







रूंख भायला
राजी राखै रामजी ! आदमी जद किणी ब्याधी में पज्यो होवै तो बो आपरै ओळै-दोळै तकावै, अळोच करै कै संकट री घणी में उण नै कठै सूं मदद मिल सकै। हांफळा मारतो उण रो मन सदांई आप सूं सबळो, आप सूं चातर मिनख सोधै जिको उणरो भीरी बणै, आफत सूं बारै कडावै, छोटकियां रै पल्लै है ई के! थाणा कचेड़ी रा मामला ई देखलो, काम पड़तां ई आपां किण रा मूंडा जोवां ! आपां मानां, सीधो सादो आदमी तो थाणै सामीं सूं निसरतो ई डरै, उण नै बतळावण में सार ई के !
छोटै अर मोटै रै इणी भेद सूं आज री ‘हथाई’ आगै बधावां। आदमी रो स्वभाव है, आप सूं मोटै पर भरोसो करै छोटकियां नै जूं जित्तो ई नीं गिणै। उण नै लखावै, काम तो मोटोड़ा ई काडै, छोटियां रै पल्लै है ई के, बै तो आप सेकै। मोटोड़ा आपरै चातरपणै रा तार कांई ठाह कठै-कठै जोड़ै राखै, बै काम कडाणा जाणै। आ बात तो ओपती है, पण घणी बिरियां मोटोड़ां सूं पार नीं पड़ता काम छोटकिया ई साधै। लोक ब्यौहार में देखां, घणी बिरियां अफसर सूं बेसी अेक चपड़ासी आपरो काम सावळ कडा सकै। रहीम जी अेक दूहै में कैयो है-
रहिमन देखी बड़ेन को, लघु नै दीजै डारी
जहां काम आवै सुई, का करै तरवारी
इण दूहै सूं आपणी अेक चावी लोकबात चेतै आवै। ‘चिड़ी कागलै री बात’ ! भोत सरलता सूं इण बात में छोटै-मोटै रै भेद नै अरथाइज्यो है। बाळपणै में आ बात आप दादी-नानी रै मूंडै सुणी होवैला, जे नीं सुणी तो आज बांचलो।
बात इयां ही, कै अेक ही चिड़ी, अर अेक हो कागलो ! कागलै नै लाधी लाल, चिड़ी नै लाध्यो मोती। कागलै चिड़ी नै कैयो, ‘दिखाई, तन्नै के लाध्यो !’ चिड़ी ज्यूं ई मोती दिखायो, कागलै तो मोती झट खोस लियो अर चूंच में दाब’र नीमड़ी पर जा बैठ्यो।
अबै चिड़ी कूकै, ‘म्हारो मोती दै, म्हारो मोती दै।’ कागलो बोल्यो, ‘देवतो ई तो लेवतो ई क्यूं ! जा परियां मर, मोती अबै म्हारो !’
चिड़ी लायण करै ई कांई ! कूकती रैयी। ‘काग मोती देवै नीं, चिड़ी रोवती रैवै नीं’
छेवट बा नीमड़ी सूं बोली, ‘नीमड़ी माई काग उडा!’ नीमड़ी बोली, म्हूं क्यूं उडावूं, म्हारो के लियो !’
चिड़ी फेर कूकी, ‘काग मोती देवै नीं, चिड़ी रोवती रैवै नीं’
फेर बा खाती कन्नै गई, ‘खाती भिया, खाती भिया, नीमड़ी नै बाढ दै !’
खातीड़ो बोल्यो, म्हूं क्यूं बाढूं, म्हारो के लियो !’
चिड़ी कूकी, ‘काग मोती देवै नीं, चिड़ी रोवती रैवै नीं’
फेर बा राजाजी कन्नै गई, ‘राजा जी, राजाजी, खातीड़ै नै डंडो !’
राजा बोल्यो, ‘म्हूं क्यूं डंडो, म्हारो के लियो !’
चिड़ी कूकी, ‘काग मोती देवै नीं, चिड़ी रोवती रैवै नीं’
फेर बा राणी कन्नै गई, ‘राणी सा, राणी सा, थे राजा जी सूं रूस जावो !’
राणी बोली, ‘म्हूं क्यूं रूसूं, म्हारो के लियो !’
चिड़ी कूकी, ‘काग मोती देवै नीं, चिड़ी रोवती रैवै नीं’
फेर बा ऊंदरी कन्नै गई, ‘ऊंदरी बाई, ऊंदरी बाई, थूं राणी रो कब्जो कतर दै !’
ऊंदरी बोली, म्हूं क्यूं कतरूं, म्हारो के लियो !’
चिड़ी कूकती रैयी। ‘काग मोती देवै नीं, चिड़ी रोवती रैवै नीं’
फेर बा मिनकी कन्नै गई, ‘मिनकी मासी, मिनकी मासी, थूं ऊंदरी नै खा जा।’
मिनकी बोली, म्हूं तो नीं खावूं, म्हारो कांई लियो!’
चिड़ी कुतियै कन्नै गई, ‘कुत्ता काका, कुत्ता काका, थे मिनकी नै खा जावो !’
कुतियो बोल्यो, ‘म्हूं तो नीं खावूं, म्हारो कांई लियो !’
चिड़ी लाठी कन्नै गई, ‘लाठी बाई, लाठी बाई, थूं कुतियै रै मार !’
लाठी बोली, ‘म्हूं तो नीं मारूं, म्हारो कांई लियो !’
चिड़ी कूकती रैयी, ‘काग मोती देवै नीं, चिड़ी रोवती रैवै नीं’
फेर बा आग कन्नै गई, ‘आग माई, आग माई, थूं लाठी नै बाळ दै !’
आग बोली, ‘म्हूं क्यूं बाळूं, म्हारो कांई लियो !’
चिड़ी समदर कन्नै गई, ‘समदर देवा, समदर देवा, थे आग नै बुझाय देवो !’
समदर बोल्यो, ‘म्हूं तो को बुझावूं नीं, म्हारो के लियो !’
चिड़ी हाथी कन्नै गई, ‘हाथी दादा, हाथी दादा, थे आपरी सूंड में पाणी भर’र समदर नै सुका देवो !’
हाथी बोल्यो, ‘म्हूं तो को सुकावूं नीं, म्हारो के लियो !’
चिड़ी कूकती रैयी, ‘काग मोती देवै नीं, चिड़ी रोवती रैवै नीं’
छेवट बा सैं सूं छोटी कीड़ी कन्नै गई, ‘कीड़ी बैन, कीड़ी बैन, अबै थारो ई आसरो है, थूं म्हारी मदद कर, हाथी री सूंड में बड़ज्या, उण रै च्यानणो करा !’
कीड़ी बोली, ‘बस इत्ती सी बात! म्हूं अबार ई उण री सूंड में बड़सूं, सागीड़ो चानणो करासूं !’
कीड़ी री बात सुणतां ई हाथी तो पाधरो होग्यो, बोल्यो, थूं म्हारी सूंड में ना बड़, म्हूं अबार ई समदरियै रो सगळो पाणी पी’र उण नै सुका देसूं। समदर जद हाथी री बात सुणी तो बोल्यो, इयां ना करो, म्हूं अबार ई समची आग नै बुझा देसूं। ओ सुणतां ई आग बोली, ना रे समदर, म्हानै ना बुझाई, म्हूं अबार ई लाठी नै बाळ देसूं। लाठी आ बात सुणी तो, झट बोली, ना…ना…, म्हानै ना बाळो, म्हूं अबार ई कुतियै रो पंपाळ भांगू। कुतियो तो इत्ती बात सुणतांई कूक्यो, ना…ना…, म्हूं अबार ई मिनकी नै खा जावूंला। मिनकी रै कानां बात पड़तांई बोली, ऊंदरी रो कांई डोळ, म्हूं अबार ई उण नै झप’र जीम जावूंली। ऊंदरी रै तो घिग्गी बंधगी, ना…ना…, कब्जो कांई, म्हूं तो राणी रो घाघरियो ई कतर देसूं। राणी बोली, इयां नां कर, म्हूं अबार ई राजाजी सूं रूसूं। राजाजी रा पछै डोळ ई के ! बोल्या, ना…ना…, राणी रै रूस्यां पार कद पड़ै, म्हूं अबार ई खातीड़ै नै डंडूं। खातीड़ो बोल्यो, म्हानै माफी दिराया, म्हूं अबार ई नीमड़ी नै बाढ देसूं। नीमड़ी तो इत्तो सुणताई ढीली होगी, चिड़ी सूं बोली-‘म्हूं अबार ई कागलै नै म्हारी डाळ सूं उडा देवूं, भळै कदैई को बैठण देवूं नीं। कागलै जद आ बात सुणी तो नीमड़ी सूं बोल्यो-
‘नीमड़ी माई, थूं म्हानै ना उडा, म्हूं अबै ई ओ मोती चिड़ी नै दे देवूं।’ कागलै झटदणी चिड़ी नै मोती झला दियो। मोती लेय’ चिड़ी तो उडगी, फुर्रर्रर्र…..!
अेक छोटी सी कीड़ी रै पाण चिड़ी नै आपरो मोती पाछो लाध्यो, मोटोड़ा सगळा लैण पर आयग्या, इण चोखी बात और पछै कांई !
आज री हथाई रो सार ओ है कै जरूरी कोनी आपरा पज्योड़ा काम मोटोड़ा लोग ई काडै, छोटकियां नै भी बतळावाण में कोई हरज कोनी। हो सकै, बा कन्नै सावळ इलाज होवै, बै आपनै ब्याधी सूं बारै काड सकै। काम पड़्यां बान्नै भी बरतणो चाइजै, मत बांरी भी लेवणी चाहीजै। बाकी बातां आगली हथाई में…..। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेखक राजस्थानी व हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार हैं






