




सुनील कुमार महला
कहते हैं, जिन राष्ट्रों के पास अपने वीरों की गाथाएँ होती हैं, उनका इतिहास कभी पराजित नहीं होता। भारत की उसी गौरवशाली परंपरा के अमर प्रतीक हैं महाराणा प्रताप, मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश के वह अदम्य योद्धा, जिनके लिए सत्ता से बड़ा स्वाभिमान और जीवन से बड़ी स्वतंत्रता थी। 9 मई को उनकी जयंती केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय आत्मसम्मान की स्मृति का उत्सव है।
महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया का जन्म 9 मई 1540 को राजस्थान के कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ। उनके पिता महाराणा उदयसिंह और माता रानी जयवंता बाई थीं। बचपन में उन्हें ‘कीका’ कहा जाता था, यह नाम भील समुदाय ने उन्हें स्नेह से दिया था, जो आगे चलकर उनके संघर्ष का मजबूत आधार बना। प्रताप केवल राजकुमार नहीं थे, वे संस्कारों में पले योद्धा थे, जिनके लिए मातृभूमि सर्वाेपरि थी।
18 जून 1576 को लड़ा गया हल्दीघाटी का युद्ध भारतीय इतिहास का सबसे चर्चित संघर्ष है। एक ओर सीमित संसाधनों के साथ महाराणा प्रताप और दूसरी ओर विशाल मुगल सेना। यह युद्ध केवल तलवारों का नहीं, विचारों का था, आत्मसम्मान बनाम अधीनता।
इतिहासकारों के अनुसार सैन्य दृष्टि से मुगलों को बढ़त मिली, पर नैतिक और राजनीतिक रूप से महाराणा प्रताप अडिग रहे। वे न बंदी बने, न झुके। युद्ध में इतनी वीरगति हुई कि धरती लाल हो गई, आज भी ‘रक्त तलाई’ उस बलिदान की साक्षी है। यहीं से प्रताप ने गुरिल्ला युद्ध नीति अपनाई और संघर्ष को नई दिशा दी।
महाराणा प्रताप के जीवन में चेतक केवल घोड़ा नहीं, बल्कि स्वामीभक्ति का जीवंत उदाहरण था। घायल अवस्था में 26 फीट का नाला पार कर चेतक ने अपने स्वामी के प्राण बचाए, ऐसी गाथाएँ इतिहास में विरल हैं।
भील समुदाय, विशेषकर राणा पूंजा, प्रताप के सबसे भरोसेमंद सहयोगी रहे। 1582 का दिवेर युद्ध, जिसे ‘मेवाड़ का मैराथन’ कहा जाता है, में प्रताप ने मुगलों को करारी शिकस्त दी और मेवाड़ का बड़ा हिस्सा पुनः मुक्त कराया। यह साबित हुआ कि संसाधन नहीं, संकल्प निर्णायक होता है।
महाराणा प्रताप ने प्रतिज्ञा ली थी कि जब तक चित्तौड़ स्वतंत्र नहीं होगा, वे वैभव नहीं अपनाएंगे। पत्तलों पर भोजन, घास की रोटियाँ और भूमि पर शयन, यह त्याग किसी साधु का नहीं, एक सम्राट का था।
दानवीर भामाशाह द्वारा समर्पित संपत्ति ने प्रताप के संघर्ष को नई ऊर्जा दी। अफगान सेनापति हकीम खां सूरी जैसे योद्धाओं को साथ लेकर उन्होंने धर्मनिरपेक्ष और योग्यता-आधारित नेतृत्व का उदाहरण प्रस्तुत किया।
इतिहास में वर्णित है कि महाराणा प्रताप असाधारण शारीरिक शक्ति के धनी थे। उनके शस्त्रों का भार, उनका पराक्रम और युद्धकौशल सब उन्हें अद्वितीय बनाते हैं। 19 जनवरी 1597 को चावंड में उनका निधन हुआ, पर विचार आज भी जीवित हैं।
महाराणा प्रताप का जीवन हार-जीत का गणित नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की परिभाषा है। उन्होंने अकबर जैसी महाशक्ति के सामने झुकने के बजाय संघर्ष को चुना। यही कारण है कि वे केवल मेवाड़ के नहीं, संपूर्ण भारत के गौरव हैं। उनका जीवन संदेश देता है, स्वतंत्रता का मूल्य वही समझता है, जो उसे बचाने का साहस रखता हो। मां भारती के इस अमर सपूत को शत-शत नमन।







