



ग्राम सेतु डेस्क.
हनुमानगढ़ जिले के गांव नवां निवासी भारतीय सेना के रिटायर्ड नायक दयाल सिंह (85) शनिवार शाम जीवन की अंतिम लड़ाई हार गए, लेकिन रविवार को जब उनका पार्थिव शरीर पैतृक गांव नवां की कल्याण भूमि पहुंचा तो माहौल पूरी तरह देशभक्ति में डूबा हुआ था। तिरंगे में लिपटे दयाल सिंह को सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। लालगढ़ छावनी से पहुंचे सूबेदार शेर सिंह, हवलदार मायाप्रकाश और हवलदार देव ने पुष्पचक्र अर्पित कर सलामी दी। जैसे ही बिगुल की गूंज के साथ शस्त्रों की सलामी गिरी, वहां मौजूद हर आंख नम और हर दिल गर्व से भरा दिखा। जिला मुख्यालय स्थित सिविल लाइंस से उनकी शवयात्रा रवाना हुई। मुखाग्नि उनके पुत्र मेजरसिंह दंदीवाल ने दी। बेटे के हाथों जब चिता प्रज्ज्वलित हुई, तो वह क्षण सिर्फ एक परिवार का नहीं, पूरे गांव और जिले का भावुक क्षण बन गया। देशभक्ति के गगनभेदी नारों से आसमान गूंज उठा। ‘भारत माता की जय’ का नारा मानो उस सपूत को धन्यवाद दे रहा था, जिसने जीवन का सर्वश्रेष्ठ समय देश की सेवा में समर्पित किया।
दयाल सिंह का जीवन अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रप्रेम का जीवंत उदाहरण था। भारतीय सेना में रहते हुए उन्होंने सीमाओं की रक्षा की, कठिन परिस्थितियों में डटे रहे और वर्दी की मर्यादा को अपने आचरण से ऊंचा रखा। सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका जीवन सादगी, समयपालन और समाज के प्रति जिम्मेदारी से भरा रहा। सेना से दयाल सिंह का ऐसा लगाव था कि उन्होंने बेटे का नाम भी मेजर सिंह रखा। पड़ोसी पाल सिंह बताते हैं कि वे युवाओं को हमेशा अनुशासन और सेवा की सीख देते थे, कहते थे, देश पहले, बाकी सब बाद में।
अंतिम संस्कार के दौरान मौजूद नागरिकों ने दयाल सिंह के योगदान को याद करते हुए उनके अनुशासित जीवन के किस्से साझा किए। गांव के बुजुर्गों ने बताया कि जब भी तिरंगा फहरता, दयाल सिंह सीना तानकर खड़े हो जाते। त्योहार हो या राष्ट्रीय पर्व, उनका घर देशभक्ति की खुशबू से महकता रहता। बच्चों को वे सैनिक जीवन की कहानियां सुनाते और बताते कि देश की रक्षा केवल सीमा पर ही नहीं, हर नागरिक के ईमानदार आचरण से होती है।
लालगढ़ छावनी से पहुंचे सूबेदार शेर सिंह ने कहा कि रिटायर्ड सैनिकों का पूरा रिकॉर्ड सेना के पास रहता है और समय-समय पर दूरभाष के जरिए उनकी कुशलक्षेम भी पूछी जाती है। दयाल सिंह के निधन की सूचना मिलते ही सेना की ओर से सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई देने की व्यवस्था की गई। पुष्पचक्र अर्पित कर सलामी देना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि उस ऋण को स्वीकार करना है जो देश अपने सपूतों पर हमेशा चढ़ा रहता है।
इस अवसर पर सामाजिक, राजनीतिक, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी भी मौजूद रहे। सभी ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि दयाल सिंह जैसे सैनिक समाज के लिए प्रेरणा हैं। उनकी सेवा, त्याग और अनुशासन आने वाली पीढ़ियों को सही राह दिखाते रहेंगे। प्रशासनिक अधिकारियों ने परिवार के प्रति संवेदना जताई और हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया।
दरअसल, नवां गांव की कल्याण भूमि रविवार को राष्ट्रभक्ति का मंच बन गई थी। तिरंगे की छांव के बीच दयाल सिंह को विदा किया गया। उनकी चिता की लपटें मानो यह संदेश दे रही थीं कि सपूत मिट्टी में मिल जाता है, लेकिन उसकी देशभक्ति कभी नहीं बुझती। उल्लेखनीय है कि रिटायर्ड नायक दयाल सिंह के पुत्र मेजर सिंह सिविल लाइंस के एफ ब्लॉक में रहते हैं। वे राजकीय अध्यापक हैं। मेजर सिंह भी अपने पिता दयाल सिंह की तरह नेकदिल इंसान और सादा जीवन उच्च विचार को जीते हैं। ‘भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप’ रिटायर्ड सैनिक दयाल सिंह के निधन से शोकाकुल है और परिजनों के प्रति गहरी संवेदना प्रकट करता है।



