



डॉ. गौरीशंकर निमिवाळ
भारतीय ज्ञान परंपरा में नाट्य को पंचम वेद माना गया है। मान्यता है कि इसके रचयिता स्वयं ब्रह्मा हैं। नाट्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन का समग्र दर्शन है, जहाँ काव्य, अभिनय, नृत्य और संगीत एक-दूसरे में घुलकर समाज का सच कहते हैं। इसी परंपरा की लोकधर्मी धारा राजस्थान में लोकनाट्य के रूप में फली-फूली, जिसने आगे चलकर आधुनिक राजस्थानी रंगमंच की मजबूत नींव रखी।
राजस्थानी लोकनाट्य की सबसे बड़ी ताकत उसकी सामूहिकता रही है। तीज-त्योहार, मेले, उत्सव और मगरिया जैसे अवसरों पर पूरा गाँव ही रंगमंच बन जाया करता था। किसी अलग मंच, परदे या रोशनी की जरूरत नहीं होती थी। रास, ख्याल, तमाशा, सांग, भगत, नौटंकी, रामलीला, रासलीला और तुर्रा-कलंगी जैसी विधाओं में आम आदमी की भागीदारी ही इन नाट्यों की आत्मा थी। यही कारण है कि राजस्थानी नाटक की जड़ें लोकजीवन में गहराई तक धंसी हुई हैं।
राजस्थानी नाटक की लिखित परंपरा उन्नीसवीं सदी के अंत में दिखाई देती है। कवि कृपाराम के प्रयासों के बाद 1900 में शिवचंद्र भरतिया का केसर विलास प्रकाशित हुआ, जिसे राजस्थानी भाषा का पहला नाटक माना जाता है। यह नाटक पारंपरिक लोकनाट्य से अलग, आधुनिक रंगमंच की ओर बढ़ता कदम था। इसके बाद फाटका जंजाल, बुढ़ापा री सगाई, ढलती फिरती छाया, बाल विवाह, कन्या बिक्री जैसे नाटकों ने सामाजिक कुरीतियों पर तीखे प्रहार किए। हालांकि अभिनय और मंचीय दृष्टि से उस दौर में केसर विलास को ही सबसे अधिक सफल माना गया।
बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में राजस्थानी नाटक ने सामाजिक सुधार, ऐतिहासिक चेतना और लोक आस्था तीनों को साथ लेकर चलना शुरू किया। मीरां, जयपुर की ज्योणार, नई बीनणी जैसे नाटकों ने सामाजिक यथार्थ को स्वर दिया। इसी काल में पंडित भरत व्यास ने ढोला मरवण और रामू चनणा जैसे नाटक लिखे, जिनमें लोककथा, संगीत और सिनेमाई प्रभाव का सुंदर समन्वय दिखता है। इन नाटकों की लोकप्रियता ने राजस्थानी रंगमंच को व्यापक पहचान दिलाई।
आजादी के बाद राजस्थानी नाटक ने नई ऊर्जा और नई दृष्टि के साथ यात्रा शुरू की। राजनीति, सामाजिक विषमता, मानवीय संवेदनाएँ और सांस्कृतिक संघर्ष, इन सबको नाटक का विषय बनाया गया। 1950 के बाद पंडित भरत व्यास, यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’, लक्ष्मीनारायण रंगा, बी.एल. माली ‘अशांत’ जैसे नाटककारों ने समकालीन यथार्थ को मंच पर लाने का साहस किया। खासकर 1980 से 1990 का दशक राजस्थानी नाटकों के लिए स्वर्णिम काल माना जाता है, जब भाषा, शिल्प और रंग-परिकल्पना में नए प्रयोग हुए।
इसी दौर में आधुनिक राजस्थानी रंगमंच के प्रवर्तक डॉ. अर्जुनदेव चारण का उदय हुआ। उन्होंने लोकनाट्य शैलियों को आधुनिक रंगभाषा से जोड़ते हुए बोल म्हारी मछली इतो पाणी, म्हे राजा थे प्रजा, जेठवा उजली, धरमजुध, जातरा, मुगतीगाथा जैसे कालजयी नाटक दिए। धरमजुध पर उन्हें 1992 का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलाकृराजस्थानी नाट्य विधा के लिए यह ऐतिहासिक क्षण था। मुगतीगाथा का राष्ट्रीय और दूरदर्शन पर मंचन राजस्थानी रंगमंच की अभूतपूर्व उपलब्धि रहा।
राजस्थानी रंगमंच को संस्थागत मजबूती देने में ‘रम्मत’ संस्था की भूमिका ऐतिहासिक रही है। लगभग 46 वर्षों में 500 से अधिक रंग प्रस्तुतियाँ देकर इस संस्था ने यह साबित किया कि परंपरा और प्रयोग साथ-साथ चल सकते हैं। आज युवा रंगकर्मी आशीष चारण के निर्देशन में धरमजुध, गवाड़ी और म्हे राजा थे प्रजा जैसे नाटकों की नई रंग-भाषा में प्रस्तुतियाँ राजस्थानी रंगमंच को नई ऊँचाइयों पर ले जा रही हैं।
वर्तमान में जोधपुर, बीकानेर, जयपुर, उदयपुर और भीलवाड़ा जैसे शहरों में समर्पित रंगकर्मी निरंतर सक्रिय हैं। उपन्यास और कहानियों के नाट्य रूपांतरण, लोककथाओं के नए पाठ और समकालीन मुद्दों पर आधारित नाटक, यह सब राजस्थानी रंगमंच की जीवंतता का प्रमाण हैं।
कुल मिलाकर, राजस्थानी नाटक केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि आज भी जीवित, सवाल पूछने वाली और समाज को आईना दिखाने वाली विधा है। जरूरत है उसी समर्पण, ईमानदारी और साधना की, जिससे यह परंपरा आगे भी फलती-फूलती रहे। विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर यही कामना है कि राजस्थानी रंगमंच अपनी लोक जड़ों से जुड़ा रहकर आधुनिक मंच पर और भी मजबूती से खड़ा हो।
-लेखक राजकीय महाविद्यालय सूरतगढ़ में सहायक आचार्य हैं








