



रूंख भायला.
राजी राखै रामजी ! होळी रै मौकै आज बात रंगां री, बां री रंगत री। जिनगाणी रो दूजो नांव रंग ई है। भांत-भांत रा रंग, कदे मन चाइजता, कदे हर चाइजता। सुरंगा रंग मन हरखावै तो पक्का जियाजूण में सोग टिपावै। रंग पक्का होवै का सुरंगा, दोनां री आपरी मरजादा अर काण कायदा है आपणी संस्कृति में….।
आं दिनां होळी रो डांडो रूप्योड़ो है, कीं कमती ई सही, पण अजेस ई चौक चौराया अर गांव-गवाड़ां में डफ अर चंग रा धमीड़ा सुणीजै, देर रात तक धमाळां रा सुर गूंजबो करै। रंगां रो तिंवार है होळी, रूस्योड़ां नै मनावणै रो तिंवार है होळी, रंग बरसै तो रंग मतैई लागै। रंग तो लागणा ई चाइजै पण कई लोग रंग लागणै अर लगावणै सूं भोत डरै, कांई ठाह क्यूं ?
बान्नै कैवणो है, ‘अरे डोफो ! रंग तो भाग आळै रै लागै, अर बे ई रामजी लगावै जणां….!’ नींतर बैठ्या रैवो मूंडो लटकायां, कुण कन्नै बेल्ह है, आपरै रंग लगावण री !
कवि कागद री ओळ्यां चेतै आवै-
होळी है गुलाल है/पण मसळां कीं रै/गालां रो काळ है…
सियासी बात करां तो रंगां सूं डर भी वाजिब है। बैरण सियासत रंगां नै ई खेमां में बांट दियो है। रूंख भायलै री अेक भोत चावी ठावी कविता ‘रंगां सूं डर’, बांचो दिखाण-
…..रंगां सूं भोत डर लागै
जेकर लाल म्हारी पसंद है
लोग म्हानै कामरेड बतावै
जे म्हानै नीलो रंग भावै
बै म्हारो दलितां सूं नातो बतावै
जे केसरियो रंग ओपावूं
तो म्हूं हिंदू हो जावूं
हरयै री पसंद बतावता ई
म्हूं मियों बण जावूं
जेकर काळो पैरूं
तो गुप्तचर एजेंस्यां म्हां पर निजरां गडावै
म्हानै राज रो विरोधी बतावै
अर धौळो…… !
बो तो अबै रंग ई नीं है
कारण ?
सांयती सूं जीवण रो म्हां कन्नै
ढंग ई नीं है…..
ओ डर सियासी हो सकै पण कुदरती रंगां सूं कुण बेराजी ! साची बात आ कै रंग बिना सब सून है। आपणै अठै तो बधाई देवां जणाई कैवां, घणा घणा रंग आपनै ! राजस्थानी लोक में रंगां री रंगत न्यारी। जे चेतो राख’र देखां, तो ठाह लागै कै हर रंग आपरी निरवाळी पिछाण राखै, माइना ई न्यारा न्यारा…। सोचो दिखाण-
मूंडो फगत काळो ई नीं होवै, कदे कदे धौळै होवण री बात ई सामीं आवै। काळो होवण रो मतलब भूंडीजणो, कोई माडो काम होवणो। पण मूंडै रै धौळै होवण री बात करां तो कोई चोरी पकड़ीजणी, इचरज रो भाव। काळै-धौळै सूं आगै बधां तो मूंडो लाल होवै रीसां में…..अर पीळो पड़ै हारी बेमारी में। अबै थे कैयस्यो, भाई जी, मूंडो हरो तो कोनी होवै। भाई र्ह यो तो मिनख होवै मिनख नै देख’र ! हरख रो रंग है हरो, अर सोग रो ……..ना बूझो काळो, भूरो, नीलो, हरो अर धौळो….। रंगां रै पेटै कैबत चेतै आवैै-
‘म्हां सूं गोरै नै पीळियो रो रोग होवैला !’ संस्कृत भासा में इण कैबत नै इण ढाळै कहिज्यो है-अहं सत्यं, जगत मिथ्या !’ फिल्मी डॉयलॉग री बात करां तो ‘हमसे बढ़कर कौन !’
आपां लाल नै रातौ कैवां, अर हरयै नै लीलो। नीलो न्यारो होवै भई, जमानों चोखो होवै तो खेत लीला होवै, डांगरां सारू धपाऊ लीलो होवै उण बगत। हरयै यानी लीलै सूं ई आपणै अठै रंगरेज नै लीलगर कहिजै, लीलगर…. अरे भई रंगारो ! इण रंग रै पेटै लीलगर कद अर कांई ठाह अेक जात बणगी।
आपणो देस ‘रंगीलो राजस्थान’ कहिजै। जूनै बगत में लगोलग पड़तै काळ रै बिच्चाळै अठै रै मानवी अबखायां सूं बांथेड़ो करतां थकां ई कुदरती रंगां नै बेरंग नीं होवण दिया। आज घड़ी आखी दुनिया में सैं सूं रंग रंगीला गाभा अर खान-पान आपणी संस्कृति में लाधै। आपणै लाल चुट्ट है तो धौळो धप्प, काळो टींट है तो गोरो गेऊं बरणो, घणो गोरो दूधां धोयो, लीलो मूंगियो है का तोतियो, पीळो पोमचो है का पोतियो और ई घणाई….। आपां रै लोक में तो सुरजी रै घोड़लां रा ई न्यारा न्यारा रंग गाइजै-
काळो सूरज जी रो घोड़लो
सहेल्यां अे
काळा राणी रैणा दे रा केस….
पीळो सूरजजी रो घोड़लो
सहेल्यां अे
पीळो राणी रैणा दे रो रूप…..
हरियो सूरज जी रो घोड़लो
सहेल्यां अे
हरी राणी रैणा देरी गोद
इण लोकगीत में सुरजी रै सातूं घोड़ां रा सात रंग गाइजै। रंगां नै बखाणता अेक दूजै गीत में बीनणी लीलगर सूं अरज करै कै ‘और रंग दे रे भाया ओजूं रंग रे म्हारी सासूजी रै दाय कोनी आई रे लीलगर और रंग दे…।
बात रो सार ओ है कै रंगां रो संसार घणो मनभावनो…..रंगां बिना चौफेर सून। रंग लागणा अर लगाणा चाइजै। सगळै बांचणियां नै होळी री मोकळी बधाई, घणा घणा रंग। बाकी बातां आगली हथाई में। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेखक राजस्थानी और हिंदी के सशक्त हस्ताक्षर हैं







