



शंकर सोनी
आज देश के राजनीतिक गलियारों में जिस तरह से ‘आम आदमी पार्टी’ के सात सांसदों के विलय की असंवैधानिक चर्चाएं भाजपा के शीर्ष नेतृत्व द्वारा हवा दी जा रही हैं, वह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक काला अध्याय है। हालांकि मैं स्वयं आम आदमी पार्टी के संविधान पर हस्ताक्षर करने वाले संस्थापक सदस्यों में से एक हूं जो केजरीवाल ग्रुप की बेईमानियों के कारण पार्टी से अलग हो गया था। मैं:आप’ के सांसदों की नाराजगी को भी समझ सकता हूं पर इन सातों सांसदों के दलबदलने के असंवैधानिक कृत्य के विरुद्ध हूं।
यह एक अत्यंत गंभीर और संवैधानिक चिंता का विषय है। जब जिम्मेदार पदों पर बैठे व्यक्ति ही संविधान की मूल भावना और ‘दलबदल विरोधी कानून’ की मर्यादाओं को दरकिनार करने लगें, तो लोकतंत्र के सजग प्रहरियों का बोलना अनिवार्य हो जाता है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को यह समझना होगा कि संविधान किसी की जागीर नहीं, बल्कि भारतीय जनतंत्र की आत्मा है।
संविधान की 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) बहुत स्पष्ट है। दल बदल के विरुद्ध क्लॉज़ 4 (2) का अपवाद उन उन परिस्थितियों में लागू होता है, जब एक राजनीतिक दल का विलय किसी दूसरे राजनीतिक दल में हो गया हो और उस मूल पार्टी के विधायक दल के दो तिहाई सदस्य विलय का अनुमोदन कर रहे हो। यहां मामला यह नहीं है, संपूर्ण आम आदमी पार्टी का विलय भारतीय जनता पार्टी में हो गया हो।
यहां मामला केवल सात सांसदों का है जो अपनी मूल राजनीतिक पार्टी को छोड़कर अन्य राजनीतिक पार्टी में चले में चले गए हैं। आम आदमी पार्टी प ‘राष्ट्रीय पार्टी’ है और पंजाब जैसे राज्य में उसकी पूर्ण बहुमत की सरकार है, तो केवल चंद सांसदों का दूसरी पार्टी में जाना ‘विलय’ नहीं, बल्कि ‘संवैधानिक अनैतिकता’ है।
जब पार्टी का अस्तित्व पंजाब से दिल्ली तक कायम है, तो किस संवैधानिक प्रावधान के तहत आप इसके सांसदों के विलय का दावा कर रहे हैं ? राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी कहाँ है? एक राष्ट्रीय दल के अध्यक्ष का काम लोकतंत्र की रक्षा करना होता है, न कि असंवैधानिक तरीकों से अन्य दलों को तोड़ने के लिए ‘राजनीतिक गंदगी’ फैलाना।
पंजाब की जनता ने जिस पार्टी को चुना, उसके अस्तित्व को चंद सांसदों के माध्यम से मिटाने की कोशिश करना सीधे तौर पर जनता के साथ धोखा है। दुत्कार है ऐसी राजनीति को।
सत्ता पाने की लालसा में शीर्ष नेतृत्व जिस तरह से संवैधानिक प्रावधानों की धज्जियां उड़ा रहा है, वह लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या है। यह राजनीति नहीं, बल्कि व्यवस्था को प्रदूषित करने का प्रयास है। देश का कानून अंधा हो सकता है, लेकिन इस देश का प्रबुद्ध नागरिक और संविधान का रक्षकसब देख रहे है। न्याय की जीत तभी होगी जब संविधान की व्याख्या ‘सत्ता के स्वार्थ’ के आधार पर नहीं, बल्कि इसकी आत्मा’ के आधार पर होगी।
-लेखक नागरिक सुरक्षा मंच के संस्थापक और पेशे से वरिष्ठ अधिवक्ता हैं






