





रूंख भायला
राजी राखै रामजी ! ‘के जातिया हो ?’ ओ फगत अेक सवाल कोनी, अेक चूंठियो है जिको आपां मिनखाजात में भेदभाव सारू जद-कद बोडबो करां। हां, इत्तो जरूर है कै सूचना क्रांति रै बगत में अबै अे चूंठिया कीं मौळा पड़्या है, पण घणा बरस नीं होया, कोई जातरा हो भलंई मेळा-मगरिया…..बस हो का रेलगाड़ी, किणी अणजाण सूं बंतळ में लोग दो ई सवाल बूझता, पैलो ‘‘के जातिया हो ?’’ अर दूजो-‘‘गांम किस्यो है ?’’। बंतळ रा बाकी सै सवाल आं रा पड़ूत्तर मिल्यां पछै ई तै होवता। जेकर कोई उंची जात रो होवतो तो बात गांम गवाड़, खेती बाड़ी री होवती अर बिरखा, जमानै का काळ पछै रिस्तां तंई जा पूगती। पण जे कोई हीण जात रो मिल जावतो तो बंतळ बिरखा अर जमानै सूं आगै बधती ई कोनी। भींट लेवता जकी न्यारी !
साची बात कैवण में संको क्यां रो ! आपणा पुरखा तो आखी जूण जात रै पेटै, वरण रै बाबत भोत अन्यावू ब्यौहार करता रैया हा, अजेस ई लारली पीढी रा लोग ऊंच नीच रो सागी भाव राखै। लारलै दिनां तंई लोग छांटो लेवता रैया है। ओ तो लोकराज आवै नीं, अर हीण जात रो फरक मेटणै री बात होवै नीं। आजादी रै पछै आपां कित्तो’क फरक मेट्यो, बो आपां चोखी तरियां जाणां।
फस्सी में ई सही, पण बरोबरी रो हक मिलण सूं ई आज गांम में मूळी मेघवाळ सरपंच है, अरजन मेघवाल मंतरी है, द्रोपती मुर्मु राष्ट्रपति है, नीं बां नै कुण चौधर सूंपतो ! आ छोटी बात कोनी कै आज घड़ी पुरखै पंडत नै, सुरजै सारण नै गांम रै सरपंच धूंकळ नायक री चौकी चढणो ई पड़ै। आपां नै गुमेज होवणो चाइजै आपणै संविधान पर, संविधान बणावणियां माथै…!
हेत री हथाई में आज बात जात री, पांत री। कबीर रा गुरू हा रामानंद, बां कैयो- ‘जात पांत पूछै नहीं कोई/हरि भजे सो हरिजन होई।’ इणी बात नै बां रा चेलां आगै बधाई अर आप-आप रै ढंग सूं समझावण री कोसिस करी।
कबीर कैयो-
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।।
संत रैदास री वाणी है-
जात पांत के फेर मंहि, उरझि रहइ सब लोग
मानुषता कूं खात हइ, रैदास जात कर रोग
जाति-पाँत की भीति तौ, प्रीति-भवन में नाहिं
एक एकता-छतहिं की, भिलति सब काहिं
आपनै लागतो होवैला कै रैदास अर कबीर तो आप ई हीण जात रा, बां नै तो इयां कैवणो ई हो। पण ‘रश्मिरथी’ रचणिया
रामधारीसिंघ दिनकर तो बामण हा, बा इण महाकाव्य रै पैलड़ै सर्ग में जात रै पेटै कित्तो सांतरो लिख्यो है, बांचो दिखाण-
ऊपर सिर पर कनक-छत्र, भीतर काले-के-काले,
शरमाते हैं नहीं जगत में जाति पूछनेवाले
सूतपुत्र हूँ मैं, लेकिन थे पिता पार्थ के कौन?
साहस हो तो कहो, ग्लानि से रह जाओ मत मौन
’जाति! हाय री जाति !’ कर्ण का हृदय क्षोभ से डोला,
कुपित सूर्य की ओर देख वह वीर क्रोध से बोला
जाति-जाति रटते, जिनकी पूँजी केवल पाषण्ड,
मैं क्या जानूँ जाति ? जाति हैं ये मेरे भुजदंड
मस्तक ऊँचा किये, जाति का नाम लिये चलते हो,
पर, अधर्ममय शोषण के बल से सुख में पलते हो
अधम जातियों से थर-थर काँपते तुम्हारे प्राण,
छल से माँग लिया करते हो अंगूठे का दान
इंफोसिस रा सीईओ नारायणमूर्ती सूं अेक बंतळ में किणी पत्रकार बूझ्यो, ‘सूचना क्रांति रो आप भारतीय समाजू जीवन में कांई असर देखो ?’ मूर्ती कैयो, ‘घणो तो म्हूं जाणूं कोनी, पण आप जद किणी एटीएम मशीन सूं रिपिया कडावण सारू जावो तो बा मशीन रामलाल शर्मा अर श्यामलाल मेघवाल में कोई फरक नीं करै. बा मशीन तो दोनां रो स्वागत अेक ई भांत सूं करै। ‘हैलो मि.रामलाल शर्मा….हैलो मिस्टर श्यामलाल मेघवाल…मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूं !’
लारलै दिनां री अेक बात और चेतै आई। थळवट रै गांम में ब्याव रो अेक नूंतो हो, बठै जीमण सारू जावणो होयो। साथै म्हारो अेक स्याणो सोतो भायलो…। घरधणी पूगतो हो, बण बाखळ में मोटो टैंट लगा राख्यो हो। भीड़ ई अणूती ही टैंट में…। पण सारै ई अेक छोटो सो टैंट अलायदो और हो, मन्नै बठै कीं छीड़ सी दीसी तो म्हूं उण टैंट मांय जा बड़्यो, लारै-लारै म्हारो भायलो आ पूग्यो। बो म्हारो बूकियो झाल’र बारै लेयग्यो, कान में होळैसीक बोल्यो-
‘‘इंयां के करो, ओ मेघवाळां अर नायकां सारू अलायदो लगायोड़ो है ! ’’
‘‘हैं….आ के बात…!’’
‘‘मोटोड़ै टैंट में जीमस्यां….समझे करो बात नै !’’
‘‘बात तो भाइड़ा समझ आगी, आछी उत गई है जीमणियै री अर जीमावणियै री ! म्हूं तो देख्यो, अठै कीं छीड़ है….पण अब ठाह पड़्यो है छीड़ तो आपणै मनां में ई कर राखी है…बधेपो कियां होवै !’’
इण बात री कई दिनां तंई गळदाई सी रैयी। दूजा लोगड़ा मंगळ अर चांद पर जा पूग्या है पण म्है अजेस ई छांटो लेवता फिरां। मिनख सूं मिनख रीं भींट…।
देस रो संविधान त्यार करणियां में आगीवाण हा डॉ. अम्बेडकर। दो दिन पछै बां रो जलमदिन है। राजनीतिक लोग तो आप-आप रै फायदै सारू बां रो जलमदिन मनावै पण भारतीय समाज रै दलित वर्ग सारू अंबेडकर माताजी-हड़मानजी सूं कम नीं है। दबेड़ै हीणजात रै मानखै नै देस में बरोबरी रो हक दिरावणियै अंबेडकर री सोच भोत ऊंडी ही। 26 नवम्बर 1949 रै दिन जद आपणो संविधान देस री जनता नै अरपिज्यो, बां भोत मारकै री बातां कैयी, बांचो दिखाण-
‘‘संविधान कित्तो ई चोखो क्यूं नीं होवै, जे उण नै लागू करणिया लोग माड़ा होसी तो बो ई माड़ो हो जासी !’’
‘‘संविधान रै पछै आपां कन्नै राजनीतिक बरोबरी तो आ जासी पण समाजू अर आर्थिक जूण में फरक बण्यो रैवैला। जेकर आपां इण फरक नै नीं मेट्यो, तो पीड़ित लोग लोकराज रै इण ढांचौ नै तोड़ न्हाखैला !’’
‘‘जेकर म्हारै जीवते जी संविधान रो गळत उपयोग होयो तो उणरै पलीतो लगावणियो म्हूं पैलो आदमी होवूंला !’’
बातां तो बां भोत सी कैयी है, जे आपां अंगेजां तो…।
आज री हथाई रो सार ओ है,….जात री बात जद कदैई उठै, मिनखाजात सैं सूं मोटी गिणनी चाइजै। गाड्यां रै लारै जात लिखावण सूं आपां मोटो नीं बणां, मोटो तो मिनख आपरी बात सूं बणै, ब्यौहार सूं बणै अर आपरै भाव सूं बणै, जिको बो दूजां सारू राखै। लाख टकां री बात आ है, ‘के पड़्यो है जात में, तत सारो बात में….!’ बाकी बातां आगली हथाई में। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेखक राजस्थानी और हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं





