



डॉ. एमपी शर्मा
मनुष्य का जीवन एक यात्रा है, आगमन से प्रस्थान तक की। परंतु कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं होता, बल्कि एक युग, एक परंपरा और एक जीवंत चेतना का विराम होता है। ऐसे ही विलक्षण व्यक्तित्व थे पंडित सत्यनारायण जी, जिन्होंने आज अपनी सांसारिक यात्रा पूर्ण कर देवलोक गमन किया।
पंडित जी केवल एक विद्वान नहीं थे, वे वेदों के ज्ञाता, संगीत के साधक, और सबसे बढ़कर आध्यात्मिक चेतना के प्रसारक थे। उन्होंने कबीर, गुरु नानक, गोस्वामी तुलसीदास जैसे महापुरुषों की वाणी को केवल पढ़ा ही नहीं, बल्कि उसे लोकभाषा में गाकर और समझाकर जन-जन तक पहुंचाया। उनकी विशेषता यह थी कि वे गूढ़ से गूढ़ आध्यात्मिक बातों को भी इतनी सहज भाषा में कहते थे कि सामान्य व्यक्ति भी उसे अपने जीवन में उतार सके।
उनके भजनों में जीवन का दर्शन झलकता था। ‘भरजाता घाव तलवार का बोली का घाव भरे ना’, या फिर, ‘चरखे का भेद बता दे, कातन वाली नार’। ऐसे अनगिनत भजनों के माध्यम से उन्होंने केवल भक्ति ही नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाई।
मेरे अपने जीवन में भी उनका स्थान अत्यंत विशेष रहा। मैंने उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु मान लिया था। इसी साल जनवरी में मेरे पूज्य पिताजी के स्वर्गवास के समय, जब हमारा परिवार शोक में डूबा हुआ था, तब पंडित जी ने दस दिनों तक निरंतर निर्गुण भजनों के माध्यम से हमें संभाला, हमारे मन को स्थिर किया और हमें पुनः सामान्य जीवन की ओर लौटने की शक्ति दी। यह केवल संगीत नहीं था, यह आत्मिक चिकित्सा थी।
वे निर्गुण और सगुण, दोनों धाराओं के अद्भुत ज्ञाता थे। उनके लिए भक्ति किसी बंधन में नहीं थी, बल्कि एक अनुभूति थी, एक सीधा संवाद परमात्मा से। उनका प्रिय भजन ‘चाल सखी उन देस में, जहाँ प्रीतम तेरो ए’’ आज मानो साकार हो गया है। गुरुजी सचमुच उस ‘देस’ में चले गए हैं, जहाँ उनका प्रीतम यानी परमात्मा विराजमान है।
आज हनुमानगढ़ ही नहीं, बल्कि उनके हर शिष्य, हर श्रोता के हृदय में एक खालीपन है। उनकी भजन मंडली की उदासी यह बता रही है कि उन्होंने केवल गाया नहीं, बल्कि हर दिल में जगह बनाई थी। पंडित सत्यनारायण जी का जाना एक अपूरणीय क्षति है, परंतु उनकी वाणी, उनके भजन, उनकी शिक्षाएँ सदैव हमारे साथ रहेंगी। वे शरीर से भले ही दूर हो गए हों, परंतु उनकी आत्मा और उनके शब्द हमारे भीतर जीवित रहेंगे।
अंत में बस यही प्रार्थना, ईश्वर उन्हें बैकुंठ में अपने श्रीचरणों में स्थान दें और हमें उनकी दी हुई शिक्षाओं पर चलने की प्रेरणा दें। कोटि-कोटि नमन!
-लेखक कुशल सर्जन और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं







