



रूंख भायला
राजी राखै रामजी ! आज बात एक चावै कवि री, कथाकार री।पैली बां री अेक कविता बांचो, बात फेर सरू करस्यां।
‘आज म्हैं/दिन में/सूरज सागै सगपण करियो है/आज म्हैं/रात में/एक दीवो जगायो है/सुणो/अंधारै अर आंधी नै/सनेसो कर दीजो !’
क्यूं है नीं दमदार ! जगती में पसरयै अंधारै अर आंधी नै चेतावणो सोरो कोनी । पण आ छोटी सी कविता निबळै आदमी रो अेक सबळो हेलो है, जिको आकासां जा पूगै। इण हेलै नै पुगावणिया है राजस्थानी रा चावा लिखारा सांवर दइया !
आज री हथाई में आपां सावर दैया री बात करस्यां, बां री कविता री करस्यां। 10 अक्टुबर 1948 नै जलम्यै बीकानेर रै जगचावै कवि सांवर दइया नै बिधना उमर तो घणी कोनी दी पण बां रै रचाव में इत्ती अर इसी तासीर दी कै बै राजस्थानी साहित रा थाम्बा गिणीजै। फगत 44 साल री उमर में हरिसरण होया सांवर दइया छोटी सी जियाजूण में राजस्थानी साहित रै भंडार नै आपरी कलम रै पाण खूब सांतरो रचाव दियो। आप तै नीं कर सको दैया कवि है कै कथाकार। बै जद गद्य रचौ तो पद्य रा लागै अर पद्य रचौ तो उणमें कथा/कहाणी सिरखो आनंद आबो करै। बुणगट री आ शैली सांवर दइया नै आपरै समकालीन रचनाकारां सूं अळघो मुकाम दिरावै। भलंई बांरी पिछाण राजस्थानी कहाणी नै नवी दीठ देवणियै कथाकार री रैयी होवै पण बांरा प्रकासित छः कविता संग्रै देखां तो लागै कै कविता सूं बांरो मनचींतो लगाव सदांई रैयो। सांवर दइया रो गद्य रचाव ई इण बात री साख भरै, जिणमें अेक काव्यात्मक लय अर कविता री ओळयां जिसा वाक्य विन्यास पग-पग छेड़ै लाधै।
घरू तौर पर कैवूं तो म्हूं सांवर दइया री कवितावां रो रसियो हूं, म्हूं बान्नै फगत बांचूं कोनी, बांरै मिस हर बार राजस्थानी री बुणगट रा नवा अंदाज सीखूं। ‘आखर री औकात’ अर ‘हुवै रंग हजार’ पोथ्यां जित्ती बिरियां बांचां, बांरा हाइकू अर कवितावां हर बार नवा अरथ खोलता निगै आवै। आ सांवर दइया रै रचाव री खूबी है कै बै सीधी सट बात में कविता री लय अर ऊंडा भाव पैदा करण री कळा जाणै। कविता री आ समझ ई किणी लिखारै नै सही मायनां में कवि बणावै।
सावंर दइया कन्नै कविता रै पेटै जिकी दीठ ही, बा भोत ऊंडी है। गद्य नै टाळ’र बात करां तो पद्य में सांवर दइया री अजे तंई छः पोथ्यां आपणै सामीं है। 1976 में बांरी पैलो कविता संग्रै ‘मनगत’ नांव सूं छप्यो। इण संग्रै री कवितावां रचाव री डांडी पर कवि रा सरूआती मंडाण हा। जद ओ संग्रै छप्यो उण बगत सांवर दइया आपरै जवानपणै में हा, 28 रै अेड़ै-गेड़ै उमर होवैली, पण बांरी कवितावां में पूरो पकाव हो। संग्रै री पैलड़ी दोय कवितावां ‘भोर’ अर सूरज में कवि री दीठ देखो-
भोर री बेळा/रसियै सूरज/चोरी-चुपकै सूं आय’र/कर नाख्यो/आभो लाल/जाणै कोई बहनोई/होळी खेलण रै मिस/साळी रै गालां माथै/मसळ दी हुवै/गुलाल…।
स्याणी-समझणी सिंझ्यां/दिन-भर रै/तप्यै-थक्यै-हारियै सूरज नै/पोढायो आपरै/समंदर महलां में
/पण भोर रो भायलो सूरज/भाख पाटियां पैली’ज/जाय पूग्यो/पूरब रै आंगणै !
सांवर दइया रो दूजो कविता संग्रै ‘काल अर आज रै बिच्चौ‘ खासो चर्चित रैयो। 23 कवितावां रै इण संग्रै में जियाजूण री अंतस तास अर उण सूं बांथेड़ो करतै कवि रो निरवाळो रूप प्रगटै। 1983 में सांवर दइया जापानी कविता शैली ‘हाइकू’ नै आपरी पोथी ‘आखर री औकात’ में लेय’र आया जिण सूं पाठकां राजस्थानी काव्य में नूंवै ढाळै रा प्रयोग देख्या। सत्तरा आखरां में बात परोटणै री कळा सूं सांवर दइया री खूब सरावना होई। ‘आखर री औकात’ राजस्थानी साहित में नवै लिखारां सारू अेक घणी महताऊ पोथी है जिकी सबद री साख परोटणै री सीख देवै। आं राजस्थानी हाइकू री बानगी देखो-
पंख काट’र/हेत सूं कैवै म्हांनै-/ओ आभो थांरो
कित्तीक तोड़ां/आपणै बिच्चौ रोज/बै चिणै भींतां
जे कीं धोवूं तो/बारै आवण जोगी/कोनी रैवूं म्हैं
1988 में सांवर दइया रो कविता संग्रै ‘आखर री आंख सूं’ छप्यो जिण में बै रचाव री पीड़ नै सामीं राखी है। अेक रचनाकार आपरै रचाव में सो कीं आखर री आंख सूं देखै। बो ओलै-छानै पळती प्रीत नै आखर री आंख सूं परखै, काळजै उठती हूक नै आखर री आंख सूं सुणै, मनां में पड़ी गांठ नै आखर री आंख सूं देखै जद कठैई जाय’र रचाव रै बूंटै माथै फुटावै आवै। संग्रै री अेक कविता री देखो-
हां/जानलेवा है जरूर/आ पीड़/आ पीड़ रचाव री/पण/जान लेवा घड़ी नै पछाड़/रूं-रूं में मुळक भरै/रचाव/रचाव/पीड़ में सुख रो नाम/साखी है/चूंघावती मा रो चितराम….
इण संग्रै में आखर पुसब, टाबर ई कथैला, रंग रूड़ा दिठावां सागै अर हालतांई याद है नांव रा चार खंड है। अेक आदमी री दीठ सूं समाजू काण कायदा, राजनीति रा रंग अर घड़ी-घड़ी बदळतै मिनखपणै नै सांवर दइया आखर री आंख सूं भोत सांवठै ढंग सूं सामीं राखै। राजनीति चातरपणै नै बकारता थकां बै लिखै-
थे म्हांनै/जक कोनी लेवण द्यो/थे जाणो हो/जे म्हैं/आराम सूं रैवण लागग्यो तो/थांरी नींद/हराम हो जावैला !
1993 में बांरो कविता संग्रै ‘हुवै रंग हजार’ सामीं आयो जिण री हर कविता रा न्यारा-निरवाळा रंग है, सै अेक सूं अेक बधता ! आज भी राजस्थानी साहित रा रसिक लोग सित्तर कवितावां रै संग्रै ‘हुवै रंग हजार’ नै घणै चाव सूं पढै अर सुणाबो करै। जियाजूण नै परोटणै री कळा ओ कवि कित्तै सीधै अर सरल ढंग सूं आपरी कविता में बताय देवै, आप भी देखो दिखाण-
म्हैं आ कद कैवूं/म्हैं कोनी कथी आ बात/थे-म्हैं एक !/पण/थां कनै पूगी जिकी बात/बा म्हारी कोनी/अरथ पछै कियां हो सकै म्हारो ?/जरूरत है इत्ती-सी बात जाणन री/आ दुनिया है बाजार/जठै हवा रा हुवै रंग हजार !
‘होठां में हरफ सागी’ कविता रै मिस सांवर दइया मध्यम वर्ग रै आदमी री अणबसी नै भोत सांतरै ढंग सूं पाठकां सामीं राखै। उणरी मनगत रा भाव अर संवेदना इण कविता में भतूळियै दांई उठै जिका आपरी बुणगट रै पाण पाठकां रै हियै में ऊंडा उतर जावै। आ कविता जियाजूण री घाणी में बंध्यै आदमी रो व्यंग्यात्मक दीठ सूं अेक निरवाळो चितराम मांडै-
म्हनै देख’र मुळकै तूं/थनै देख’र मुळकूं म्हैं/रोजीनै दांई/पाणी री गिलास धर परो पूछै तूं -/मळाई कोफ्ता… मटर पनीर…शाही पनीर…/पालक पनीर…… बैंगन भुरता…… पुलाव…../अर/एक पछै एक बोल्यां ई जावै नांव/जाणै बाजता हुवै नान स्टाप गीत/पछै उडीकण लागै तूं/म्हारै होठां सूं निकळै/कदास कोई नुंवो नांव/पण म्हारै होठां में हरफ सागी-/हाफ दाळ फ्राई !/तूं सावळ जाणै/कांई खा सकै/थारै-म्हारा जिसा लोग/पण थारै पूछियां बिना सरै कोनो !/अर म्हनै दाल छोड़ कीं जरै कोनी !!
इण संग्रै री कवितावां ‘जद देखूं, उभो तो हूं, है नीं मा, थेई तो हो, अे तो म्हे ई हां, नूंवै बरस माथै….’ आद सीधी पाठकां रै हियै उतरै। सांवर दइया रै सौ बरस पूग्या पछै पंचलड़ी विधा में ‘आ सदी मिजळी मरै’ नांव सूं बांरी पोथी छपी है जिकी राजस्थानी साहित्य में खासा सराइजी है। गज़ल रा अेनाण लियां ओ रचाव कवि रै अंतस में उठतै भतूळियां रो सांगोपांग चितराम है। बानगी देखो-
पीड़ माथै म्हारो जोर कांई/रूं-रूं में ऊगगी थोर दांई
किवाड़ां जड़्या काच हां म्हे तो/अठै अजमावो थे जोर कांई
है जिका गाभा तो पै’र ऊभो/सूकावूं अबै म्हैं धो’र कांई
थे तो उमड़ो घुमड़ो बादळ बण/म्हैं नाचूंला बन रै मोर दांई
ओळूं-धन लियां फिरूं मेळै में/देखूं अबै करसी चोर कांई
अे पंचलड़्यां बांचां तो ठाह लागै कै इण सदी नै कवि मिजळी क्यूं बतावै है। हर कविता में अेक लयात्मक कहाणी है, समाजू पीड़ नै देखती कवि री अंर्तव्यथा है, अेक अनूठो श्रवण रस है जिण रा छांटा पाठकीय चेतना पर पड़ै, अर बा ई कीं घड़ी स्यात जागृत होवै। सांवर दइया री कवितावां नै बांचां तो ठाह पड़ै अे कवितावां सौखिया नीं लिखिजी होवैला, पक्कायत ई जदकद कवि री चेतना में समाजू बिडरूपता रो किणी अणचायै भाठै रो दड़ीड़ पड़्यो होवैला, उणरी कलम आप मतैई उभी होसी।
‘आखर री औकात’, ‘हुवै रंग हजार’, अर ‘आ सदी मिजळी मरै‘ संग्रै री कवितावां सूं ठाह पड़ै कै इण कवि कन्नै अेक न्यारी साहित्यिक दीठ है जिण रै पाण बो बारीक सी बात सूं सरू होय’र काव्य संवेदना नै आकासां लग लेय जावै। लिखारा तो पग-पग छेड़ै लाधै पण आ निरवाळी दीठ भोत कमती निगै आवै। आं री रचना ‘अेक दीवोे‘ अर ‘हुवै रंग हजार वैष्विक कविता सूं कठैई कमती कोनी। अे कवितावां सांवर दइया नै विस्व स्तरीय कवियां री पांत में खड़्या करै।
अंतस उतरती सरल भासा रै पाण सांवर दैया रो रचनाकर्म मिनखपणै रै न्यारै-न्यारै रंगां नै परोटता थकां समची धरती रै ओळै-दोळै घूमै। बै जथारथ रा चितेरा है अर बांरी चेतना जूनी पीढ़ी रै मूल्यां नै सांवटता थकां कविता नै नवी दीठ देवै।
साची बूझो तो सांवर दइया री कविता राजस्थानी साहित्य री हेमाणी है। बां रै रचाव में मिनखपणै री चिंता करतै कवि रो आपरो अेक अलायदो चिंतन है, पद्य में गद्य री रंगत है, रंगत में मिनख रै मिस संवेदना नै बचावण री अमोलक सीख है। इस्यो रचाव समै री खंख सूं कदेई बोदो नीं पड़ै, बो तो तर-तर निखरतो जावै।
आज री हथाई खासा लम्बी होगी। जे आप नै मौको मिलै, सांवर दैया रै रचना संसार में अेकर जाया जरूर, आप इण हथाई री हर बात री साख नीं भरो तो म्हानै कैया देया….। बाकी बातां आगली हथाई में। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेखक राजस्थानी व हिंदी साहित्य के लब्धप्रतिष्ठ हस्ताक्षर हैं







