, यह दृश्य अब सामान्य हो चला है। किसान बार-बार सिस्टम की चौखट पर खड़ा होकर हुंकार भरता है। सिस्टम थोड़ी देर जागता है, कुछ अधूरे समाधान देता है, फिर सो जाता है।
एक किसान मित्र की बात भीतर तक चुभती है। वे कहते हैं, बाजारवाद के बड़े खिलाड़ी और सिस्टम के भ्रष्ट कॉकटेल ने किसान-मजदूर को इतना पीछे धकेल दिया है कि वह दीवार से जा लगा है। ऐसे हालात में कभी दीवार टूटती है, कभी पीठ। फिर भी मनुष्य का भीतर का आंदोलन नहीं रुकता। बचपन में चारपाई पकड़कर, कभी अपनों की उँगली थामकर, और बुढ़ापे में बच्चों का हाथ पकड़कर ऊबो होने की जिद चलती रहती है।
आज किसान भी खड़े हैं, एक-दूसरे का हाथ थामे। भीतर के आंदोलन को संभालकर, इस उम्मीद में कि उनका जीवन गरिमापूर्ण हो सके और उनकी धरती प्रदूषण से कुछ हद तक बची रहे। किसान का जमीन से रिश्ता माँ-बेटे जैसा होता है। माँ बीमार पड़े, तो बेटा चुप नहीं बैठता। यही कारण है कि यह आंदोलन सिर्फ विरोध नहीं, जीवन की रक्षा का संकल्प है। जीवन सच में आंदोलन है। खड़े होने की जिद, हाथ थामने की ताकत, बिलकुल मां की तरह और गिरकर भी मुस्कुराने का साहस। जब तक यह जिद ज़िंदा है, उम्मीद भी ज़िंदा है।


