



डॉ. एमपी शर्मा
भारत में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना ने समाज की जमी हुई सोच को झकझोरने का काम किया। इस पहल ने यह स्पष्ट किया कि बेटी कोई बोझ नहीं, बल्कि परिवार और राष्ट्र का उज्ज्वल भविष्य है। लेकिन सच कहें तो आज यह यात्रा बीच रास्ते में है। समय हमसे एक कदम आगे बढ़ने की मांग कर रहा है, सिर्फ बचाने और पढ़ाने से आगे बढ़कर, बेटी को हर रूप में सशक्त बनाने की। पढ़ाई जरूरी है, मगर काफी नहीं। अधूरी शिक्षा वैसी ही है जैसे बिना इंजन की गाड़ी, दिखती अच्छी है, चलती नहीं।
एक सशक्त बेटी का अर्थ केवल डिग्रीधारी बेटी नहीं है। सशक्त बेटी वह है जो शारीरिक रूप से मजबूत हो, जिसे आत्मरक्षा आती हो, जो खेलकूद में आगे हो; मानसिक रूप से आत्मविश्वासी हो जो निर्णय ले सके, गलत को गलत कह सके; और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो, जिसके पास कौशल हो, रोजगार हो, अपनी कमाई हो। सच्चाई कड़वी है, पढ़ी-लिखी लेकिन आर्थिक रूप से निर्भर बेटी आज भी आधी आज़ाद है।
भारत की बेटियों ने बार-बार साबित किया है कि जब अवसर मिले, तो वे असंभव को संभव बना देती हैं। कल्पना चावला ने आसमान नहीं, अंतरिक्ष छू लिया। मैरी कॉम ने संघर्ष को अपनी ताकत बनाया। पी. वी. सिंधु ने विश्व मंच पर भारत का परचम लहराया। किरण बेदी ने प्रशासन में नारी शक्ति की नई परिभाषा गढ़ी। इन सबने केवल पढ़ाई नहीं की, इन्होंने खुद को हर स्तर पर सशक्त बनाया। संदेश साफ है, किताब के साथ काबिलियत भी चाहिए।
आर्थिक आत्मनिर्भरता सशक्तिकरण की रीढ़ है। जब बेटी अपने पैरों पर खड़ी होती है, तब उसे समझौते नहीं करने पड़ते। वह अन्याय के खिलाफ खड़ी हो सकती है, उसका आत्मसम्मान मजबूत होता है और उसकी पहचान स्पष्ट होती है। सीधा गणित है, आर्थिक स्वतंत्रता = असली स्वतंत्रता। इससे परिवार और समाज में बराबरी आती है, दया नहीं, सम्मान मिलता है।
परिवर्तन घर से शुरू होता है। बेटियों को निर्णय लेने में शामिल करना होगा, उनकी राय को महत्व देना होगा। नेतृत्व के अवसर देने होंगे। जो बेटी घर में सुनी जाती है, वही समाज में भी सुनी जाती है। अगर घर के फैसलों में बेटियों की आवाज़ नहीं है, तो पंचायत, नगर परिषद, विधानसभा और संसद तक पहुँच की उम्मीद खोखली है।
राजनीतिक सहभागिता बदलाव की असली कुंजी है। निर्णय लेने का सबसे बड़ा मंच राजनीति है। जब पंचायत से संसद तक महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी, तब नीतियों में महिलाओं की दृष्टि शामिल होगी। और जब नीति बनाने वाली कुर्सियों पर बेटियाँ बैठेंगी, तभी समाज में वास्तविक परिवर्तन आएगा। कानून बनना जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है कि उन कानूनों में बेटियों का अनुभव और सोच झलके।
आज जरूरत इस बात की है कि हम सोच बदलें। बेटी को बचाना शुरुआत है, पढ़ाना जिम्मेदारी है, लेकिन सशक्त बनाना हमारा कर्तव्य है। बेटी को इतना मजबूत बनाओ कि उसे सुरक्षा नहीं, अवसरों की जरूरत महसूस हो। बेटा-बेटी के भेदभाव को खत्म करें। बेटियों को ‘कमजोर” नहीं, काबिल’ मानें। उन्हें डर नहीं, आत्मविश्वास दें। कानून से ज्यादा असर सोच का होता है, सोच बदलेगी तो समाज बदलेगा।
अब नारा भी आगे बढ़ना चाहिए, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के साथ बेटी को सशक्त बनाओ, आत्मनिर्भर बनाओ। क्योंकि जब बेटी मजबूत होगी, तभी परिवार मजबूत होगा, समाज सशक्त होगा और राष्ट्र सच मायनों में आगे बढ़ेगा। परंपराएं तब ही जीवित रहती हैं, जब वे समय के साथ मजबूत बनें और भारत की बेटियाँ यही मजबूती हैं।
-लेखक सीनियर सर्जन आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं






