




आर्किटेक्ट ओम बिश्नोई
मनुष्य अक्सर यह मान लेता है कि प्रकृति हर स्थिति को चुपचाप सहन करती रहेगी, लेकिन प्रकृति का अपना संतुलन होता है। जब तक यह संतुलन बना रहता है, तब तक उमस के बाद वर्षा होती है और वर्षा जीवन में हरियाली, समृद्धि और नए अवसर लेकर आती है। किंतु जब असंतुलन अपनी सीमा लांघ जाता है, तब वही वर्षा बाढ़ का रूप धारण कर लेती है और स्थापित व्यवस्थाओं को बदल देती है। यही सिद्धांत केवल प्रकृति पर ही नहीं, बल्कि समाज और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी समान रूप से लागू होता है। समाज में बढ़ती घुटन, असंतोष और अन्याय यदि समय रहते दूर न किए जाएँ, तो वे भी एक दिन ऐसे विस्फोट का कारण बन सकते हैं जो पूरी व्यवस्था को चुनौती दे दे।
उमस का होना और उसके बाद बादलों का बरसना प्रकृति का सामान्य चक्र है। यह चक्र जीवन को संतुलित रखता है। लेकिन जब उमस असामान्य रूप से बढ़ जाती है, तब वही वर्षा बाढ़ में बदल जाती है। बाढ़ केवल जलभराव नहीं होती, बल्कि प्रकृति में गहरे और गंभीर असंतुलन का संकेत होती है।
भारतीय परंपरा में प्रकृति को ‘सनातन’ कहा गया है, क्योंकि वह अनादि और अनंत है। सामान्य परिस्थितियों में प्रकृति अपने भीतर के द्वंद्व को स्वयं संतुलित कर लेती है। उमस, वर्षा और धूप का यह क्रम धरती पर हरियाली, समृद्धि और विकास का आधार बनता है। लेकिन जब मानव का अंधाधुंध दोहन, अनियंत्रित विकास और लालच प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ देते हैं, तब वही प्राकृतिक चक्र विनाशकारी रूप ले लेता है।
समाज और लोकतंत्र भी इसी सिद्धांत पर चलते हैं। दोनों के भीतर मतभेद और द्वंद्व स्वाभाविक हैं। यही मतभेद समय-समय पर सुधार और परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करते हैं। लेकिन यदि व्यवस्था लोगों की पीड़ा, असंतोष और घुटन को लगातार अनदेखा करती रहे, तो वही असंतोष एक दिन व्यापक जनआंदोलन का रूप ले सकता है।
हाल के वर्षों में छात्रों और युवाओं का आंदोलन केवल नीट परीक्षा में कथित पेपर लीक तक सीमित नहीं था। वह उस व्यापक असंतोष का प्रतीक बन गया था, जो लंबे समय से समाज के भीतर जमा हो रहा था। घटते रोजगार, महंगी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ, सार्वजनिक संस्थानों की कमजोर होती विश्वसनीयता, बढ़ता भ्रष्टाचार और लगातार सामने आते परीक्षा घोटाले युवाओं के भविष्य को लेकर गहरी निराशा पैदा कर रहे थे।
इसके साथ ही लोकतंत्र के चारों स्तंभों की कमजोर होती साख, नीतिगत असमानताओं के कारण बढ़ती आर्थिक विषमता और न्याय व्यवस्था से घटता विश्वास भी इस असंतोष को गहरा करता गया। समाज का मध्यम वर्ग और वंचित तबका स्वयं को लगातार दबाव में महसूस करने लगा।
जब जंतर-मंतर पर युवाओं ने शांतिपूर्ण आंदोलन शुरू किया, तब उनकी मांगों पर समय रहते संवाद स्थापित करने के बजाय बल प्रयोग और लाठीचार्ज जैसे कदमों ने स्थिति को और तनावपूर्ण बना दिया। इससे समाज के विभिन्न वर्गों का समर्थन आंदोलन के साथ जुड़ता चला गया और हालात ऐसे बनने लगे कि व्यापक सामाजिक उथल-पुथल की आशंका दिखाई देने लगी।
अंततः सरकार ने संवाद का रास्ता अपनाया और आंदोलनकारी युवाओं से बातचीत शुरू की। इससे संभावित टकराव टल गया। यह घटना लोकतंत्र के चारों स्तंभों के लिए स्पष्ट संदेश है कि पारदर्शिता, जवाबदेही और भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई केवल भाषणों का विषय नहीं, बल्कि व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने की अनिवार्य शर्त है।
समाज और व्यवस्था के बीच मतभेद बने रहेंगे, लेकिन उनका समाधान संवाद, सुधार और संतुलन से होना चाहिए, टकराव और दमन से नहीं। भारतीय परंपरा का सूत्र ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’ और भगवान बुद्ध का मध्यम मार्ग आज भी उतना ही प्रासंगिक है। जब किसी भी पक्ष की अति होती है, तब परिणाम विनाशकारी होते हैं। संतुलन ही प्रकृति, समाज और लोकतंत्र, तीनों की सबसे बड़ी शक्ति है।







