





गोपाल झा
राजस्थान के सियासी गलियारों में एक चर्चा गर्म है, क्या मरूधरा का बरसों पुराना ‘बारी-बारी’ का रिवाज टूटने जा रहा है? सूबे की सियासत दशकों से सिर्फ दो खूंटों बीजेपी और कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही है। मगर अब परदे के पीछे एक ऐसी खिचड़ी पक रही है, जिसकी खुशबू ने दोनों पारंपरिक महारथियों की नींद उड़ा दी है। इस खिचड़ी के मुख्य बावर्ची हैं राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल, जो एक बार फिर राजस्थान में ‘थर्ड फ्रंट’ की बिसात बिछाने निकल पड़े हैं।
आरएलपी सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल इस बार सिर्फ हुंकार भरने के मूड में नहीं, बल्कि ठोस घेराबंदी की तैयारी में हैं। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के साथ हाथ मिलाकर उन्होंने पहला सियासी दांव तो चल ही दिया है। अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि इस कुनबे में अगला चेहरा कौन होगा। चर्चा है कि पश्चिमी राजस्थान के सियासी क्षितिज पर तेजी से उभरे निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी के साथ संपर्क के तार जोड़े जा रहे हैं। नौजवानों में भाटी का क्रेज और बेनीवाल का आक्रामक तेवर, अगर यह केमिस्ट्री जमी, तो मारवाड़ से लेकर थार के रेगिस्तान तक एक नया समीकरण खड़ा हो सकता है।
बात सिर्फ भाटी तक सीमित नहीं है। खबर है कि हनुमानगढ़ इलाके में अपनी मजबूत पैठ रखने वाले निर्दलीय विधायक गणेशराज बंसल पर भी डोरे डाले जा रहे हैं। इसके साथ ही बेनीवाल उन तमाम ताकतों को एक मंच पर लाने की फिराक में हैं, जो राजस्थान की धरती पर अपनी जड़ें तलाश रही हैं। आम आदमी पार्टी (आप) लंबे समय से राजस्थान में दस्तक देने को बेताब है। वहीं आदिवासी अंचल में तेजी से उभरी भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी) और पुराने कैडर वाली सीपीआई(एम) के साथ भी बातचीत के दरवाजे खुले रखने की चर्चाएं हैं। अगर ये सब एक छतरी के नीचे आ गए, तो सूबे के सियासी कैनवास पर रंगों का बिल्कुल नया मिश्रण देखने को मिलेगा।
हालिया शहरी निकाय चुनावों के ठोस आंकड़ों ने हनुमान बेनीवाल की उम्मीदों को हवा दी है। भले ही अलग-अलग देखा जाए तो छोटे दलों की झोली में बहुत बड़ा वोट शेयर न दिखा हो। आरएलपी को करीब 0.95 फीसद, ‘आप’ को 0.47 फीसद, सीपीआई(एम) को 0.32 फीसद, बसपा को 0.28 फीसद और बीएपी को 0.13 फीसद वोट ही नसीब हुए। लेकिन जिस एक आंकड़े ने बीजेपी और कांग्रेस के माथे पर पसीना ला दिया है, वह है निर्दलीयों को मिला 27.38 प्रतिशत वोट शेयर।
27 फीसद से अधिक मतदाताओं का मुख्यधारा के दलों से छिटकना कोई मामूली बात नहीं है। सियासी पंडितों का मानना है कि बेनीवाल की नजर इसी असंतुष्ट और बिखरे हुए बड़े वोट बैंक पर है। यदि यह गैर-कांग्रेसी, गैर-भाजपाई जनसमर्थन किसी एक मोर्चे के झंडे तले लामबंद हो गया, तो सीटों की संख्या भले बहुत न बढ़े, लेकिन कई दिग्गजों का ‘खेल खराब’ होना तय है।
हालांकि, बेनीवाल के मिजाज को लेकर भी चुटकियां ली जा रही हैं। इतिहास गवाह है कि बेनीवाल पहले भी थर्ड फ्रंट के ख्वाब देख चुके हैं। उन्होंने जरूरत पड़ने पर बीजेपी से भी हाथ मिलाया और कांग्रेस के साथ भी, लेकिन अपनी बेबाक और अप्रत्याशित कार्यशैली के चलते वे किसी भी खेमे में टिक कर नहीं रह पाए। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या अपनी शर्तों पर जीने वाले बेनीवाल इतने सारे महत्वाकांक्षी क्षत्रपों, अलग-अलग विचारधाराओं और निर्दलीय सूरमाओं को एक डोर में बांधकर रख पाएंगे?
सियासी हलकों में कयासों का दौर जारी है। अगर बेनीवाल ने अपनी पुरानी गलतियों से सबक लेते हुए इस बार गंभीरता से रणनीति को अमली जामा पहनाया, तो विधानसभा चुनाव से पहले राजस्थान को एक मजबूत तीसरा विकल्प देखने को मिल सकता है। भले ही यह मोर्चा अपने बूते सरकार बनाने की स्थिति में न पहुंचे, मगर त्रिशंकु विधानसभा के हालात में ‘किंगमेकर’ की चाबी इसी मोर्चे के हाथ में हो सकती है।






