




रूंख भायला
राजी राखै रामजी ! आज बात किरसै अर मजूरां री। दो दिन पैली मजूरां रो दिन हो भई ! भाईजी, दिन तो मरयोड़ां रा होवै, मजूरिया तो लाई जीवै है अजेस…। ‘ये जीना भी कोई जीना है लल्लू…!’ मि.नटवरलाल फिल्म रो ओ डायलॉग मजूरियै री जियाजूण रो सांच है। आखै दिन खटणो, फेर ई कीं नीं बटणो, न चजसर रो जीमण, न ढंगसर रा गाभा, ना बैठण नै टापरो, ना जावण नै संडास, के टाबर, के लुगाई, सगळां रै पांती आयोड़ी अबखाई…..करै तो करै ई के लाई !
धरती पर करसै अर मजरू री आ गत जुगां सूं है। इयां लागै, जाणै बिधना फगत कुटीजणै रा लेख लिख्या है, मजूरां रै करमां में…। राजस्थानी रा चावा कवि रेवतदान चारण रो गीत ‘माटी तन्नै बोलणो पड़सी’ चेत आवै जिको इण दसा पेटै भोत ऊंडा सवाल उठावै। ‘हेत री हथाई’ में आज बात इणी गीत सूं पळावां, कीं अंस बांचो दिखाण-
कुण धरती रो अन्नदाता है, कुण धरती रो धारण हार
कुण धरती रो कर्ता-धरता, कुण धरती रै ऊपर भार
किण रै हाथां खेतश्खेत में लीली खेती पाकै है
किण रै पाण देस री गाडी अधबिच आती थाकै है
कैहणो पड़सी खरो न खोटो, सांचो भेद खोलणो पड़सी
माटी तन्नै बोलणो पड़सी….
थूं जाणै है पीढी-पीढी खेत मुलक रा म्है खड़िया
थूं जाणै है काळ बरस में भूख मौत सूं म्हूं लड़िया
थूं जाणै है कोट-कांगरा, मै‘ल माळिया म्है घड़िया
म्हारी खरी कमाई कितरी, लेखो तन्नै जोड़नो पड़सी
मून धारियां मिनख मरैला, धरती नेम तोड़नो पड़सी…..
पण लागै कोनी, धरती सोरै सांस आपरो नेम तोड़ली। किरसै मजूरियां री जूण बाबत सोचण री बेल्ह कठै है, राज बातां तो मोटी मोटी करै, पण बातां सूं कद कीं रो पेट भरै ! बधतै मुंघीवाड़ै में न्युनतम मजूरी रा कानून भोत पैली फैल होग्या भई ! सोचो दिखाण, दिहाड़ियो मजूर आखै दिन खटै जणा जाय’र पांच सौ री रूपली उण रै पल्लै पड़ै। आटो, तेल, लूण अर साग सब्जियां रै बधतै भावां बिच्चाळै उण पांच सौ रो छमको ई नीं लागै ! सोनै सी पाक्योड़ी फसल, जिण नै किरसो आपरै पसेवै अर लोई सूं सींचौ, इंदरराजा आय‘र घड़ी भर में धूड़ो कर न्हाखै, फेर बतावो कोई जीवै ई कियां….!!
साची बूझो तो मजूर जीवै कद है, तिल तिल मरै है….। दुनिया रा किस्याई कूणा कचूणा तकाय’र देखलो भलंई, मजूरियै रा हालात अेक सिरखा है। खेत में खटतो किरसो हो, का पछै किणी ठेकेदार कन्नै खाल कुटावतो ध्याड़ियो, कोठी बंगला में पोचा-झाडू करती कामआळी हो, का पछै कमठै पर ईंटां सूं बांथेड़ो करती लुगाई…, सगळां रा डोळ अेक ढाळै ढळ्या है। धारावी, जमनापार, सोनागाछी सूं लगा’र गांम रै कोटवाळ री झूंपड़ती तंई खिंड्योड़ै मजूरां रै करमां में फगत खटणो अर खूटीजणो लिखियोड़ो है। सावळ तकावो दिखाण, बै जी नीं रैया है, जियाजूण री गाडी रै फगत धक्का देय रैया है। आ गाडी कद जवाब दे देवै, कुण जाणै !
किरसै मजूरां री इसी हालात देखतां कार्ल मार्क्स कैयो-‘दुनिया में फगत दो जात है, अेक शोषक अर दूजो शोषित’। कामगारां री इण दुर्दसा पेटै ई मार्क्स हेलो दियो -‘दुनिया रा मजूरो, अेक हो जावो !’ औद्योगिक क्रांति रै उण दौर में इण हेलै में इत्ती ताकत ही कै आखै पच्छिम जगत में पूंजीवाद रै हिमायती लोगां नै धूड़ खाय’र मजूरां सूं बंतळ करणी पड़ी, काम रा घंटा तै करणा पड़्या, जोखै रै काम में सुरक्षा देवणी पड़ी, बां रै फायदै रा नवा काण कायदा बणावणा पड़्या। मजूरां री दसा अर दिसा में सुधार पेटै ओ अेक मोटो पांवडो हो।
पण फगत कानून बणावणै सूं सुधार नीं होवै, टुकड़ा रेड्यां कदेई पेट नीं भरीजै, कामगार नै तो उणरो हक, उणरी पांती मिलणी चाइजै। बाजारवाद रै दौर में उण नै पांती देवै ई कुण ! आजादी रै पेटै क्रांतिकारी भगतसिंघ अेक भोत मारकै री बात लिखी है-
आजादी रा मायना अे कोनी होवै कै राज गोरै हाथां सूं काळै हाथां में आ जावै, असल आजादी तो जद आवैली जिकै दिन बो आदमी भूखो नीं रैवै जिको अन्न उगावै, बो आदमी उघाड़ो नीं होवै जिको कपड़ो बणावै अर बो आदमी घरबारो नीं होवै जिको मै‘ळ माळिया चिणै !
चालती बंतळ में किरसै अर मजूरां री पीड नै अरथावती कन्हैयाला सेठिया री अेक चावी कविता चेतै आवै, ‘बो जमीन रो धणी कै ओ जमीन रो धणी’। इण कविता नै ई बांचां दिखाण-
हाड मास चाम गाळ, खेत में पसेव सींच
लू लपट ठंड मेह, सै सवै दांत भींच
फाड़ चौक कर करै जोतणी अर बोवणी
बो जमीन रो धणी कै ओ जमीन रो धणी ?
हळ जुप्यो जद बिक्या, फूस पान टापरो
पेट काट बीज री करै जुगाळी बापड़ो
पड़ी छांट कयो हरख, रामजी भली सुणी
ओ जमीन रो धणी कै बो जमीन रो धणी ?
मजूरां अर बां रै हक पेटै चालती हथाई में मनुज देपावत रै जगचावै आह्वान गीत नै कियां भुला देवां, अन्याव अर जुलम रै सामीं ओ गीत छाती खोल’र उभो हो जावै, सुणनियां रै रूं रूं में उतर जावै। इण गीत रा दो अंतरा बांचल्यो दिखाण-
खांडां रै लाग्यो आज काट, खूंटी पर टंगिया धनुस तीर,
अरे लोग मरै भूखा मरता फोगां में रूळता फिरै वीर
थे उठो किसानां मजदूरां, उंठा पर कसल्यो आज जीण
ईं नफाखोर अन्याय नै करद्यो कोडी रा तीन-तीन
फण किचर काळियै सांपां रा थे आज मिटाद्यो जगी झाग रे
धोरां आळा देस जाग रे, ऊंठा आळा देस जाग रे
छाती पर पैणा पड़्या नाग रे धोरां आळा देस जाग रे…..
रे देख मिनख मुरझाय रैयो, मरणै सूं मुस्कल है जीणो
अे खड़ी हवेल्यां हंसै आज, पण झूंपड़ल्यां रो दुख दूणो
अे धन आळा थारी काया रा भक्षक बणता ई जावै है
अरे जाग खेत रा रखवाळा, आ बाड़ खेत नै खावै है
अे जका उजाड़ै झूंपड़ल्यां, बां महलां रै थूं लगा आग रे
धोरां आळा देस जाग रे…..
बातां जद गेड़ चढै, ठमै ई कोनी। आज री हथाई रो सार ओ है कै किरसै अर मजूरां रै हक सारू दुनिया में जठै कठैई आवाज उठै, आपनै आपरी आवाज उण में रळानी चाइजै, होसलो बधाणो चाइजै। बाकी बातां आगली हथाई में…..। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेखक राजस्थानी और हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं





